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आर्थिक सुधार का मार्ग लंबा, कठिन व कष्टप्रद

शंकर आचार्य /  September 14, 2020

चार महीने पहले मैंने एक आलेख में कोविड-19 महामारी के कारण सरकार द्वारा अचानक लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन को देखते हुए अर्थव्यवस्था को पहुंचने वाली अप्रत्याशित क्षति को लेकर दो तरह के परिदृश्य सामने रखे थे। शायद वह पहला मौका था जब आर्थिक गतिविधियों में तिमाही दर तिमाही गिरावट को लेकर निराशाजनक पूर्वानुमान पेश किए गए थे। एक अनुमान यह था कि वर्ष 2020-21 में वास्तविक जीडीपी 11 फीसदी गिरेगी जबकि पहली तिमाही में 25 फीसदी गिरावट आएगी। जबकि दूसरे परिदृश्य में पूरे वर्ष के दौरान 14 प्रतिशत और पहली तिमाही में 33 प्रतिशत गिरावट का अनुमान था। ये अनुमान ऐसे वक्त पर जताए गए थे जब विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, वित्त  मंत्रालय समेत लगभग सभी निवेश बैंक और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां 0 से 2 फीसदी सकारात्मक वृद्धि दर का कयास लगा रही थीं।

अब चंद रोज पहले राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने पहली तिमाही में जीडीपी में 24 फीसदी गिरावट का अनुमान जताया जो मेरे पहले परिदृश्य के समान था। चूंकि ऐसे तिमाही अनुमान प्राय: संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के साथ ही गैर कृषि क्षेत्र की घटनाओं को दर्ज कर पाने में नाकाम रहते हैं इसलिए बाद में  गिरावट के इस अनुमान में संशोधन होने की संभावना है। ऐसा इसलिए क्योंकि लॉकडाउन ने इन क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित किया है। ऐसे में जीडीपी में पहली तिमाही में आई गिरावट बढ़कर करीब 30 फीसदी तक जा सकती है। 24 फीसदी की गिरावट उत्पादन और आय में भारी गिरावट का संकेत देती है। यह जी-20 देशों में सर्वाधिक है। जैसा कि सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) ने इशारा किया यह शायद इसलिए हुआ क्योंकि भारत में शुरुआती दो महीनों का लॉकडाउन दुनिया का सबसे कड़ा लॉकडाउन था। इससे मिलने वाले आनुपातिक स्वास्थ्य संबंधी लाभ के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस दिशा में विश्वसनीय जवाब बाद में सामने आएंगे।

स्वाभाविक सी बात है कि अब पूरा ध्यान इस आर्थिक झटके के दुष्प्रभावों से निपटने पर है। सीईए का कहना है कि अंग्रेजी के 'वी' आकार का सुधार देखने को मिलेगा यानी तेज गिरावट के बाद तेज सुधार। मुझे डर है कि ऐसा नहीं होगा। मैंने मई के दोनों परिदृश्यों में कहा था कि दूसरी तिमाही में आंशिक सुधार होगा जबकि बाकी बची दो तिमाहियों में स्थिरता रहेगी। साल दर साल आधार पर दूसरी तिमाही में वृद्धि दर 10 से 12 फीसदी ऋणात्मक रहेगी जबकि तीसरी और चौथी तिमाही में यह क्रमश 5 से 7 और 4 से 5 फीसदी ऋणात्मक रहेगी। इन तमाम बातों को देखते हुए कह सकता हूं कि मेरे अनुमान काफी हद तक सच के करीब रहे हैं। बल्कि कुछ बेहतर ही नजर आ रहे हैं। यानी 2021-22 में पूरे वर्ष की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 2019-20 के स्तर से कम रहेगी। यह 'वी' आकार का सुधार तो नहीं है। आर्थिक सुधार के धीमा होने के अनुमान के पीछे कई वजह हैं। पहली बात, हमें समझना होगा कि केंद्र सरकार के लॉकडाउन के फैसले से आपूर्ति क्षेत्र को तगड़ा झटका लगा। जून में चरणबद्ध तरीके से लॉकडाउन समाप्त होने के बाद राज्य सरकारों की ओर से आंशिक लॉकडाउन लगाए जाते रहेे। इससे आपूर्ति शृंखला बुरी तरह बाधित हुई। यानी वर्ष के बचे हुए समय में आर्थिक उत्पादन आपूर्ति क्षेत्र की बाधाओं से अधिक निर्धारित होगा, बजाय कि मांग के। ऐसे में राजकोषीय प्रोत्साहन की मांगें गलत हैं। गरीबों और प्रभावितों को राहत देना सबसे बड़ी प्राथमिकता थी और है। सरकार ने कमजोर आपूर्ति व्यवस्था और खराब राजकोषीय हालात के बीच अपनी सीमा में काफी काम किया।

दूसरी बात, शुरुआती दौर में लगे कड़े लॉकडाउन ने केंद्र और राज्य सरकारों की पहले से खस्ता हालत को और बुरा बना दिया क्योंकि राजस्व का कोई जरिया नहीं बचा। यदि कोविड महामारी को हटा भी दें तो भी 2020-21 में केंद्र और राज्य सरकार का समेकित घाटा जीडीपी के 8 फीसदी के आसपास ठहरता। कोविड लॉकडाउन के बाद यह जीडीपी के 13 से 15 फीसदी के स्तर तक जा सकता है। यानी साल के अंत में सरकार का डेट/जीडीपी अनुपात 85-90 फीसदी के खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। भारी-भरकम ब्याज का बोझ और उधारी की आवश्यकताएं भविष्य की आर्थिक वृद्धि पर बोझ डालेगी और मुद्रास्फीति में इजाफा करेगी।

तीसरा फिलहाल जोखिम से बचने की प्रवृत्ति आर्थिक स्थितियों में सुधार की राह में सबसे बड़ी बाधा है। जोखिम से बचाव के उपाय संस्थानों की लागत बढ़ा रहे हैं और आपूर्ति पर असर हुआ है। कामगारों का जोखिम से बचना भी समस्या है। इतना ही नहीं आपूर्ति काफी प्रभावित है क्योंकि बड़ी तादाद में छोटे और मझोले उपक्रम अब काम नहीं कर पा रहे हैं। उपभोक्ता, खासकर वृद्धि और अमीर उपभोक्ता निकट संपर्क वाले लेनदेन से बच रहे हैं। एमेजॉन और फ्लिपकार्ट नाई की दुकान, हवाई या रेल यात्रा, रेस्तरां, होटल, पर्यटन और सेवा क्षेत्र के अन्य उद्योगों के विकल्प नहीं हो सकते।

चौथ, वित्तीय बिचौलिया क्षेत्र नए सिरे से दबाव में है क्योंकि ऋण और बकाये की स्थिति बेहद खराब नजर आ रही है। आरबीआई ने नियामकीय धैर्य दर्शाया है और न्यायालयों ने कर्जदारों के पक्ष में निर्णय दिए हैं। इससे वाणिज्यिक बैंकों और एनबीएफसी के लिए मुसीबत बढ़ी है। जमाकर्ताओं की बचत की दृष्टि से भी यह अच्छा संकेत नहीं है। इससे नया ऋण बहुत अधिक प्रभावित होगा। बैंकों और एनबीएफसी को उबारने की और घटनाएं सामने आएंगी। परंतु बड़ा सवाल यह है कि इसके लिए संसाधन कहां से आएंगे?

पांचवां, विश्व अर्थव्यवस्था सुधार की दिशा में अग्रसर है और इसके साथ ही विश्व व्यापार में भी सुधार हो रहा है। ऐसे में बाह्य बाजारों से आशा की जा सकती है कि वे तेजी के वाहक बनेंगे। खासतौर पर तेजी से सुधर रहे पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के बाजारों से। परंतु ऐसे अवसरों का लाभ लेने के लिए हमें संरक्षणवादी रुख को छोडऩा होगा और क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी में शामिल होना पड़ेगा। इसकी कितनी संभावना नजर आती है?

इन तमाम वजहों से मुझे नहीं लगता कि मध्यम अवधि में यानी 2021-22 के पहले आर्थिक वृद्धि में कोई खास सुधार देखने को मिलेगा। जैसा कि मैंने जून में लिखा था, मध्यम अवधि में 3 से 5 फीसदी की वृद्धि दर भी दूर की कौड़ी नजर आती है। आर्थिक सामाजिक और सामरिक परिणाम काफी हद तक नकारात्मक रहेंगे। परंतु इस विषय पर हम फिर कभी बात करेंगे।
(लेखक इक्रियर के मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)

Keyword: आर्थिक सुधार, वार्षिक वृद्धि दर, कोविड-19, लॉकडाउन, जीडीपी, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष,
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