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जीएसटी क्षतिपूर्ति पर केंद्र से नाखुश कुछ राज्य

ए के भट्टाचार्य /  September 11, 2020

जिस तरह से केंद्र ने वर्ष 2020-21 में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) राजस्व में आई कमी से राज्यों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए रखी गई मांग पूरी करने की कोशिश की है, उससे कुछ राज्य काफी नाखुश हैं। यह मुद्दा केंद्र एवं इन राज्यों के बीच एक बड़े विवाद का रूप ले चुका है। इस मसले का समाधान जिस तरह होता है उससे न केवल देश के सबसे बड़े अप्रत्यक्ष कर सुधार का भविष्य बल्कि केंद्र-राज्य राजकोषीय संबंधों की प्रकृति और भारत में संघवाद का आकार भी तय होगा।

इस विवाद का व्यापक स्वरूप कुछ इस तरह है। केंद्र ने गणना की है कि चालू वित्त वर्ष में राज्यों की राजस्व क्षति करीब 3 लाख करोड़ रुपये रहेगी। यह आंकड़ा सालाना नॉमिनल राजस्व वृद्धि दर के 14 फीसदी रहने के अनुमान पर आधारित है। लेकिन समस्या यह है कि इतनी बड़ी राजस्व क्षति के बीच केंद्र से राज्यों को दी जाने वाली जीएसटी क्षतिपूर्ति 65,000 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होगी। इस तरह नुकसान एवं क्षतिपूर्ति में फासला काफी बड़ा है।

केंद्र सरकार ने दो विकल्प रखे हैं। पहले प्रस्ताव में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) राज्यों के लिए उधारी जुटाने की एक खास विंडो की व्यवस्था करेगा जिससे वे 97,000 करोड़ रुपये की राजस्व क्षति की भरपाई कर सकेंगे। इस विकल्प को अपनाने वाले राज्यों को उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में 0.5 फीसदी के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में अतिरिक्त छूट भी मिलेगी। वहीं दूसरा विकल्प अपनाने वाले राज्यों को केंद्र बाजार से 2.35 लाख करोड़ रुपये उधारी जुटाने में मदद करेगा लेकिन उनकी कुल उधारी सीमा में कोई छूट नहीं दी जाएगी।

दोनों ही विकल्पों में जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर शुल्क को पांच वर्षों के संक्रमण काल से आगे तक बढ़ा दिया जाएगा जो पहले जून 2022 में खत्म होने वाला था। इससे मिलने वाले अतिरिक्त राजस्व का इस्तेमाल राज्य अपने कर्ज की अदायगी में करेंगे। हालांकि पहले विकल्प को चुनने वाले राज्य इस उपकर से संग्रहीत राशि को अपने ब्याज एवं कर्ज को चुकाने में कर सकेंगे लेकिन दूसरे विकल्प वाले राज्य इस रकम से केवल अपने मूल कर्ज को ही लौटा सकेंगे।

आखिर दो तरह की योजनाएं क्यों होनी चाहिए? केंद्र का शायद यह मानना है कि जीएसटी क्षतिपूर्ति अधिनियम 2017 'जीएसटी के क्रियान्वयन से होने वाली राजस्व क्षति के एवज में राज्यों को की जाने वाली क्षतिपूर्ति' के लिए ही बनाया गया था। जीएसटी क्रियान्वयन से इस साल 97,000 करोड़ रुपये की राजस्व क्षति होने का अनुमान है। लिहाजा पहली योजना चुनने वाले राज्यों को आरबीआई की खास विंडो के जरिये बाजार से उधारी जुटाने पर विशेष सुविधा मिलेगी।

दरअसल केंद्र की दलील है कि 97,000 करोड़ रुपये से इतर 1.38 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि उधारी के जरिये जुटाने की योजना का हिस्सा बनने वाले राज्यों को थोड़ी अधिक लागत चुकानी होगी क्योंकि यह राजस्व क्षति कोविड-19 की पृष्ठभूमि में फैली आर्थिक सुस्ती की वजह से है। ऐसे राज्यों के साथ अलग बरताव होना चाहिए, उन्हें ब्याज की लागत चुकानी होगी और अतिरिक्त उधारी की सुविधा से भी वंचित किया जाए।

यह केंद्र द्वारा दोनों विकल्पों के साथ एक शर्त जोडऩे जैसा है। यह शर्त कुछ ऐसी है कि अगर आप कम उधारी दायरे के भीतर रहते हों तो आपको कुछ खास रियायतें दी जाएंगी लेकिन अगर आप महामारी की वजह से राजस्व में आई सामान्य गिरावट की भरपाई के लिए बाजार से उधारी जुटाना चाहते हो तो आपको उसकी कीमत चुकानी होगी।

इस विभेदकारी तरीके की वजह से राज्य केंद्र से खफा हैं। इस विवाद का जन्म जीएसटी क्षतिपूर्ति अधिनियम के बारे में दोषपूर्ण समझ से हुआ है। इस कानून के प्रावधानों में जीएसटी क्रियान्वयन से होने वाली राजस्व क्षति और किसी अन्य कारण से होने वाली राजस्व क्षति के बीच कोई भी भेद नहीं किया गया है। इस अधिनियम की धारा 3, 6 और 7 में स्पष्ट उल्लेख है कि राज्यों को दिया जाने वाला राजस्व 14 फीसदी की नॉमिनल वृद्धि दर पर आधारित होगा और इसकी गणना जीएसटी के न रहने पर राज्य को मिलने वाले राजस्व को ध्यान में रखते हुए की जाएगी। इस तरह राज्यों की राजस्व क्षति से दो अलग योजनाओं के तहत निपटने की कोशिश कानूनी तौर पर शायद टिकाऊ न हो।

राज्यों की नाखुशी का दूसरा कारण केंद्र का वह तर्क है कि राज्यों के नुकसान की भरपाई वह भारत की संचित निधि से नहीं कर सकता है। सैद्धांतिक तौर पर इस तर्क में दम है लेकिन क्षतिपूर्ति अधिनियम में अगस्त 2018 में किए गए संशोधन से यह दलील थोड़ी कमजोर हो गई है।

पुराने कानून में प्रावधान था कि क्षतिपूर्ति उपकर को जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष में जमा किया जाएगा जो भारत के लोक लेखा का ही एक हिस्सा होगा। इसमें यह भी कहा गया था कि संक्रमण काल के अंत में इस कोष में बची रकम के आधे हिस्से को भारत की संचित निधि में भेज दिया जाएगा और बाकी रकम को राज्यों में उनके अवदान के अनुपात में बांट दिया जाएगा।

लेकिन अगस्त 2018 में इस कानून में एक अहम बदलाव कर दिया गया। संशोधन के बाद केंद्र को यह अनुमति मिल गई कि वह जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष में बची आधी रकम को संचित निधि में एक वित्त वर्ष में कभी भी भेज सकता है। इस तरह केंद्र को संक्रमण काल खत्म होने के पहले ही अनुप्रयुक्त उपकर संग्रह की आधी राशि को संचित निधि में भेजने की अनुमति मिल गई। अगर इस राशि को संचित निधि में कभी भी स्थानांतरित किया जा सकता है तो महामारी की वजह से उपजे इस संकट के समय इसका उलट करने से निश्चित रूप से परहेज नहीं होना चाहिए।

राज्यों के असंतोष का तीसरा और सबसे अहम कारण यह है कि जीएसटी क्षतिपूर्ति अधिनियम को अंतिम रूप देते समय जिस भाव से चर्चा हुई थी, अब उसका सम्मान नहीं किया जा रहा है। जीएसटी परिषद की दिसंबर 2016 में हुई सातवीं बैठक में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि राज्यों को क्षतिपूर्ति उपकर संग्रह से की जानी चाहिए और इसमें कोई कमी होने पर परिषद द्वारा स्वीकृत तरीके से उसकी पूर्ति की जा सकती है।

परिषद की जनवरी 2017 में हुई आठवीं बैठक में तय किया गया कि क्षतिपूर्ति कोष में रकम होने पर जीएसटी परिषद को अतिरिक्त राशि जुटाने के तरीके के बारे में फैसला करना चाहिए। बाजार से उधार लेने की स्थिति में उसका भुगतान छठे साल या उसके बाद होने वाले उपकर संग्रह से किया जा सकता है।

ऐसे में विवाद क्यों खड़ा हुआ है? जीएसटी परिषद की पिछली बैठकों में यह तय हो चुका है कि क्षतिपूर्ति राशि में कमी होने पर बाजार से उधारी का रास्ता अपनाया जाएगा। इस पर भी फैसला परिषद को ही करना चाहिए कि बाजार से उधारी किसे लेनी चाहिए और क्या यह दो खातों में अंजाम दी जाए? अगर इस पर सहमति नहीं बन पाती है तो मतदान का तरीका अपनाना होगा।

मौजूदा स्थिति में मतदान पद्धति को देखते हुए केंद्र को कम-से-कम 19 राज्यों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए उसे थोड़े राजनीतिक प्रबंधन की भी जरूरत पड़ेगी। लेकिन हालिया घटनाक्रम और केंद्र के रुख ने हालात को मुश्किल जरूर बना दिया है। अगर केंद्र के प्रस्ताव से नाखुश राज्यों को मतदान में हार भी मिलती है तो वे जीएसटी परिषद के भीतर या बाहर एक विवाद निपटान प्रणाली के गठन की मांग उठाएंगे। इससे भारत में जीएसटी की कहानी का एक नया अध्याय शुरू होगा।

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