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'भाषा जनता के बीच में बनती है, जनता ही बचा सकती है'

संदीप कुमार /  09 13, 2020

बीएस बातचीत

 कुमार अंबुज समकालीन हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। 'क्रूरता', 'किवाड़', 'अतिक्रमण', 'अनंतिम' और 'अमीरी रेखा' जैसे काव्य संग्रहों से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले कुमार अंबुज को 'भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार', 'केदार सम्मान', 'श्रीकांत वर्मा पुरस्कार' समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। उनकी एक कविता को पेंगुइन रैंडम हाउस प्रकाशन ने महामारी पर केंद्रित विश्व की 100 चयनित कविताओं के संकलन 'सिंगिंग इन द डार्क' में शामिल किया है। प्रस्तुत है संदीप कुमार से उनकी बातचीत:

बिजनेस स्टैंडर्ड क्या हिंदी भाषा में केवल रचनाकर्म से जीविकोपार्जन किया जा सकता है?

सिर्फ रचनाकर्म से आजीविका चलाना दुष्कर है। रचनाकर्म के अलावा कोई व्यावसायिक कार्य या नौकरी जरूरी है। खासतौर पर आपका परिवार है तब। अथवा साहित्यिक पत्रकारिता, अनुवाद, प्रकाशन जैसा कुछ काम साथ में करना होगा। हिंदी कवियों के लिए तो यह दुस्साहसिक है। यदि लिखने से संतोष, निजात और खुशी मिलती है तो साहित्य एक बेहतर जगह है लेकिन आजीविका के लिए नहीं।

मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान हिंदी पर जोर देता है। हिंदी देश को जोडऩे वाली स्वाभाविक भाषा है या इसे थोपा जा रहा है?

यह औपचारिक जोर है। यदि सचमुच बेहतरी चाहते हैं तो सरकारी कामों में, न्यायालय में हिंदी को उच्चतर विकल्प का स्थान दीजिए। 'क' क्षेत्र में हिंदी में कामकाज शतप्रतिशत कर दीजिए। 'क' क्षेत्र में तो कोई विरोध नहीं होगा। 'ख' क्षेत्र में भी आसानी से लागू किया जा सकता है। त्रिभाषा फार्मूला विस्मृत कर दिया गया है। आप एक अंग्रेजीदां पीढ़ी तैयार करेंगे तो हिंदी थोपी हुई और बेकार भाषा ही लगेगी। हिंदी ही क्यों, अन्य भारतीय भाषाओं को भी आप इस तरह मुश्किल में डाल देंगे। हिंदी समावेशी भाषा तब बनेगी जब उसे सबके लिए उपयोगी, ग्राह्य और अपनत्व भरी बनाने का उपक्रम किया जाएगा। हिंदी में काम करने की अधोसंरचनाएं विकसित करना होगा। अभी हालत यह है कि शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक परिदृश्य में महज हिंदी या क्षेत्रीय भाषा जाननेवाला परेशान हो सकता है।

अंग्रेजी आज भी अभिजात वर्ग की भाषा है। हिंदी के भविष्य के बारे में आपकी राय?

किसी भी समाज में अभिजात या प्रभुत्वशाली वर्ग की भाषा और विचार ही शेष समाज पर थोप दिए जाते हैं। यही शक्ति संरचना है। हमारे देश में भी स्थिति भिन्न नहीं है। हिंदी की लड़ाई सरकार नहीं लड़ेगी, जनता को लडऩा पड़ेगा। भाषा जनता के बीच में बनती है, जनता ही बचा सकती है। हिंदी को शिक्षा और रोजगार की भाषा नहीं बनाया जाएगा तो उसका चिरायु होना संदिग्ध है। साहित्य अपने समाज में उपस्थित विचारशीलता, प्रतिवाद, स्वप्नशीलता, परंपरा, आधुनिकता, संस्कृति और संवेदना का प्रबल पक्ष पेश करता है। लेकिन केवल साहित्य भाषा को बहुत दूर तक नहीं बचा सकता। भाषा की रक्षा की लड़ाई जमीनी है, सामाजिक और राजनीतिक भी।

हिंदी साहित्य और हिंदी कविता का समकालीन राजनीति में कोई हस्तक्षेप है? क्या यह राजनीतिक या वैचारिक उद्वेलन को जन्म दे रहे हैं?

कुछ लेखक, कवि हैं जो वैचारिक तौर पर अपने लिखे से लगातार हस्तक्षेप कर रहे हैं। जबकि बौद्धिकता के विरोध में वातावरण बनाया जा रहा है। यदि आप बुद्धिजीवियों की बात नहीं सुनेंगे तो क्या बुद्धिहीनों की बात सुनी जाएगी। लेखक, विचारक, वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, ये समाज की थाती होते हैं। उनका सम्मान, उनकी रक्षा की जाना चाहिए। हालांकि लेखकों का बहुलांश अपने लेखन में विचार से, आवश्यक प्रतिवाद से बचने की कोशिश कर रहा है। वे नहीं समझ पा रहे हैं कि जैसा एदुआर्दो गैलियानो ने लिखा है: कलम आपकी सबसे बड़ी रक्षक भी है। भय, लोभ, प्रतिबद्धता, वैचारिकता का अभाव इत्यादि इसके कारण हो सकते हैं। इसलिए उतना उद्वेलन नजर नहीं आ रहा, जो अन्यथा संभव था।

रचनात्मक रूप से आपको लिखने का दबाव कब महसूस होता है?

रोजमर्रा की घटनाओं, पारिवारिक, राजनीतिक और सामाजिक विडंबनाओं के उद्वेलन से। यह इस तरह घेर सकता है कि आपके 'सेफ्टी वॉल्व' उसे रोकने में असमर्थ हो जाते हैं। कुछ लिखकर व्यक्त करने में राह दिखती है कि शायद मैं यही कुछ कर सकता हूँ। यही ताकत है, यही सीमा। इस प्रक्रिया में जो तकलीफ, बेचैनी और घाव हैं या कोई प्रसन्नता, पदचाप और संगीत है तो इन्हें किसी स्थूल, ठोस रूप में नहीं, किसी यूटोपिया, रूपक या बिंब में बेहतर बताया जा सकता है। लेखक होने का दायित्वबोध भी धीरे-धीरे शरीक होता है क्योंकि आप समाज का हिस्सा हैं। इस जवाबदारी से कोई सच्चा लेखक पलायन नहीं कर सकता।

मौजूदा आर्थिक-सामाजिक-सियासी हालात को बतौर  रचनाकार आप कैसे देखते हैं?

इस महादेश की पहली जरूरत सांस्कृतिक वैविध्य को बचाये रखना है। संवैधानिक नागरिक अधिकार, सम्यक न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, लोकतांत्रिकता को न केवल बनाये रखना है बल्कि उन्हेंं उच्चतर स्तर पर ले जाना चाहिए। सरकारी संस्थानों और उपक्रमों की रक्षा की जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन सेवाओं को आम आदमी की पहुंच में लाया जाए। ये विकास के सच्चे पैमाने हैं। लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। पहिया उल्टा घूम रहा है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। नागरिक के रूप में हम अनिर्णय, आत्मावरोध, अनिश्चितता और संशय में फंसते दिख रहे हैं। सरकार का अपने आप में कोई चेहरा या हृदय नहीं होता लेकिन जो महत्त्वपूर्ण लोग सरकार चलाते हैं, उनका चेहरा और हृदय ही एक तरह से सरकार का प्रतिनिधित्व करता है। यदि किसी का हृदय और मस्तिष्क मरुस्थल की तरह हो जाएगा तो तमाम संवदेना की बारिश भी उसमें नमी पैदा नहीं करेगी। वह सब कुछ सोख लेगा और मरुस्थल ही बना रहेगा। जनसाधारण और वंचितों के लिए करुणा और फिक्रमंदी अपेक्षित है। अमीरों का हित साधना सरकार का मुख्य काम नहीं हो सकता।

श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं की भूमिका क्या हो सकती है। आप पसंद कैसे तय करते हैं।  

संसार में इतने लेखक, इतनी रचनाएं श्रेष्ठतम में वर्गीकृत की जा सकती हैं कि उन सबसे गुजर पाना किसी के लिए मुमकिन नहीं। आप अपनी दिलचस्पी  और विवेक के अनुसार अनवरत चयन करते रहते हैं। यही उपाय है। एक अच्छी रचना अपने समकाल के लिए अग्रिम हो सकती है। उसमें अपने संसार का भविष्य भी लक्षित किया जा सकता हैं। उसकी स्थानीयता में वैश्विक दृष्टि निवास करती है। साहित्य समाज का आईना भर नहीं है, वह विमर्श है, आशंका है और आशा है। वह जितना परंपरा, इतिहास और समकालीनता में स्थित है, उतना ही अपने आने वाले समय में भी। वह पुनरावलोकन है तो नया भाष्य भी है। वह जितना संभ्रम है, उतना यथार्थ भी।

कविताओं की ओर रुझान कैसे हुआ?

जनता वाचनालयों की भूमिका याद आती है। ये वाचनालय जयंतियों और त्योहारों के बहाने स्कूली बच्चों के लिए निबंध, वाद-विवाद, भाषण, कविता के आयोजन या प्रतियोगिताएं करते थे। मनुष्य अपनी स्वाभाविक रुचियों की तरफ जाने की कोशिश बचपन से ही करता है। पिता के तबादलों की वजह से गांवों के अलावा कुछ कस्बों में रहने का अवसर मिला। इन जगहों में बहुत फुरसत थी और इत्मीनान। उनसे किसी आत्मीय व्यक्ति की तरह मेरा संवाद संभव था। इइन अविस्मरणीय जगहों ने मुझे कई प्रकृति सहचर के अवसर, सामाजिक और किशोरावस्था को चोट पहुंचाने वाले अनुभव दिए। उनसे जो रचनात्मक ऊर्जा, सर्जनात्मक उन्माद मिला, सोचता हूं कि वही सब लेखक हो सकने के लिए जरूरी, व्यग्र हारमोन में बदलता चला गया।

अच्छी रचनाएं किन कारणों से प्रिय रचनाओं में बदल जाती हैं।

यदि कोई रचना पढ़कर आप छूटी संवेदनाओं, विस्मृत संबंधों, जगहों की तरफ लौट सकते हैं अथवा अपने अनुभवों, स्मृतियों, सपनों या यथार्थ में उनसे पुनर्सबंध बना पाते हैं, तो वह रचना आपसे अटूट रिश्ता बना लेती है। एक अच्छी रचना चीजों को, विचारों को नये आयाम, नयी चमक और अब तक ओझल रहे तरीकों से समझने की दृष्टि देती है। उनमें जड़ता के विरुद्ध एक नये जीवन का प्रस्ताव भी विन्यस्त होता है। वह आपकी अब तक की सौंदर्याभिरुचियों पर बहस करती है। बेहतर बदलावों के लिए वह तार्किक और संवेदनात्मक रूप से प्रेरित करती है।

हालांकि वह ऐसी यात्रा पर भी ले जा सकती है जो आपको किसी नवोन्मेष, किसी पीड़ादायक अनुभव या अजायबघर के सामने ले जाकर छोड़ दे, लेकिन आपको यह सार्थकता का पर्यायवाची लगे। जीवन के लिए किसी नैतिक ऊर्जा या सर्जनात्मकता की तरह प्रतीत हो। बड़ी रचनाएं यही करती हैं और आपकी प्रिय हो जाती हैं।

'किवाड़', 'क्रूरता', 'खाना बनाती स्त्रियां', 'अमीरी रेखा', 'ब्याहता बहनें', 'जेब में सिर्फ दो रुपये', 'तु हारी जाति क्या है' जैसी अनेक चर्चित कविताओं के अलावा आपकी कुछ प्रिय कविताओं के बारे में भी बताएं।

'प्रिय' तो कई कविताएं हैं मगर कुछ शीर्षक यहां याद कर सकता हूं: 'सरकारी मौत एक अंधविश्वास है', 'जंजीरें', 'नयी स यता की मुसीबत', 'अन्याय', 'यहां पानी चांदनी की तरह चमकता है', 'चोट', 'मां अतिथि है', 'कवि की अकड़', 'हारमोनियम की दुकान से', 'मेरा प्रिय कवि', 'यहां तक आते हुए', 'पत्र लिखना', 'चंदेरी' आदि। ये इसलिए प्रिय हैं कि इन्हें लिखने के बाद लंबी व्यग्रता बनी रही।

आपने कविता संग्रहों के नाम लगभग एक शब्द के ही चुने हैं। उन्हें काव्यात्मक, लयात्मक शीर्षक नहीं दिए। ऐसा क्यों।

संसार में समकालीन कविता का अधिकांश गद्यात्मकता में ही विकसित और संभव हो रहा है। मेरा समूचा कविकर्म इसी रूप, इसी शिल्प में है, इसलिए शीर्षक के लिए कोई लिरिकल वाक्य खोजना मुझे विरोधाभासी और अनावश्यक रूप से रूमानी लगता है। दूसरा यह कि अपने प्रत्येक संग्रह की प्रकृति अनुसार मुझे एक-दो शब्दों में ही उपयुक्त शीर्षक मिल गए। जैसे 'क्रूरता', 'अनंतिम', 'अतिक्रमण', 'अतिक्रमण', 'किवाड़', 'अमीरी रेखा' आदि। ये सब उस दौर का भी परिचय दे सकते हैं, जिसमें से संकलित कविताएं संभव हुईं। इन्हीं शीर्षकों की कविताएं भी संग्रहों का हिस्सा हैं।

आपका विश्व सिनेमा और क्लासिक्स से प्रेम जाहिर है। सोशल मीडिया पर आपके लिखे में और कुछ कविताओं में इनके संदर्भ भी हैं। एक कवि को सिनेमा या अन्य कला माध्यम किस तरह प्रभावित करते हैं। क्या पाठक विश्व सिनेमा पर एक पुस्तक की अपेक्षा कर सकते हैं।

अच्छा सिनेमा साहित्य और संगीत का चाक्षुस, समवेत कला समुच्चय है। हिंदी इतर सिनेमा को प्राय: सबटाइटल्स के साथ देखने की जरूरत होती है। इस तरह वह टेक्स्ट का एक पाठ भी है। विष्णु खरे की एक किताब का नाम ही है- 'सिनेमा पढऩे के तरीके। इसमें सिनेमा की समझ को लेकर अनेक महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। लेखक के लिए दूसरे कलानुशासनों में आवाजाही संपन्नतादायक है। कलाओं का एक आपसी सर्जनात्मक संबंध होता है। वे अभिव्यक्ति के नानाविध रूप और शिल्प के संदर्भ में न केवल प्रेरित करती हैं, बल्कि चुनौती भी देती हैं। वहां कथा कहने के अप्रत्याशित तरीके दिख सकते हैं और उसे व्यंजित करने के नये उपक्रम भी। केवल कविताओं, कहानियों, संगीत, चित्रकला, लेखकों-कलाकारों की जीवनियों और स यता की पाश्विकताओं पर ही विशाल सं या में अद्वितीय फिल्में हैं। हतप्रभ करने की हद तक। और यह महज सिनेमेटोग्राफी की वजह से नहीं।

प्रसंगवश, यह कि पेंटिंग्स, खासतौर पर एब्स्ट्रैक्ट कला मुझे बहुत आकर्षित करती है। इस विषय पर एक कहानी भी लिख चुका हूं- 'आर्ट गैलरी'। सिनेमा पर किसी किताब के बारे में कुछ सोचा नहीं है। इसका उत्तर है- 'मैं खुद भी आशा करता हूं।'

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