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वास्तविक विवाद रेखा

संपादकीय /  September 13, 2020

विदेश मंत्री एस जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने मॉस्को में 10 सितंबर को शांघाई सहयोग समझौते से इतर जो पांच सूत्री संयुक्त वक्तव्य जारी किया, वह व्यापक वार्ता सिद्धांतों के दोहराव के रूप में निरपवाद है। बहरहाल, यह प्रश्न शेष है कि यह वक्तव्य वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर दोबारा शांति स्थापित करने के लिए व्यावहारिक और दीर्घकालिक खाका मुहैया करा पाएगा या नहीं। संयुक्त वक्तव्य व्यापक तौर पर यह सुझाता है कि 'भारत-चीन रिश्तों के विकास को लेकर नेताओं की आपसी सहमति जिसमें मतभेदों को विवाद न बनने देना शामिल है' के आधार पर वार्ता का विकल्प शेष है। यह माना जा सकता है कि यहां वुहान सहमति का संदर्भ दिया गया है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच वुहान में अप्रैल 2018 में हुई अनौपचारिक वार्ता के दौरान बनी थी।

डोकलाम में दो महीने के गतिरोध के तुरंत बाद सामने आई वुहान सहमति में एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर समूची भारत-चीन सीमा पर शांति कायम रखने की बात कही गई थी। इस सहमति में कुछ अहम बातें इस प्रकार थीं: दोनों सेनाएं आक्रामक व्यवहार से बचेंगी, भरोसा पैदा करने वाले उपाय अपनाए जाएंगे और सभी स्तरों पर संचार संपर्क मजबूत किए जाएंगे। ये सिद्धांत अक्टूबर 2019 में मोदी द्वारा ममल्लपुरम में आयोजित दोनों नेताओं की एक अनौपचारिक शिखर बैठक में दोहराए गए थे। इस वर्ष मार्च से ही चीन की सेना ने जानबूझकर इन सिद्धांतों का उल्लंघन किया है और यह बात अनौपचारिक शिखर बैठकों के सीमित महत्त्व को रेखांकित करती है।

ऐसे में जयशंकर और वांग के संयुक्त वक्तव्य को ज्यादा से ज्यादा इस संकेत के रूप में देखा जा सकता है कि पीछे हटने के बारे में कोई भी सहमति सेना के स्तर पर बनेगी। दिक्कत यह है कि इस स्तर पर बातचीत से अब तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है। जून में हाथापाई और सीधे संघर्ष के साथ तनाव बढ़ा और इस महीने एक ऐसी सीमा पर गोलीबारी हुई जो बीते 45 वर्षों से अपेक्षाकृत शांत बनी रही है। इससे यही संकेत मिलता है कि जमीन पर गहरा अविश्वास है और यह स्पष्ट नहीं है कि एलएसी की बाहरी सीमा को लेकर कोई औपचारिक समझौता नहीं होने के कारण चीन पीछे लौटने को तैयार होगा भी या नहीं। भारत के लिए समस्या का एक अहम पहलू है चीन के इरादों का साफ नजर न आना। चीन ने एलएसी को लेकर अपनी समझ को स्पष्ट करने से निरंतर इनकार किया है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसके कारण दोनों देशों के रिश्ते स्थायी रूप से अस्थिर हैं। चीन के इरादों के बारे में अंतिम तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ उन्हें बदलता रहता है।

वर्ष 2018 में डोकलाम के बाद हुई वुहान बैठक उस समय हुई थी जब अमेरिका चीन के लिए नई चुनौतियां पेश कर रहा था। उसने कारोबारी जंग शुरू कर दी थी, उत्तर कोरिया के किम जोंग उन तक पहुंच बनाई थी और चीन के साझेदार ईरान के साथ परमाणु समझौता रद्द करने वाला था। तब से इन मुद्दों की जगह कोविड-19 महामारी के लिए चीन के जिम्मेदार होने और चीनी कंपनियों के व्यवहार को लेकर बढ़ते वैश्विक तनाव ने ले ली है। हुआवे पर कई देशों का प्रतिबंध इसका उदाहरण है। एलएसी पर सेना की तैनाती के साथ चीन के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और लोकप्रिय ऐप पर प्रतिबंध लगाने की भारत की प्रतिक्रिया भारत के सीमित धैर्य की परिचायक है। परंतु दोनों देशों की सैन्य और आर्थिक असमानता को देखते हुए ये कदम भी सीमित असर वाले हैं। ऐसी अनौपचारिक बैठकों से अस्थायी राहत ही मिल सकती है। भारत सरकार को दीर्घकालिक तैयारी करनी चाहिए।

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