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ब्राउजर बाजार में इंटरनेट एक्सप्लोरर की विदाई

तकनीकी तंत्र
देवांशु दत्ता /  September 04, 2020

कनीक की दुनिया में थोड़ी सुगबुगाहट हुई जब माइक्रोसॉफ्ट ने अपने ब्राउजर इंटरनेट एक्सप्लोरर (आईई) को जल्द ही हटाने की घोषणा कर दी। माइक्रोसॉफ्ट अगस्त 2021 से इस ब्राउजर को सपोर्ट देना बंद कर देगी। उसका नया ब्राउजर 'एमएस एज' पूरी तरह गूगल के ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म क्रोमियम पर चला जाएगा। आईई और एज अब लोकप्रिय ब्राउजर नहीं रह गए हैं। दुनिया भर में महज 1.3 फीसदी इंटरनेट उपभोक्ताओं ने ही जुलाई 2020 में आईई ब्राउजर का इस्तेमाल किया। एमएस एज की भी बाजार हिस्सेदारी केवल 2.2 फीसदी ही है। गूगल का ब्राउजर क्रोम इस समय सबसे लोकप्रिय है और सभी प्लेटफॉर्म को मिलाकर इसकी बाजार हिस्सेदारी 66 फीसदी है। ऐपल के प्रशंसक सफारी का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं (16.65 फीसदी) जबकि तकनीकी काम करने वालों की पसंद फायरफॉक्स (4.26 फीसदी) या ओपेरा (2.05 फीसदी) या विवाल्डी (0.04 फीसदी) होते हैं। ओपेरा और विवाल्डी दोनों ही ब्राउजर क्रोमियम पर ही बनाए गए हैं।

नई सदी में जबरदस्त बदलाव हुए हैं। वर्ष 1998 में माइक्रोसॉफ्ट को अपना ब्राउजर आईई एमएस विंडोज के साथ पेश करने पर विश्वास तोडऩे के आरोपों के जवाब देने पड़े थे। उसी साल माइक्रोसॉफ्ट पर डेस्कटॉप कंप्यूटर श्रेणी में जबरदस्त वर्चस्व होने के चलते लगे एकाधिकारवादी होने के आरोप भी लगे। स्मार्टफोन का ख्याल तो स्टीव जॉब्स के जेहन में भी नहीं आया था। सितंबर 1998 में ही कॉलेज के दो दोस्तों ने मिलकर एक सर्च इंजन कंपनी के तौर पर गूगल की आधारशिला रखी थी।

इतिहास में झांकें तो इंटरनेट लिखित शब्दों का एक अकादमिक माध्यम था लेकिन टिम बन्र्स और ली ने नब्बे के दशक में इसकी संकल्पना हाइपर टेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज (एचटीएमएल) के रूप में की। इसी संकल्पना पर वल्र्ड वाइड वेब की बुनियाद रखी गई। शुरुआती ब्राउजर 1994 में ही सामने आ गए थे जिनमें मोजैक जैसी छोटी कंपनी भी शामिल थी। नेटस्केप नेविगेटर अपने फीचरों की वजह से काफी क्रांतिकारी था। मोजैक एवं नेविगेटर दोनों ही भुगतान आधारित ब्राउजर थे। उपभोक्ता इन कार्यक्रमों से लैस फ्लॉपी डिस्क खरीदते थे और उन्हें अपने कंप्यूटर में इंस्टॉल कर लेते थे। माइक्रोसॉफ्ट ने मोजैक से आईई को डिजाइन करने को कह परिदृश्य ही बदल दिया और अपने ब्राउजर आईई को विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलने वाले हरेक कंप्यूटर के साथ मुफ्त इंस्टॉल कर देने लगा।

इससे दूसरे ब्राउजरों के लिए बाजार कमोबेश खत्म ही हो गया था। नेटस्पेस कई वर्षों तक आईई से बेहतर उत्पाद था लेकिन मुफ्त पेशकश के बावजूद उसका मुकाबला नहीं कर सका। माइक्रोसॉफ्ट के उलट नेटस्पेस का कोई अन्य राजस्व माध्यम नहीं था। ऐसे में इंटरनेट सर्फर मुफ्त में मिल रहे आईई की जगह किसी दूसरे ब्राउजर के लिए अलग से भुगतान करना और इंस्टॉल करने के पचड़े में नहीं फंसना चाहते थे।

वर्ष 2001 आते-आते आईई ने ब्राउजर बाजार में 90 फीसदी से भी अधिक हिस्सेदारी हासिल कर ली थी। लेकिन उस वक्त भी तकनीकी जानकार ओपेरा को उसकी मेमरी एवं सुरक्षा के लिहाज से अधिक पसंद करते थे। आईई ने भी अच्छा प्रदर्शन किया था लेकिन इसे प्रभावी बनाने में इसके बाजार एकाधिपत्य की भूमिका इसकी खासियतों से कहीं अधिक थी। ऑनलाइन कॉमर्स अपनी जड़ें जमाने लगा था। लेकिन अधिकांश ई-कॉमर्स वेबसाइट आईई के अलावा किसी अन्य ब्राउजर पर भुगतान संबंधी सुविधा देती ही नहीं थीं। कुछ सरकारी वेबसाइट पर महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों एवं आंकड़ों को डाउनलोड करने के लिए आईई ब्राउजर जरूरी होता था। यह सब ग्राहकों एवं शोधकर्ताओं दोनों के ही लिहाज से काफी खीझ पैदा करने वाला था। दूसरे ब्राउजरों को ई-कॉमर्स साइटों पर काम करने लायक बनाने के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामरों को भी कोड तैयार करना काफी परेशान करता था।

वर्ष 2002 में मोजिला फाउंडेशन ने एक मुफ्त ब्राउजर फायरफॉक्स उतारा था। इसे नि:शुल्क एवं फीचर से भरपूर होने के साथ ही ओपन-सोर्स एवं आसानी से जरूरत के मुताबिक ढाला भी जा सकता था। इन खूबियों की वजह से तकनीकी लोगों को फायरफॉक्स भा गया। सोर्स कोड तक पहुंच होने से भारतीय सॉफ्टवेयर डेवलपरों ने एक तरह से फायरफॉक्स के लाखों रूप तैयार कर इसकी कामकाजी खूबियों को खूब परखा। वहीं इंटरनेट पर अधिक समय बिताने वाले लोगों ने एक-दो बार ही फायरफॉक्स का इस्तेमाल किया तो वे इसके मुरीद बन गए। इसकी वजह यह है कि फायरफॉक्स ऐसे तमाम काम कर सकता था जो आईई पर नहीं हो पाते थे। फायरफॉक्स ने देखते-ही-देखते बाजार में हिस्सेदारी हासिल कर ली। इसके पांच साल बाद ऐपल ने फिर से सारा खेल पलट दिया। उसने वर्ष 2007 में आईफोन उतारा और गूगल ने भी ओपन-सोर्स ऑपरेटिंग सिस्टम ऐंड्रॉयड पेश कर स्मार्टफोन बाजार को पूरी तरह खोल दिया। स्मार्टफोन आने के साथ ही 3जी कनेक्शनों के भी आ जाने से फोन पर ही इंटरनेट सर्फिंग कर पाना काफी आसान हो गया। विंडोज की स्मार्टफोन बाजार में नगण्य हिस्सेदारी होने का मतलब था कि माइक्रोसॉफ्ट के ब्राउजरों की पहुंच भी इस बाजार में लगभग शून्य रह गई। आईई ब्राउजरों के क्रम-विन्यास में नीचे आ गया।

गूगल ने 2008 में जब अपना ब्राउजर क्रोम पेश किया तो उसने आईई के मामले में अपनाई गई माइक्रोसॉफ्ट की तकनीक को ही दूरदर्शिता के साथ लागू किया। क्रोम डेस्कटॉप कंप्यूटर पर तमाम अलग-अलग ऑपरेटिंग सिस्टम के अलावा स्मार्टफोन पर भी अच्छी तरह काम करता था। गूगल ने क्रोम पर आधारित एक हल्का ऑपरेटिंग सिस्टम तक जारी कर दिया था। क्रोम ने धीरे-धीरे तमाम प्लेटफॉर्म पर बाजार हिस्सेदारी हासिल कर ली है और यह एक तरह से पूरी दुनिया का डिफॉल्ट ब्राउजर बन चुका है। लेकिन इतिहास बताता है कि ऑनलाइन परिदृश्य बीते 25 वर्षों में कितना बदल गया है। ऐसे में क्रोम का दबदबा हमेशा बने रहने की संभावना नहीं है।

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