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बैंकों के समक्ष ऋण वृद्धि की चुनौतियां

तमाल बंद्योपाध्याय /  September 04, 2020

भारत का बैंकिंग नियामक वाणिज्यिक बैंकों के जोखिम से बचने की कोशिश को लेकर नाखुश है। ये बैंक एशिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों को ऋण देने से परहेज कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का कहना है कि यह प्रवृत्ति अर्थव्यवस्था में प्रमुख वित्तीय मध्यवर्ती के तौर पर बैंकों की भूमिका को कमतर बनाती है।

हालांकि बैंकरों के पास बताने को अलग ही कहानी है। उनका कहना है कि वे जोखिम से नहीं बच रहे हैं, वे तो बस सतर्कता बरत रहे हैं।

इन दोनों में से कौन सही है? शायद दोनों ही सही हैं। बैंकर आर्थिक वृद्धि में योगदान देने और रोजगार देने में सक्षम माने जाने वालों को कर्ज नहीं दे रहे हैं क्योंकि उनकी नजर में ये लोग कर्ज देने लायक नहीं हैं। वहीं जिन लोगों को ये बैंक कर्ज देना चाह रहे हैं वे उनसे कर्ज मांग ही नहीं रहे हैं।

जोखिम वंचना बनाम सतर्क बैंकिंग पर जारी बहस के मूल में यह धारणा है कि ऋण वृद्धि से आर्थिक वृद्धि को गति मिल सकती है। क्या ऐसा हो सकता है? क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि उद्योग जब मांग बढऩे की संभावना देख निवेश करना चाहे तो वह बैंकों से कर्ज मांगे?

ऐतिहासिक तौर पर जब भी बैंक ऋण का इस्तेमाल आर्थिक वृद्धि के एक साधन के तौर पर किया गया है तो बैंकों के फंसे हुए कर्ज की मात्रा बढ़ती गई है। यह नब्बे के दशक में उदारीकरण की शुरुआत के बाद हुआ था। पिछले दशक में भी वैश्विक वित्तीय संकट के असर से बचने के लिए जब बैंकों से सभी को कर्ज देकर आर्थिक वृद्धि को तेजी देने को कहा गया था तब भी यही हुआ था।

वित्तीय प्रणाली में सस्ती दर पर मिले कर्ज की भरमार हो गई और बैंकरों ने अयोग्य कर्जदारों को भी खुशी-खुशी कर्ज दे दिए। इसकी वजह से बैंकों के पास जोखिम पूंजी खत्म हो गई। जब आरबीआई ने वर्ष 2016 में परिसंपत्ति की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने का फैसला किया तो बैंकों का अविवेकपूर्ण व्यवहार सामने आ गया। अपनी तरह की इस पहली कवायद से पता चला कि फंसे कर्ज की मात्रा बढ़ती गई है। इसके बाद आरबीआई ने सार्वजनिक क्षेत्र के 11 बैंकों को कर्ज बांटने से रोक दिया।

अगस्त के मध्य में भारतीय बैंकिंग प्रणाली का जमा पोर्टफोलियो पिछले साल से 3.8 फीसदी दर से बढ़कर 140 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक था। इसके उलट ऋण वृद्धि नकारात्मक 1.5 फीसदी रही है। कुल ऋण पोर्टफोलियो 102 लाख करोड़ रुपये था। पिछले वित्त वर्ष में बैंक ऋण 6.1 फीसदी की दर से बढ़ा था जबकि 2018-19 में इसकी दर 13.3 फीसदी रही थी।

विभिन्न क्षेत्रों को 33 बड़े बैंकों द्वारा बांटे गए कर्ज के बारे में आरबीआई के नए आंकड़े बताते हैं कि मई 2020 में कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों को दिए गए कर्ज में 3.5 फीसदी की वृद्धि थी जबकि एक साल पहले मई 2019 में इसकी दर 7.8 फीसदी रही थी। इस अवधि में उद्योग जगत को बांटे गए कर्ज में और भी तीव्र गिरावट रही है। एक साल पहले की 6.4 फीसदी वृद्धि के मुकाबले मई 2020 में महज 1.7 फीसदी तेजी ही रही। सेवा क्षेत्र को दिए गए कर्ज एवं व्यक्तिगत ऋण में भी वृद्धि की दर गिरी है।

केवल सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाई (एमएसएमई) क्षेत्र में ही ऋण वृद्धि देखी जा रही है। बैंक एमएसएमई क्षेत्र को खुलकर कर्ज बांट रहे हैं क्योंकि सरकार ने इन कर्ज के पुनर्भुगतान की गारंटी दी हुई है। लेकिन एमएसएमई क्षेत्र अकेले ही ऋण वृद्धि को नहीं बढ़ा सकता है क्योंकि इस तबके की बैंकिंग पहुंच बैंक ऋण बाजार के पांचवें हिस्से से भी कम है। एमएसएमई को छोड़कर कुछ सड़क परियोजनाएं एवं कुछ सार्वजनिक उपक्रम ही इस समय बैंकों से कर्ज ले रहे हैं। अच्छी रेटिंग वाले अधिकांश बड़े उद्योगों को बैंक कर्ज देना पसंद करेंगे लेकिन वे तो कर्ज मांग ही नहीं रहे हैं।

सवाल उठता है कि फिर बैंक अपने पास रखे पैसे का क्या कर रहे हैं? वे इस रकम को आरबीआई के रिवर्स रीपो खाते में रखकर 3.35 फीसदी दर से ब्याज जुटा रहे हैं। अगर कर्ज बांटकर अधिक कमाई के मौके हों तो कोई बेवकूफ ही 3.35 फीसदी ब्याज से संतुष्ट होगा। लेकिन बैंक बेवकूफ तो हैं नहीं। वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि विकल्प ही सीमित हैं।

निश्चित रूप से कुछ बैंकों (खासकर निजी क्षेत्र के बैंक) के लोनबुक में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है लेकिन यह वृद्धि जोखिम वंचना या सतर्कता के अभाव की वजह से नहीं है। असल में ये बैंक चतुर हैं और वे सस्ती दर पर कर्ज की पेशकश को सार्वजनिक बैंकों से कॉर्पोरेट ग्राहकों को झटक ले रहे हैं। कुल ऋण आवंटन भले ही नहीं बढ़ रहा है लेकिन कुछ बैंक सस्ते कर्ज देकर अन्य बैंकों के हिस्से पर कब्जा कर रहे हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि जांच एजेंसियों के चंगुल में फंसने का डर भी बैंकों को नए कर्ज बांटने से हतोत्साहित कर रहा है। इसकी वजह यह है कि 50 करोड़ रुपये से अधिक राशि का कर्ज अगर फंस जाता है तो बैंकों को धोखाधड़ी की आशंका की पड़ताल के लिए फॉरेंसिक ऑडिट के दौर से गुजरना पड़ता है। लेकिन इस डर में अधिक दम नहीं लगता है। अधिकांश बैंक अब जोखिम आकलन के लिए मात्रात्मक मॉडल अपनाते हैं और उनमें गुणात्मक जानकारी भी रहती है। बैंकों के मुख्य कार्याधिकारी बड़े कर्ज के बारे में फैसले नहीं करते हैं बल्कि कर्ज बांटने वाली समिति इसे तय करती है।

अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए बैंकों से जोखिम पूंजी की अपेक्षा करना अनुचित है। एक बार मांग आने और उद्योगों के नए कारखाने लगाने के लिए तैयार होने पर बैंकों को उन्हें कर्ज जरूर देना चाहिए। लेकिन मांग भी तभी पैदा होगी जब उपभोक्ताओं को यह यकीन हो जाएगा कि महामारी पर काबू पाया जा रहा है। कोविड महामारी के खिलाफ इस जंग में सरकार असल में अभी तक बहुत दिलेरी से काम करते हुए नहीं दिखी है।

समानांतर रूप से समूची पारिस्थितिकी तैयार करनी होगी। मैं बहुचर्चित श्रम एवं भूमि सुधारों का जिक्र न करते हुए पूंजी प्रवाह बढ़ाने के कुछ अन्य तरीकों का उल्लेख कर रहा हूं। मसलन, पिछले हफ्ते महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में संपत्ति की खरीद-बिक्री पर लगने वाले स्टांप शुल्क एवं अन्य शुल्कों में कटौती की घोषणा की। इसने 31 दिसंबर 2020 तक शहरी इलाकों में लागू स्टांप शुल्क को 5 फीसदी से घटाकर 2 फीसदी कर दिया है जबकि उसके बाद मार्च 2021 तक यह 3 फीसदी होगा। वहीं ग्रामीण इलाकों में स्टांप शुल्क दिसंबर तक 4 फीसदी के बजाय 1 फीसदी और उसके बाद मार्च 2021 तक 2 फीसदी लगेगा। इस फैसले से संपत्ति की खरीद-बिक्री में तेजी आने की संभावना है। ऐसा होने पर कई डेवलपर अपनी परियोजनाएं पूरी करने के लिए बैंकों के पास पूंजी जुटाने के लिए जाएंगे। बैंक निश्चित तौर पर हकदार डेवलपरों को कर्ज देने के लिए आगे आएंगे।

जिम्मेदारी सरकार की बनती है, न कि बैंकों की। बैंकों से आम लोगों के पैसे के मामले में अधिक साहस दिखाने की उम्मीद करना गैरवाजिब है। इसके अलावा खुद बैंकों को भी पूंजी की जरूरत रहती है। अधिकांश निजी बैंकों ने पिछले कुछ महीनों में बाजार से पूंजी जुटाई है लेकिन सरकार ने सार्वजनिक बैंकों के बारे में कुछ नहीं बोला है। आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट ने बैंकों के पुनर्पूंजीकरण पर जोर दिया है क्योंकि उनकी मौजूदा पूंजी महामारी के चलते होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए नाकाफी होगी। आरबीआई पहले ही आगाह कर चुका है कि महामारी के बाद बैंकिंग प्रणाली में फंसे कर्ज की समस्या बढ़ेगी।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

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