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कोछड़ दंपती के लिए प्रवर्तन निदेशालय ही आखिरी उम्मीद

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  September 14, 2020

अक्टूबर 2018 में आईसीआईसीआई बैंक से इस्तीफा देने के बाद चंदा कोछड़ मुलाकात के लिए आने वाले चंद लोगों से अक्सर कहती थीं कि पेशेवर स्तर पर सफल दंपती को लेकर भारतीयों की यह सोच उन्हें काफी परेशान करती कि एक पत्नी या पति अपने पेशेवर काम से जुड़ी संवेदनशील जानकारियों को एक-दूसरे से गोपनीय रख सकते हैं।

असल में वह कहना चाह रही थीं कि उन्होंने और उनके पति ने कारोबार को लेकर कभी भी आपस में चर्चा नहीं की और उन्हें एक-दूसरे के वाणिज्यिक फैसलों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता था। बुनियादी तौर पर वह वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के मालिक वेणुगोपाल धूत द्वारा अपने पति की फर्म न्यूपावर में किए गए निवेश पर उठे मिलीभगत के आरोपों को खारिज करना चाहती थीं। धूत की फर्म सुप्रीम एनर्जी ने चंदा के पति की फर्म में निवेश किया था।

प्रवर्तन निदेशालय को लगता है कि चंदा की 'पेशेवर गोपनीयता' वाली कहानी पूरी तरह बकवास है। निदेशालय का कहना है कि कोछड़ दंपती न केवल एक-दूसरे के कारोबारी सौदों पर करीबी नजर रखते थे बल्कि धोखाधड़ी एवं आपराधिक साजिशों के जरिये वे गैरकानूनी लाभार्थी भी थे।

चंदा के पति दीपक कोछड़ की गत दिनों हुई गिरफ्तारी के बाद उन्हें 19 सितंबर तक रिमांड पर भेजा जाना इस मामले में जारी जांच की एक परिणति को दर्शाता है। जांच एजेंसी ने आईसीआईसीआई बैंक द्वारा वीडियोकॉन समूह को दिए गए 1,875 करोड़ रुपये के कर्ज में अनियमितताओं एवं भ्रष्ट तरीके अपनाने के आरोपों की जांच के लिए कोछड़ दंपती एवं धूत के खिलाफ काले धन को सफेद करने का मामला दर्ज किया था। प्रवर्तन निदेशालय ने कहा है कि दीपक और धूत के बीच हुए लेनदेन के जरिये न्यूपावर और सुप्रीम एनर्जी के स्वामित्व को भी बदला गया।

इन गंभीर आरोपों के बावजूद कोछड़ दंपती के लिए इस मुसीबत से निकलने की सबसे बड़ी उम्मीद खुद प्रवर्तन निदेशालय ही है। यह एक बड़ी विडंबना है लेकिन इस एजेंसी का आरोपियों को सजा दिलवाने में रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है। और इसी बात से कोछड़ दंपती थोड़ी उम्मीद लगा सकते हैं। काला धन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत प्रवर्तन निदेशालय पिछले 14 वर्षों में महज 15 आरोपियों को ही सजा दिला पाया है। इस तरह 2005 में पीएमएलए के तहत जांच करने का अधिकार मिलने के बाद से एजेंसी हर साल औसतन एक मामले में ही सजा दिला पाई है।

न्याय व्यवस्था की लंबी देरी इस समस्या का एक हिस्सा है लेकिन इस एजेंसी के खराब ट्रैक रिकॉर्ड की व्याख्या केवल इसी आधार पर नहीं की जा सकती है। निदेशालय के कई फैसलों को तो खुद पीएमएलए न्यायाधिकरण ने भी पलटा है। ऐसा ही एक हालिया फैसला नीरव मोदी की बैंकों के पास गिरवी रखी संपत्तियां जब्त करने का था। पीएमएलए न्यायाधिकरण ने इन संपत्तियों को मुक्त करने का आदेश देते हुए मामले में 'अपर्याप्त जांच' के लिए प्रवर्तन निदेशालय को लताड़ भी लगाई थी।

न्यायाधिकरण ने निदेशालय के फैसले को अपील स्तर पर अपना केस मजबूत करने के लिए एक दुर्भावनापूर्ण एवं हताशा भरा कदम भी बताया था। न्यायाधिकरण ने एजेंसी की दलील नकारते हुए कहा था 'मानने की वजह संबद्ध अधिकारी का व्यक्तिनिष्ठ संतोष नहीं हो सकती है। यह एक मनमानी शक्ति नहीं है जिसका मशीनी तरीके से इस्तेमाल किया जाए।' उसके दो साल पहले तत्कालीन राजस्व सचिव हसमुख अढिया ने भी काला धन संबंधी मामलों में सजा की दर 'बेहद खराब' होने  पर चिंता जताई थी। अढिया ने कहा था कि प्रवर्तन निदेशालय का काम केवल अभियोजन शिकायतें दर्ज करना नहीं बल्कि दोषी ठहराए जाने की दर में खासा सुधार करना भी है।

निदेशालय के पास समुचित स्टाफ की कमी इस बदहाली की एक वाजिब वजह है। उसके लिए स्वीकृत पदों के आधे से भी अधिक खाली हैं। मसलन, कर्नाटक के कांग्रेस नेता डी के शिवकुमार के खिलाफ दर्ज काला धन मामले में एजेंसी का कानून अधिकारी जमानत अर्जी के खिलाफ बहस के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में हाजिर ही नहीं हुआ। उस अधिकारी के सहकर्मी ने बताया कि वह एक जिला अदालत में व्यस्त है और उसे उच्च न्यायालय पहुंचने में वक्त लगेगा।

लेकिन स्टाफ की कमी समस्या का केवल एक हिस्सा है। आर्थिक अपराधों की बढ़ती जटिलता को देखते हुए मौजूदा स्टाफ की गुणवत्ता भी एक गंभीर मुद्दा है। आखिर पैसे की आवाजाही का सिरा खोजना विशेषज्ञों का काम है। एजेंसी को अपनी ढांचागत क्षमता भी सुधारने की जरूरत है। देश भर में इसके 50 से भी कम दफ्तर हैं जबकि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के 100 से भी अधिक कार्यालय हैं।

इस एजेंसी को नए भगोड़े आर्थिक अपराधी कानून 2018 को लागू करने का जिम्मा भी सौंपा गया है। इस कानून के तहत एजेंसी को भगोड़े आर्थिक अपराधियों की देश के भीतर और बाहर की संपत्ति जब्त करने की शक्ति मिली है, भले ही वे अपराध से अर्जित न हों। इसमें एक व्यक्ति को तमाम अपकृत्यों के लिए भी आर्थिक अपराधी घोषित किया जा सकता है। मौजूदा सरकार ने सीबीआई की तरह प्रवर्तन निदेशालय के अफसरों के लिए भी एक विशेष प्रोत्साहन भत्ते की शुरुआत की है।

कई प्रेक्षकों का कहना है कि प्रवर्तन निदेशालय ने पिछले कुछ समय में अपना प्रदर्शन सुधारा है। लेकिन सजा दिलाने की दर बेहतर नहीं होने तक इससे खास भरोसा नहीं पैदा होगा।

हाई-प्रोफाइल लोगों को गिरफ्तार करना, फिर उन्हें जमानत मिल जाना और टीवी कैमरे दूर होते ही लंबे समय तक निष्क्रिय हो जाना पुरानी रवायत हो चुकी है। इससे निदेशालय के खिलाफ लगने वाले विच-हंट के आरोपों को ही मजबूती मिलती है। प्रवर्तन निदेशालय को अपनी अहमियत साबित करने के लिए अधिक मामलों को अंजाम तक पहुंचाना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक कोछड़ दंपती उम्मीद पर जी सकते हैं।

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