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हर हाल में संप्रभुता बचाएगा भारत

अजय शुक्ला /  September 15, 2020

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी एक बड़ी चुनौती को नियंत्रित करने की सरकार की मजबूत छवि को पेश करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) में चीन की घुसपैठ पर संसद में मंगलवार को बयान दिया। सिंह ने भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े किसी भी खतरे से जोरदार तरीके से निपटने का संकल्प जताया। उन्होंने संसद में कहा, 'मैं सदन को सूचित करना चाहता हूं और इसके माध्यम से पूरे राष्ट्र को सूचित करना चाहता हूं कि भारत की संप्रभुता बनी रहे, इसे सुनिश्चित करने के लिए हम सभी परिणामों के लिए तैयार हैं।

विपक्षी दलों ने इस पर चर्चा कराने की मांग की थी कि भारतीय क्षेत्र में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों को घुसने की अनुमति कैसे दी गई। सरकार की तरह से इसी पर प्रतिक्रिया दी गई जिसमें 1950 के दशक के इतिहास से लेकर वर्तमान के सीमा विवाद को बयान में शामिल किया गया। हालांकि सरकार ने एक विस्तृत बयान जारी करने पर सहमति जताई लेकिन मौजूदा संकट पर पूर्ण चर्चा की विपक्ष की मांग को स्वीकार नहीं किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले एलएसी पर किसी भी तरह के उल्लंघन या चीन की सेना के अतिक्रमण से इनकार किया था। गृहमंत्री अमित शाह को सोमवार की रात अस्पताल में भर्ती कराया गया। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी या गृह मंत्री के बजाय सरकार की तरफ से रक्षा मंत्री को आगे किया गया जिन्होंने विपक्ष और देश को बहादुर सैनिकों के साथ खड़े होने की अपील करके एक सुरक्षित राष्ट्रवादी रणनीति अपनाई। उन्होंने कहा, 'हम अपने जवानों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलेंगे।'

इस संकट की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि अप्रैल से ही पूर्वी लद्दाख सीमा पर चीन की सेना की बड़ी तादाद और अतिरिक्त हथियार देखे गए। मई महीने की शुरुआत में पीएलए ने गलवान घाटी में भारत के पारंपरिक गश्ती तरीके में भी रुकावट डालने की कोशिश की। चीन ने कोंगका ला, गोगरा और पैंगोंग झील के उत्तरी तट सहित कई अन्य स्थानों पर भी अतिक्रमण करने की कोशिश की।

भारत के दावा वाले क्षेत्र पर चीन के कब्जे के किसी भी तरह के जिक्र से बचते हुए रक्षा मंत्री ने कहा, 'हमारे सैनिकों ने इन कोशिशों के खिलाफ जवाबी कदम उठाए।' उन्होंने कहा, 'हमने राजनयिक और सैन्य माध्यमों के जरिये चीन को सूचित किया है कि इस तरह की गतिविधियां यथास्थिति को बदलने का एकतरफा प्रयास है जो भारत को स्वीकार्य नहीं है।'

15 जून को चीन और भारत की सेना के बीच हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। इसका जिक्र करते हुए रक्षा मंत्री ने वाक्पटुता का सहारा लेते हुए वास्तविक घटनाओं को राष्ट्रवादी कलेवर के साथ पेश किया। उन्होंने कहा, 'जहां धैर्य की जरूरत थी वहां हमारे सैनिकों ने धैर्य का प्रदर्शन किया और जहां शौर्य की जरूरत थी, उन्होंने शौर्य का प्रदर्शन किया। हम बातचीत के माध्यम से मौजूदा हालात का समाधान करना चाहते है और चीन के साथ हमारी राजनयिक और सैन्य स्तर की बातचीत जारी है।' उन्होंने तीन सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने चर्चाओं में भारतीय पक्ष का मार्गदर्शन किया । पहला, दोनों पक्षों को एलएसी का सम्मान करना चाहिए; दूसरा, न तो पक्ष को यथास्थिति को परेशान करना चाहिए; और तीसरा, दोनों पक्षों को वर्षों से आए समझौतों और समझ का पालन करना चाहिए । उन्होंने कहा कि भारतीय पक्ष ने चर्चाओं के दौरान तीन मुख्य सिद्धांतों पर जोर दिया है। पहला कि दोनों पक्षों को वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करना चाहिए। दूसरा किसी भी पक्ष को अपनी तरफ से यथास्थिति का उल्लंघन करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और तीसरा दोनों पक्षों के बीच समझौतों और सहमतियों का पूर्ण तरीके से पालन होना चाहिए जो कई वर्षों की कोशिश के बाद बनी है।

फिलहाल चीन ने एलएसी पर बड़ी संख्या में सैनिक तैनात किए हैं और कोंगका ला, गोगरा और पैंगोंग झील के उत्तर और दक्षिण किनारों के क्षेत्रों में कई 'संघर्ष वाले क्षेत्र' हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने अपने सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए इन क्षेत्रों में प्रतिक्रियास्वरूप सैनिकों की तैनाती की है।

विस्तार से सीमा विवाद का जिक्र नहीं करते हुए राजनाथ ने कहा, 'मौजूदा स्थिति को लेकर कुछ संवेदनशील मुद्दे हैं  इसलिए मैं चाहकर भी ज्यादा विवरण नहीं दे सकता।'

एक जटिल विवाद को सरल बनाने की मांग करते हुए राजनाथ ने संसद में अनसुलझे सीमा विवाद से जुड़े सवाल का एक विस्तृत सारांश पेश किया। उन्होंने कहा कि चीन ने लद्दाख में 38,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र को हड़प लिया जबकि 1963 में पाकिस्तान ने चीन को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का तोहफा दिया। उन्होंने कहा कि चीन अरुणाचल प्रदेश में 90,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर भी अपना दावा करता है। उन्होंने कहा, 'चीन पारंपरिक सीमा रेखा को स्वीकार नहीं करता है।'

राजनाथ ने कहा कि दोनों देश इस बात पर सहमत हुए थे कि सीमा विवाद एक जटिल मुद्दा है जिसमें धैर्य की जरूरत है और सीमा पर शांति और सौहार्द के माहौल के साथ शांतिपूर्ण बातचीत के जरिये  निष्पक्ष, उचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि सीमा से जुड़ी एलएसी सामान्यतौर पर खींचा नहीं गया है और दोनों देशों की इस बात को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं कि एलएसी कहां खींचा गया है। एलएसी की साझा समझ को बढ़ाने के लिए 1990 से 2003 तक प्रयास किए गए लेकिन फिर चीन ने इसे बंद करने का फैसला किया। नतीजतन, कई स्थानों पर एलएसी को लेकर अतिव्यापी धारणाएं हैं।

नई दिल्ली और पेइचिंग दोनों ने एलएसी की इन 'अतिव्यापी धारणाओं' को ही लगातार सीमा से जुड़े टकराव के लिए दोषी ठहराया है जिसके लिए दोनों पक्षों को गश्ती करने की जरूरत पड़ती है ताकि दोनों देश दूसरे द्वारा दावा किए गए क्षेत्र को पार कर सकें।

सरकार का यह बयान पूर्वी लद्दाख में तनाव बढऩे के वक्त आया है और भारतीय था चीन के सैनिक सीधे एक दूसरे के साथ भिड़ रहे हैं क्योंकि वे पैंगोंग झील के दक्षिण में ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर कब्जा करना चाहते हैं ताकि इसका सामरिक फायदा मिले।

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