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सर्वोच्च न्यायालय इस खाली समय में तलाशे नए समाधान

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  September 13, 2020

कोरोनावायरस के कारण न्यायालयों में बहुत कम मामलों की सुनवाई हो रही है। बहुत से न्यायाधीश अच्छी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाएं न होने और डिजिटल कौशल के अभाव के कारण लंबे समय से अटके मामलों को निपटा नहीं पा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में एक-तिहाई न्यायाधीश किसी समय विशेष पर मामलों की सुनवाई नहीं कर रहे हैं। इस खाली समय का इस्तेमाल बड़ी तादाद में लंबित मामलों और महामारी के कम होने पर नए मामलों की बाढ़ आने के आसार जैसी न्यायपालिका की समस्याओं के अदालत के स्तर पर ही समाधान खोजने में किया जा सकता है। लेकिन लॉकडाउन के इन पांच महीनों में शीर्ष कानूनविदों ने इन पर विचार-विमर्श करने के लिए समय नहीं दिया। आगे भी कुछ ऐसे अनुत्पादक महीने बीतने के आसार हैं, जो लंबित मामलों की तादाद के आंकड़े जुटाने और उनका विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त मौका दे रहे हैं। ताकि  अदालती प्रणाली में मामलों का अंबार लगाने वाली प्रक्रियाओं और परंपराओं की समीक्षा जैसे समाधान तलाशे जा सकें।

हालांकि सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक अदालत माना जाता है। लेकिन संविधान से जुड़े मामलों की संख्या संपत्ति मालिक-किरायेदार विवाद, सेवाओं में पदोन्नति या परिवार की संपत्ति के बंटवारे आदि से संबंधित आम मामलों की तुलना में बहुत कम है। पिछले साल तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एनरॉन-दाभोल भ्रष्टाचार मामले में समाधान का एक रास्ता दिखाया था। उन्होंने 17 साल पुराना मामला होने की वजह से इस पर ध्यान देना बंद किया। किसी ने शिकायत नहीं की। वह जानते थे कि समय जनता की याददाश्त से किसी भी निशान को मिटा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट के मुताबिक 19,492 मामले अंतिम सुनवाई के लिए तैयार हैं, जिनमें से बहुत से दो दशक से भी अधिक पुराने हैं। हालांकि देश एक आर्थिक संकट से जूझ रहा है, लेकिन ऐसे कर विवादों की संख्या आश्चर्यजनक है। उनमें प्रत्यक्ष कर याचिकाएं 2,431 हैं, जबकि अप्रत्यक्ष कर की याचिकाओं की संख्या 2,288 है। सबसे पहले की प्रत्यक्ष कर याचिका वर्ष 1992 की है। यह संभव है कि इन मामलों में विवाद की शुरुआत कम से कम एक दशक पहले न्यायाधिकरण, अपील निकाय और फिर उच्च न्यायालय से शुरू हुई होगी।

बीते दशकों के दौरान कर कानूनों में बड़ा बदलाव आया है, जिससे कानूनी मुद्दे अप्रासंगिक बन गए हैं। यह भी संभव है कि करदाताओं की अभियोग में रुचि न रही हो या वे खुद ही न रहे हों।

प्रत्यक्ष कर पर सीएजी की रिपोर्ट (2017-18) के मुताबिक विभिन्न अदालतों में 82,643 मामले लंबित थे, जिनमें 4,42,825 करोड़ रुपये फंसे हुए थे। इनमें से 6,224 मामले सर्वोच्च न्यायालय में अटके हैं, जिनमें 11,773 करोड़ रुपये की राशि फंसी हुई है। वहीं 39,066 मामले उच्च न्यायालयों में लंबित हैं, जिनमें 196 लाख करोड़ रुपये फंसे हुए हैं। राजस्व विभाग के अपनी याचिकाओं में जीत हासिल करने के आसार बहुत कम हैं। वर्ष 2017-18 की आर्थिक समीक्षा में दर्शाया गया है कि अथॉरिटी प्रत्यक्ष कर के 87 फीसदी मामले हार गईं, जिसमें 73 फीसदी मामले अकेले सर्वोच्च न्यायालय में हारे। इन मामलों से करदाताओं का समय और पैसा जुुड़ा होता है, इसलिए इन मामलों को जल्द से जल्द चयनित और खत्म किया जाना चाहिए। इन विभिन्न प्रकार के आर्थिक मामलों के अलावा ऐसे बहुत से संवैधानिक सवाल हैं, जो बड़े पीठों द्वारा अंतिम सुनवाई के लिए तैयार हैं। इनमें 90 याचिकाओं की सुनवाई नौ सदस्यीय पीठ करेगा, 12 मामलों की सात सदस्यीय पीठ, 113 मामलों की पांच सदस्यीय पीठ और 376 मामलों की तीन सदस्यीय पीठ सुनवाई करेगा।

मुख्य न्यायाधीश को निपटाने के लिए मामलों को चुनने, उनके समय और उनकी सुनवाई के लिए न्यायाधीशों के नाम तय करने का प्रशासनिक अधिकार मिला हुआ है। वर्चुअल अदालत आगे भी बरकरार रहेंगी, इसलिए बहुत से पुराने मामलों को उन्हें सौंपा जा सकता है। आगामी दिनों में मुख्य न्यायाधीश के लिए प्रमुख नीतिगत फैसला उन मामलों को अलग करना होगा, जो फिजिकल और वर्चुअल अदालतों के समक्ष जाएंगे। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए उन मामलों को वरीयता दी जानी चाहिए, जिनसे कानून का बड़ा सवाल जुड़ा है। सैकड़ों पुराने लंबित मामलों पर गोगोई जैसा प्रहार कर उन्हें स्मृति के दायरे में भेजा जा सकता है। बहुत से वादियों को अपने दावों पर समझौता करने और अपनी नियति पर झुकने को लेकर कोई एतराज नहीं होने की संभावना है।

एक अन्य संबंधित कदम मामलों को सूचीबद्ध करने के दिशानिर्देश बनाना है। अगर कुछ निश्चित पारदर्शी नियम होते तो हाल में न्यायालय की आलोचना को टाला जा सकता था। जो न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के कगार पर हैं, उन्हें महत्त्वपूर्ण मामले नहीं दिए जाने चाहिए। उदाहरण के लिए केशवानंद भारती मामले में इंदिरा गांधी मूलभूत अधिकारों पर पहले के फैसले को जल्द से जल्द पलटवाना चाहती थीं। बाद में बहुत से लेखकों ने पर्दे के पीछे उनकी अनैतिक गतिविधियों को ग्राफिक के हिसाब से दर्ज किया है, जिनमें आसानी से प्रभावित होने वाले न्यायाधीश भी शामिल थे। अयोध्या मामला सबसे बड़े विवादित मामलों में से एक है, जिस पर मुख्य न्यायाधीश की अदालत में वकीलों ने जिरह की। इसमें यह पेच था कि इसकी सुनवाई 2019 के आम चुनावों से पहले हो या बाद में। अगर मामलों की सूचीबद्धता के ठीक से परिभाषित मापदंड, माना कि कालक्रमानुसार होंगे तो सुनवाई के समय को लेकर विवाद की कोई जरूरत नहीं होगी। दुर्भाग्य से सभी मुख्य न्यायाधीश एक भरोसेमंद प्रणाली विकसित करने से बचे हैं। शायद इसकी वजह यह हो कि उनके हाथ में अप्रतिबंधित विवेकाधीन शक्तियां हों। या वे अल्प कार्यकाल की वजह से पंगु हों, जिसने उन्हें ऐसे समय दीर्घकालिक समाधान के लिए हतोत्साहित किया हो, जब वे अपने खुद के भविष्य के बारे में सोच रहे हों। इसलिए अब बदलाव की पहल बार की तरफ से होनी चाहिए, जो बराबर का भागीदार है।

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