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ग्रामीण इलाकों में व्यय बढ़ाने का उचित निर्णय

विनायक चटर्जी /  September 15, 2020

महज कुछ महीनों की अवधि में ग्रामीण भारत के स्वरूप में एकदम नया बदलाव आया है और वह भारतीय अर्थव्यवस्था को उबारने वाले रक्षक के रूप में सामने आया है। कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन ने जहां विनिर्माण और सेवा क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया था, वहीं अब खरीफ की फसल की अच्छी बुआई और बढिय़ा मॉनसून ने यह आशा जगा दी है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था उपभोक्ताओं की आय और उनके खर्च में इजाफे की वजह बनेगी। हालांकि यह अपेक्षा कुछ ज्यादा ही है। दरअसल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गैर कृषि क्षेत्र से अलग करके नहीं देखा जा सकता है क्योंकि यह काफी हद तक उस धन पर निर्भर करती है जो शहरों में काम करने गए गांव वाले वापस अपने घरों को भेजते हैं। शहरों से गांव आने वाले ऐसे धन में कमी आई है और कोविड-19 महामारी के कारण शहरों में घटे रोजगार के कारण बड़े पैमाने पर बाहर काम करने वाले लोग गांवों में लौट आए हैं। ऐसे में अनुमान तो यही है कि ग्रामीण उपभोक्ता शायद अर्थव्यवस्था को उबारने में उस कदर प्रभावी न हों जितना कि अर्थशास्त्री और बाजारविद उन्हें मान रहे हैं। कम से कम बिना सतत मदद के वे ऐसा नहीं कर पाएंगे।

केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सरकारों ने इस बात को पहचाना है। टेलीविजन चैनलों पर प्रवासी श्रमिकों के सैकड़ों किलोमीटर चलकर वापस अपने गांवों तक पहुंचने की खबरें जब लगातार समाचार चैनलों पर चलने लगीं तो सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में अभाव दूर करने के लिए कई योजनाओं की घोषणा की। केंद्र सरकार ने अकेले ही ऐसे सार्वजनिक कार्यों के लिए 1.5 लाख करोड़ रुपये उपलब्ध कराए। तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड और हिमाचल प्रदेश की सरकारों ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के खास हिस्सों को लक्षित कर योजनाएं शुरू कीं।

सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) योजना के अधीन भी 100,000 करोड़ रुपये व्यय करने की प्रतिबद्धता जताई। इस योजना का मूल बजट 60,000 करोड़ रुपये था जिसमें 40,000 करोड़ रुपये का इजाफा कर इसे 100,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। सूत्रों का कहना है कि मनरेगा के अधीन प्रतिदिन 280 करोड़ रुपये की राशि वितरित की जा रही है। यह वाकई काबिलेतारीफ है।

इसके अलावा पीएम गरीब कल्याण रोजगार अभियान की शुरुआत की गई है। 50,000 करोड़ रुपये के आवंटन वाले इस अभियान में 25 अलग-अलग तरह के छोटे सार्वजनिक काम किए जाएंगे। उदाहरण के लिए ग्रामीण आवास, जल जीवन मिशन के तहत पेयजल मुहैया कराना, पंचायत भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, सामुदायिक शौचालय और ग्रामीण मंडी आदि। यह कार्यक्रम 116 जिलों में संचालित किया जाएगा। इस दौरान प्रवासी श्रमिकों की वापसी वाले छह राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

व्यक्तिगत स्तर पर राज्यों ने, खासकर उन राज्यों ने जहां बड़ी तादाद में प्रवासी श्रमिक वापस लौटे हैं, राज्य स्तर पर रोजगार कार्यक्रमों की शुरुआत की है। ऐसे अधिकांश कार्यक्रम मनरेगा के अधीन ही शुरु किए गए हैं। झारखंड ने जल संरक्षण परियोजनाओं तथा हर पंचायत में खेल के मैदान बनाने को लेकर सार्वजनिक कार्यों की शुरुआत की है। पश्चिम बंगाल सरकार ने माटिर सृष्टि नामक योजना शुरू की है ताकि छह जिलों में बंजर जमीन को बागवानी, मछली पालन तथा पशुपालन के लिए इस्तेमाल किया जा सके। योजना के तहत 50,000 एकड़ जमीन पर 2.5 लाख लोगों को रोजगार देने का इरादा है। हालांकि व्यक्तिगत स्तर पर राज्यों की अचानक ग्रामीण सार्वजनिक कार्यों पर व्यय बढ़ाने की क्षमता सीमित है क्योंकि उनके पास वित्तीय गुंजाइश उतनी नहीं है। परंतु यह स्पष्ट है कि सरकारें इस दिशा में जी तोड़ प्रयास कर रही हैं।

ऐसे में इन योजनाओं में इस्तेमाल हो रहे फंड की बात करना अहम है। पीएम गरीब कल्याण रोजगार योजना में उस धन राशि का इस्तेमाल किया जा रहा है जो मूल रूप से उन योजनाओं के लिए आवंटित की गई थी जिन्हें अब इस योजना में समाहित कर लिया गया है। कोविड-19 संकट के कारण मनरेगा में 40,000 करोड़ रुपये का इजाफा किया गया है। हालांकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका काफी प्रभाव पडऩे की आशा की जा रही है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि इन योजनाओं के तहत वित्त वर्ष में पहले ही खर्च किया जा रहा है ताकि इनका अधिक से अधिक असर देखने को मिले। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को इस वक्त  हरसंभव सहायता की आवश्यकता है।

परंतु इससे भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण कदम रहा है कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक बुनियादी निवेश का। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी महीने 100,000 करोड़ रुपये के कृषि बुनियादी फंड की शुरुआत की। हालांकि इसकी घोषणा कुछ महीने पहले कोविड से निपटने के आत्मनिर्भर भारत आर्थिक पैकेज के हिस्से के रूप में की गई थी। यह फंड अगले चार वर्षों के दौरान ग्रामीण इलाकों में फसल कटाई के बाद की बुनियादी सुविधाएं तैयार करने का काम करेगा। बैंक और वित्तीय संस्थान वर्ष 2020-21 में 10,000 करोड़ रुपये का ऋण प्रदान करेंगे और वर्ष 2023-24 तक इसे बढ़ाकर 30,000 करोड़ रुपये किया जाएगा। सरकार ऐसे तमाम ऋण पर आंशिक ऋण गारंटी तो देगी ही, साथ ही तीन प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी भी प्रदान की जाएगी। यह ऋण किसानों, किसान संगठनों और कृषि समितियों, स्वयं सहायता समूहों और सरकारी एजेंसियों को दिया जाएगा। इसके साथ ही सरकार ने कृषि बाजारों को मुक्त करने और किसानों को अपनी उपज कृषि उपज वितरण समिति मंडियों के बाहर बेचने की छूट देने के लिए अध्यादेश भी लाया है। इसके अलावा प्रसंस्करण करने वालों, निर्यातकों और खुदरा कारोबारियों के साथ अनुबंधित कृषि को लेकर एक खाका भी तैयार किया जा रहा है। इतना ही नहीं कृषि निवेश फंड जमीन पर वास्तविक सहायक निवेश की कमी पूरी करने के लिए जरूरी विधायी बदलाव मुहैया कराता है। यह स्पष्ट है कि समय पर शुरू की गई ये योजनाएं देश के ग्रामीण इलाकों में मांग तैयार करने में बहुत मददगार हैं।
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)

Keyword: विनिर्माण, सेवा क्षेत्र, मॉनसून, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, उपभोक्ता आय, कृषि, प्रवासी श्रमिक, मनरेगा,
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