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कोविड से नुकसान

संपादकीय /  September 06, 2020

देश में कोविड-19 संक्रमण के मामलों में दिन प्रतिदिन इजाफा हो रहा है और उनके स्थिर होने का कोई संकेत नहीं हैं। भारत ने गत सप्ताह 40 लाख का आंकड़ा पार कर लिया और रविवार को एक दिन में 90,000 से अधिक मामले सामने आए। अब दुनिया में कोविड संक्रमण के कुल सक्रिय मामलों के 12 फीसदी भारत में हैं और कुल मौतों में उसकी हिस्सेदारी 8 फीसदी है। संक्रमण के मामलों में भारत किसी भी समय ब्राजील को पीछे छोड़कर विश्व में दूसरा सर्वाधिक संक्रमित देश बन सकता है। हालांकि आबादी के अनुपात में मृत्यु के मामले कम हैं लेकिन पंाच महीने पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि संक्रमण इस कदर होगा। यदि जांच बढ़ाई गई तो और बुरे हालात सामने आएंगे। केरल और कुछ हद तक दिल्ली में पहले सफलता हासिल हुई थी लेकिन वहां संक्रमण का दूसरा दौर जारी है।

अब जबकि लोगों की आजीविका बचाने के लिए लॉकडाउन लगातार खोला जा रहा है तो टीका बनाना और उसे जल्द से जल्द पूरी आबादी तक पहुंचाना ही संक्रमण को रोकने का इकलौता तरीका है। यह बहुत बड़ा काम है। जैसा कि नंदन नीलेकणी ने इस समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में कहा भी कि एक अरब की आबादी का आधार नामांकन करने में पांच वर्ष लगे लेकिन टीकाकरण जल्दी किया जा सकता है। टीका लगाने वालों का ऑनलाइन प्रशिक्षण और प्रमाणन किया जा सकता है। इस पूरी कवायद में तकनीक की अहम भूमिका होगी। बहरहाल, टीका बनने में अभी भी वक्त  है और यह स्पष्ट नहीं है कि देश में टीके की जल्द उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी। परंतु सरकार को पूरी तैयारी रखनी होगी।

इस बीच अर्थव्यवस्था पर इसका असर पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं अधिक होगा। क्योंकि स्थानीय स्तर पर लगने वाले लॉकडाउन उत्पादन शृंखला को प्रभावित करेंगे और सुधार की प्रक्रिया धीमी होगी। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 24 फीसदी गिरी। उत्पादन में गिरावट अनुमान से अधिक थी। अधिकांश विश्लेषक अब पूरे वर्ष के अनुमान में कमी कर रहे हैं। कार बिक्री और पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स जैसे तीव्र संकेतकों में सुधार हुआ है लेकिन अभी यह देखना है कि क्या यह सुधार बरकरार रहता है। संक्रमण में निरंतर इजाफा मांग और आपूर्ति दोनों को बाधित करेगा। आपूर्ति क्षेत्र के झटके ने मुद्रास्फीति को बढ़ाया है और यह रुख आने वाले महीनों में भी बरकरार रह सकता है। परिणामस्वरूप केंद्रीय बैंक इस स्थिति में नहीं होगा कि वह नीतिगत दरों में कमी करके आर्थिक गतिविधियों की सहायता कर सके। इतना ही नहीं दोहरी बैलेंस शीट की समस्या और बढ़ेगी। रिजर्व बैंक ने ऋण के एकबारगी पुनर्गठन की इजाजत दी है। परंतु सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण पर स्पष्टता नहीं है।

ऐसे हालात में मौद्रिक और राजकोषीय प्राधिकार से यही आशा होगी कि वह कुछ रचनात्मक उपाय लेकर आए। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का मसला नई चुनौतियों का एक उदाहरण है। केंद्र सरकार ने राज्यों से अनुशंसा की है कि वे उधारी लेकर जीएसटी में हुई कमी पूरी करें। इसे उपकर बढ़ाकर चुकाया जा सकता है। परंतु कई राज्यों ने इससे इनकार कर दिया है। इसके अलावा व्यापक पैमाने पर दिवालिया होने की घटनाएं रोकने और गरीबों को खपत समर्थन मुहैया कराना जरूरी होगा। सरकार को अपने दायित्व निभाने और अर्थव्यवस्था की मदद करने के लिए ज्यादा संसाधनों की आवश्यकता होगी। ऐसे में उसे जल्दी ही व्यय का संशोधित खाका तैयार करना होगा और अतिरिक्त फंड जुटाने के तरीके तलाश करने होंगे। उधर शिक्षा के क्षेत्र में एक वर्ष का जाया होना तय है। कुल मिलाकर बुरी खबरों का चौतरफा सिलसिला चल रहा है और इनका अंत भी नजर नहीं आ रहा।

Keyword: कोविड-19, संक्रमण, मौत, ब्राजील, जांच, केरल, दिल्ली, आजीविका, लॉकडाउन, टीका, पीएमआई,
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