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कांग्रेस आलाकमान का करीबी और भरोसेमंद सिपहसालार

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  September 04, 2020

वह केरल के उत्तरी जिले कन्नूर से ताल्लुक रखते हैं लेकिन उन्होंने विधानसभा और लोकसभा दोनों में ही दक्षिणी इलाके अलेप्पी का कई बार प्रतिनिधित्व किया है। गणित में परास्नातक यह नायर युवक कोई भी नौकरी पा सकता था। लेकिन उन्होंने राजनीति को ही चुना। उनकी हिंदी थोड़ी कमजोर है लेकिन राजस्थान कांग्रेस में हुए विवाद के निपटारे के लिए उन्हें ही भेजा गया था। पार्टी के शीर्ष नेताओं की हाल में हुई बैठक में उन्होंने बेबाक तरीके से अपनी बातें रखीं। उन्हें शायद पार्टी आलाकमान का समर्थन मिलने का यकीन था। यही बात उन्हें एक खतरनाक शख्स बना देती है। इस शख्स का नाम है के सी वेणुगोपाल।

केरल में कांग्रेस के भीतर हमेशा दो धड़े रहे हैं। एक गुट के अगुआ के करुणाकरन थे तो दूसरे गुट के नेता ए के एंटनी। अगर आप केरल की राजनीति में आगे बढऩा चाहते थे तो आपके लिए किसी-न-किसी गुट का हिस्सा बनना जरूरी था। वेणुगोपाल ने करुणाकरन गुट को चुना और वह जल्द ही युवा कांग्रेस के प्रमुख बना दिए गए। लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि रमेश चेन्नितला के रूप में उनका एक प्रतिद्वंद्वी सामने आ चुका है। चेन्नितला भी नायर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और बेहद सक्षम एवं संगठित नेता माने जाते हैं। वेणुगोपाल ने अपनी सीमाओं को देखते हुए धीरे-धीरे खुद को करुणाकरन गुट से अलग किया और एंटनी के साथ आ गए।

उन्हें इसका फायदा भी मिला। करुणाकरन का बीमारी के बाद 2010 में निधन हो गया  लेकिन एंटनी कांग्रेस के मजबूत स्तंभ थे। वर्ष 2011 में केरल विधानसभा चुनाव के पहले एंटनी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपने मंत्रिमंडल में वेणुगोपाल को यह कहते हुए शामिल करने की सलाह दी कि इससे नायर समुदाय को स्वर मिलेगा। उस समय तक वेणुगोपाल तीन बार विधायक और राज्य में मंत्री रह चुके थे। उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमाने के लिए अपनी विधानसभा सीट से इस्तीफा देकर अलेप्पी से चुनाव लड़ा। इस तरह वह पहली बार ही सांसद बने थे लेकिन मनमोहन सरकार में उन्हें ऊर्जा मंत्रालय का अहम प्रभार मिला। दिलचस्प बात यह है कि वेणुगोपाल को मंत्रिमंडल में जगह मिलने के साथ ही केरल के एक और कांग्रेस सांसद शशि थरूर को मंत्री पद से हटा दिया गया था। थरूर के साथ उपजा तनाव आगे भी रंग दिखाता रहा। कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार तो 2014 में सत्ता से बाहर हो गई लेकिन वेणुगोपाल फिर से अलेप्पी से चुन लिए गए। वह 2017 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त हुए। इस पद पर उनको पहली जिम्मेदारी गोवा की मिली। कांग्रेस 40 सदस्यीय गोवा विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन हेराफेरी होने से पार्टी ने स्थानीय इकाई की मदद के लिए वेणुगोपाल और दिग्विजय सिंह को गोवा भेजा।

कांग्रेस के सरकार बनाने का दावा करने के पहले ही उसके एक विधायक विश्वजित राणे ने इस्तीफा दे दिया और अपने साथ दो अन्य विधायकों को भी लेते गए। यह अपनी तरह का अनूठा राजनीतिक संकट था जिसमें दिग्विजय सिंह से संपर्क भी नहीं साधा जा सका। इसका नतीजा यह हुआ कि गोवा कांग्रेस के हाथ से फिसल गया और भाजपा ने सरकार बना ली। वेणुगोपाल जब दिल्ली लौटे तो उन्होंने जीत के किनारे से हार तक पहुंचने की पूरी कहानी बयां की। उन्होंने सभी प्यादों को बखूबी निपटाने का भी काम किया। कांग्रेस ने इसे ध्यान में रखा और अगली बार जब कर्नाटक में संकट हुआ तब भी वेणुगोपाल को ही भेजा गया। फिर तो उन्हें महाराष्ट्र और फिर राजस्थान में भी उठती लपटों को शांत करने का जिम्मा दिया गया।

फिर 2019 का चुनाव आ गया। यह साफ हो चुका था कि राहुल गांधी के लिए अमेठी की सीट सुरक्षित नहीं रह गई है। तब विभिन्न विकल्पों पर विचार किया गया। पी चिदंबरम ने तमिलनाडु से चुनाव लडऩे की पेशकश रखी लेकिन इसका मतलब था कि कांग्रेस को द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) की कृपा पर रहना पड़ता। एक विकल्प कर्नाटक की बेल्लारी सीट भी थी जहां से पहले सोनिया गांधी जीत चुकी थीं। लेकिन परिसीमन के बाद बेल्लारी सीट सुरक्षित हो चुकी थी। कर्नाटक में कांग्रेस के सशक्त नेता डी के शिवकुमार ने अपने भाई डी के सुरेश की सीट बेंगलूरु ग्रामीण की पेशकश की लेकिन इसमें जनता दल सेक्युलर के समर्थन की भी जरूरत पड़ती और उसके सहयोग की कोई गारंटी नहीं थी।

ऐसी स्थिति में वेणुगोपाल और एंटनी ने राहुल को केरल की वायनाड सीट से लडऩे का प्रस्ताव रखा। वहां से दो बार के सांसद एम आई शानवास का कुछ महीने पहले ही निधन हो गया था। राहुल की जीत सुनिश्चित करने के लिए वेणुगोपाल ने खुद चुनाव नहीं लड़ा ताकि चुनाव अभियान पर ध्यान केंद्रित कर सकें। लेकिन अलेप्पी से वेणुगोपाल के मैदान में नहीं उतरने का नुकसान यह हुआ कि कांग्रेस यह सीट गंवा बैठी। माकपा के ए एम आरिफ ने यह सीट महज 10,000 मतों के अंतर से जीती। हालांकि वेणुगोपाल का बलिदान व्यर्थ नहीं गया और राहुल भारी मतों से जीत गए। यह एक तरह से वेणुगोपाल की भी जीत थी।

राहुल के बारे में सबसे आम शिकायत यह है कि वह लोगों से मिलते नहीं हैं। जब थरूर ने उनसे मिलने की इच्छा जताई तो उन्हें वेणुगोपाल के जरिये मुलाकात का वक्त तय करने की सलाह दी गई। थरूर को यह नागवार गुजरा और आज वह पार्टी नेतृत्व के तौर-तरीकों में बदलाव की मांग करने वाले 23 सांसदों में शामिल हैं।

वेणुगोपाल कांग्रेस के भीतर सभी मर्जों की दवा बनकर उभरे हैं। कांग्रेस का संगठन महासचिव होने से वह पार्टी को अंदरूनी स्तर पर बखूबी जानते हैं। दूसरी तरफ शीर्ष नेतृत्व के साथ करीबी ने उनके कई दुश्मन भी बनाए हैं। वह बहुत अच्छी तरह अपनी बात नहीं रख पाते हैं, खासकर हिंदी में। फिर भी राहुल और सोनिया गांधी दोनों ही उन्हें एक निष्ठावान और काम पूरा करने में सक्षम नेता के तौर पर काफी अहमियत देते हैं। वेणुगोपाल की नजर तो केरल के मुख्यमंत्री पद पर ही टिकी हुई है। हो सकता है कि वह वहां तक पहुंच भी जाएं।

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