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महामारी से निपटने का तरीका बता रहा देशों का नजरिया

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  September 15, 2020

साजिश की गंध तलाशने वाले सिद्धांतकारों को छोड़कर शायद ही कोई यह मानता है कि पिछले साल के आखिर में चीन के वुहान शहर से निकला कोरोनावायरस प्राकृतिक विकास की परिणति नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह वायरस पहली बार चमगादड़ में पनपने के बाद पैंगोलिन या गंधबिलाव (सिवेट) से होते हुए इंसानों तक पहुंचा है। कोविड-19 महामारी के शुरुआती दौर में लगाई गई बिना जानकारी वाली एवं गैरजिम्मेदाराना अटकलबाजी के बावजूद अधिक वजनदार सबूत इसके नैसर्गिक होने का ही इशारा करते हैं। अभी उपलब्ध जानकारियों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह कोई दिशाहीन जैविक हथियार नहीं है। अमेरिका एवं कुछ अन्य देशों में ऐसे आरोप लगते रहे हैं।

अगर ऐसा होता तो वह कहीं अधिक सुविधाजनक होता। इस वायरस ने कुछ खास समाजों एवं शासन-व्यवस्थाओं की कमजोरियों एवं खामियों को उजागर करने का काम किया है। इसने मुक्त एवं स्वतंत्र लोगों को अपेक्षाकृत अधिक नुकसान पहुंचाया है जहां सामाजिक व्यवस्था एवं 'अनुशासन' पर अधिक जोर नहीं दिया गया है।

अगर चीन व्यवस्थित एवं सघन निगरानी वाली सर्वाधिकारवादी समाज की 'श्रेष्ठता' को प्रदर्शित करने का वाकई में कोई तरीका निकालता तो वह इस वायरस से कहीं अधिक बेहतर रूप में इसे अंजाम देता। जब कानून तोडऩे के तीखे अंजाम होने के भय का मेल व्यापक निगरानी के लिए पहले से विकसित राज्य की क्षमता से हो जाता है तो महामारी पर नियंत्रण कर पाना कहीं अधिक आसान हो जाता है। चीन के अधिकारी महामारी से मुकाबले में वुहान शहर और उसके निवासियों के रवैये की तारीफ करने के मामले में एकदम सही हैं। दुनिया में किसी और जगह इतने बड़े शहर को लंबे समय तक पूरी तरह बंद करना शायद ही सफल हो पाता। तमाम दूसरे शहरों में लोग घर से बाहर निकलने के तरीके तलाशने लगते, अस्पतालों में क्वारंटीन होने से बचने की कोशिश करते, वायरस का खतरा आनुपातिक रूप से कम होने के पहले ही लॉकडाउन को हटाने की मांग तेज होने लगती। लेकिन वुहान शहर में राज्य की बेशुमार ताकत के आगे ये सभी बुनियादी मानव प्रवृत्तियां अप्रासंगिक साबित कर दी गईं। हम कभी भी यह नहीं जान पाएंगे कि वुहान के निवासी इस तालाबंदी में किस हद तक ऐच्छिक रूप से शामिल थे। लेकिन वायरस की चपेट में सबसे पहले आने वाले इस शहर में बीमारी पर काबू पा लेना उनकी ही उपलब्धि है। चीनी जनवादी गणराज्य के देशभक्त नागरिकों के लिए वुहान का हालिया अनुभव अपने देश के इतिहास को संक्षिप्त रूप में देखने जैसा है। पहले महामारी के प्रकोप से लोगों की मौत, फिर बेहतर भविष्य की आस में लंबी सहनशक्ति का प्रदर्शन और आखिर में सबकुछ खोल देना। दूसरे देशों ने महामारी से निपटने की कोशिश अपने अलग तरीकों से की है। लोकतांत्रिक होने के साथ ही उत्तर-पूर्वी एशिया के बड़े शहरी निकाय जैसी सोच वाले देशों- दक्षिण कोरिया, जापान और ताइवान ने बड़े पैमाने पर सामाजिक जागरूकता के माध्यम से इस पर काबू पाने की कोशिश की हैं। लेकिन यह पूरी तरह कारगर नहीं रहा है। सोल के गिरजाघरों या टोक्यो के होस्टेस बार में संक्रमण के मामले फिर से उभरे हैं। लेकिन यह कोशिश बुरी तरह नाकाम भी नहीं रही है। इससे इन समाजों में रोजमर्रा की जिंदगी में निकाय वाली सोच का स्तर और उनके राज्यों की चपलता भी परिलक्षित होती है।

ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देशों में असहमति को कहीं अधिक सामाजिक स्वीकृति हासिल है लेकिन वहां पर भी सरकारों की प्रतिक्रिया तुलनात्मक रूप से अधिक कठोर रही है। मसलन, विक्टोरिया प्रांत ने दुनिया में अपनी तरह के बेहद सख्त लॉकडाउन का तरीका अपनाया है। इस लॉकडाउन का विरोध करने वाले लोगों को पुलिस बहुत ही बेदर्दी से गिरफ्तार कर रही है। जिन देशों में खुला समाज होने के बावजूद सरकार ऐसे तरीके आजमाने में कामयाब नहीं हो पाई है, वह राज्य के प्रति विश्वास और उसकी ताकत दोनों को ही दर्शाता है।

लेकिन ब्रिटेन प्रति 10 लाख आबादी पर वायरस संक्रमण और मृत्यु दर के मामले में सबसे बुरी हालत में है। वहीं अमेरिका में राज्य के प्रति गहरे अविश्वास और 'विशेषज्ञों' के रुख ने निम्न सामाजिक सुरक्षा और विभाजनकारी शासन के साथ मिलकर वायरस नियंत्रण का काम असमंजसपूर्ण बना दिया है। ब्रिटेन में सामुदायिक प्रतिरोधकता (हर्ड इम्युनिटी) को लेकर आगे-पीछे होने की स्थिति देखी गई है। इसी तरह अमेरिका में खुलेआम झूठ बोलने के अलावा राहत उपायों के बारे में निर्णय कर पाने की नाकामी ने सामाजिक एकजुटता और शासन पर असर डालने वाले कहीं बड़े सवालों को साफ तौर पर दिखाया है।

अमेरिका में देश के 50 फीसदी हिस्से की मान्यता को दूसरा हिस्सा पूरी तरह नकार देता है तो ब्रिटेन में घरेलू प्रशासन की नीति-निर्माण क्षमता इस कदर गिर चुकी है कि इसका लगातार नाकाम होना तय है। देर से लॉकडाउन लगाने से लेकर देश को दोबारा खोलने पर असमंजस होने से एक मिला-जुला संदेश गया है।

फिर अपना भारत भी है। अगर देशों में इस वायरस की सफलता वहां के प्रशासन की कमतर क्षमता, राज्य के प्रति विश्वास की कमी, सामाजिक एकजुटता के खराब स्तर, और नागरिक अनुशासन के अपेक्षाकृत निम्न स्तर पर निर्भर करती है तो शायद यही कहना ठीक है कि महामारी खत्म होने तक कोरोना संक्रमण के सबसे अधिक मामले हमारे यहां होंगे। इस मामले में हम निश्चित रूप से दुनिया के सिरमौर होंगे।

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