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ऋण स्थगन की अवधि पूरी.. अब आगे क्या?

तमाल बंद्योपाध्याय /  September 08, 2020

मार्च के अंतिम सप्ताह में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ऋण देने वाले संस्थानों से कहा था कि वे कोविड-19 महामारी से जूझ रहे कर्जदारों को ऋण अदायगी में तीन महीने का स्थगन प्रदान करें। यह स्थगन मार्च और मई के बीच ऋण की किस्तों पर देने को कहा गया। बाद में आरबीआई ने इसे अगस्त तक बढ़ा दिया।

प्रश्न यह है कि अब आगे क्या? ऋण स्थगन की अवधि समाप्त हो गई है और जो कर्जदार महामारी के कारण कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं उनके ऋण पुनर्गठन का नया तरीका निकाला जा रहा है। ऐसा ब्याज भुगतान करके या ऋण के एक अंश को इक्विटी में बदलकर किया जा सकता है ताकि कर्जदार को कम से कम दो वर्ष का समय मिल जाए।

प्रतिशत में देखें तो बीते महीनों में ऋण स्थगन सुविधा का लाभ लेने वालों की तादाद निरंतर कम हुई है। परंतु इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि कितने लोग कर्ज का पुनर्गठन कराएंगे और बैंक की सेहत पर इस कवायद का क्या असर होगा।

गत 14 अगस्त तक देश के बैंकिंग जगत का वाणिज्यिक ऋण पोर्टफोलियो 101.5 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक था। हर कोई यही अनुमान लगाने में व्यस्त है कि बैंक ऋण के कितने हिस्से का पुनर्गठन किया जाएगा। बैंकिंग समुदाय का अनुमान है कि उसकी ऋण परिसंपत्तियों के 5 से 8 फीसदी हिस्से का पुनर्गठन हो सकता है। यानी करीब 5 से 8 लाख करोड़ रुपये के ऋण का पुनर्गठन होगा। बैंकों की बैलेंस शीट पर इसके असर की बात करें तो चूंकि बैंकों को 10 फीसदी प्रावधान के हिसाब से बैंकों को इसके लिए 50,000 से 80,000 करोड़ रुपये की राशि की आवश्यकता होगी।

कुछ बैंकों को इसके बाद ऋण विस्तार के लिए पूंजी की आवश्यकता हो सकती है लेकिन कुल मिलाकर अधिकांश बैंकों का परिचालन मुनाफा इतना है कि वे इस झटके को झेल जाएंगे।

सकारात्मक पक्ष देखें तो कई बैंकों ने पहले ही फंसे हुए कर्ज के हिसाब से प्रावधान कर रखा है। भारतीय स्टेट बैंक का तथाकथित प्रॉविजन कवरेज अनुपात जून में 86.3 फीसदी रहा। आईडीबीआई बैंक के मामले में यह और भी अधिक 94.71 फीसदी रहा। अधिकांश सरकारी बैंकों ने पहले ही चिह्नित हो चुके फंसे कर्ज के लिए फीसदी के करीब प्रावधान किया है। कई बैंकों ने कोविड-19 प्रभावित ऋण के लिए पैसा अलग रखना शुरू कर दिया है। आइए उस ऋण के स्वरूप पर एक नजर डालते हैं जिसका पुनर्गठन हो सकता है। बहुत कम कॉर्पोरेट ऋण का पुनर्गठन होगा। इसकी प्राथमिक तौर पर दो वजह हैं। पहली, केवल उन्हीं ऋण का पुनर्गठन होगा जो 1 मार्च, 2020 तक के हैं। उनका पुनर्गठन दो वर्ष के भीतर करना होगा। यानी गहन पुनर्गठन नहीं होगा जबकि कुछ कॉर्पोरेट ऋण के गहन पुनर्गठन की आवश्यकता है। मार्च तक जो ऋण फंसे कर्ज में तब्दील हो चुका है वह इसके दायरे में नहीं आएगा।

मेरा मानना है कि ऐसे ऋण के लिए बैंक स्वामित्व में बदलाव पर जोर देंगे। आरबीआई की जून 2019 के पुनर्गठन दिशानिर्देश में इसका उल्लेख है। उन्हें ऋणशोधन अक्षमता न्यायालय में पेश किया जाएगा या फिर बैंकर और कर्जदार के बीच अदालत के बाहर निस्तारण होगा। स्पष्ट है कि जो कंपनियां कोविड-19 के आगमन से पहले से कमजोर थीं उन्हें पुनर्गठन योजना का लाभ नहीं मिलेगा।

यानी दो तरह के ऋण होंगे जिनका व्यापक पैमाने पर पुनर्गठन किया जा सकेगा: खुदरा ऋण मसलन मॉर्गेज और वाहन ऋण आदि तथा दूसरा ऐसे ऋण जो सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों को दिए गए हैं। आमतौर पर खुदरा कर्जदार अपनी साख को लेकर चिंतित रहते हैं क्योंकि देनदारी में चूक उनके लिए बैंक ऋण के रास्ते हमेशा के लिए बंद कर सकती है। ऐसे में कोई जानबूझकर देनदारी में चूक नहीं करता। लोगों के रोजगार जाने तथा स्वरोजगार वाले लोगों को मुश्किल के हालात बनेंगे। उनमें से कुछ को अपना काम छोड़कर कर्ज समाप्त करना पड़ सकता है जबकि अन्य पुनर्गठन की राह पर जाएंगे।

सबसे जटिल हालत एमएसएमई क्षेत्र की है। मई 2020 में जब सरकार ने इन उपक्रमों को नए सिरे से परिभाषित किया तब देश में 6.30 करोड़ सूक्ष्म, 3.3 लाख छोटे और करीब 5,000 मझोले उपक्रम थे। देश के जीडीपी में 31 फीसदी हिस्सेदारी के साथ यह दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता था। सामान्य दिनों में भी इन उपक्रमों को नकदी की दिक्क्त रहती थी क्योंकि उनका भुगतान प्राय: लंबित रहता है। इसका दोष सरकार पर भी है। एमएसएमई के लिए इतने भारी बकाये के साथ काम करना मुश्किल है। महामारी ने उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया है। तीन लाख करोड़ रुपये से कम के चार वर्ष अवधि वाली पूर्ण सरकार समर्थित ऋण योजना के तहत बैंकर अगस्त के अंत तक 1.58 लाख करोड़ रुपये का ऋण मंजूर कर चुके और 1.11 लाख करोड़ रुपये का ऋण बांटा भी जा चुका है। योजना में एक वर्ष का ऋण स्थगन शामिल है। एमएसएमई के लिए शायद यह भी बड़ी सहायता न हो। केवल ऋण स्थगन बढ़ाने भर से पूंजी की कमी से जूझ रहे उपक्रमों को कोई मदद नहीं मिलेगी। 90 फीसदी सरकारी गारंटी के साथ 20,000 करोड़ रुपये के उपऋण की योजना जो आत्मनिर्भर भारत पैकेज का हिस्सा है वह भी उनके लिए उपयोगी हो सकती है। इस योजना के तहत एमएसएमई के प्रवर्तकों को कंपनी में हिस्सेदारी के 15 फीसदी या 75 लाख रुपये तक की राशि में से जो भी कम हो वह दी जा सकती है। यह राशि 10 वर्ष के लिए दी जा सकती है। इसमें मूलधन भुगतान पर सात वर्ष का ऋण स्थगन भी मिलेगा। यानी केवल शुरुआती सात वर्षों का ब्याज देना होगा और ऋण स्थगन समाप्त होने के बाद तीन वर्ष के भीतर मूलधन चुकाना होगा।

कुछ एमएसएमई तथा खुदरा ग्राहक अगस्त तक बैंकों को भुगतान नहीं कर रहे थे क्योंकि वे अनिश्चित समय के लिए धन बचाकर रखना चाहते थे। ऋण स्थगन समाप्त होने के बाद वे ऋण चुकाना शुरू कर सकते हैं। इस विषय में स्पष्टता अक्टूबर में आएगी लेकिन एक बात तय है कि ऋण का ताजा पुनर्गठन अतीत की योजनाओं से अलग है। वर्ष 2001 से आरबीआई नियमित अंतराल पर ऐसी कई योजनाएं लेकर आया लेकिन इनका दुरुपयोग देखते हुए फरवरी 2018 में उसने इन्हें समाप्त कर दिया।

कोविड-19 ऋण स्थगन योजना में ऐसे प्रावधान हैं जिसके चलते इसका दुरपयोग रोका जा सकता है। परंतु क्या यह बैंकों के फंसे कर्ज में इजाफे की वजह बनेगा? यह जानने के लिए दो वर्ष प्रतीक्षा करनी होगी।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

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