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कारोबारी सुगमता रैंकिंग : शोर ज्यादा, हासिल कम

देवाशिष बसु /  09 01, 2020

विश्व बैंक ने गत 27 अगस्त को यह माना कि सन 2018 और 2020 की कारोबारी सुगमता रैंकिंग रिपोर्ट के आंकड़ों में अनियमितता थी और उनमें किया गया बदलाव प्रविधि के साथ सुसंगत नहीं था। विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता रैंकिंग वह सूचकांक है जो दुनिया के 190 देशों में कारोबार के अनुकूल परिस्थितियों का अध्ययन कर तैयार किया जाता है। सन 2020 की रिपोर्ट से सबसे अधिक लाभान्वित होने वाले देश थे सऊदी अरब, जॉर्डन, टोगो, बहरीन, ताजिकिस्तान, पाकिस्तान, कुवैत, चीन, भारत और नाइजीरिया। विश्व बैंक ने यह नहीं बताया कि किन देशों से संबंधित आंकड़ों में गड़बड़ी थी। वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक आलेख में दावा किया गया है कि चीन, अजरबैजान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब (ये सभी अधिनायकवादी देश हैं जहां अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक अधिकार नहीं हैं) को सबसे अधिक लाभ मिला।

विश्व बैंक ने फिलहाल के लिए कारोबारी सुगमता रिपोर्ट को स्थगित कर दिया है। इससे भारत सरकार को भी मामूली झटका लगेगा। झटका इसलिए क्योंकि सरकार इसे लेकर बढ़चढ़कर दावे कर रही थी परंतु अब इसकी विश्वसनीयता को गहरा आघात लगा है। परंतु यह झटका मामूली इसलिए है क्योंकि इन रैंकिंग का घरेलू या विदेशी निवेश बढ़ाने जैसा कोई ठोस योगदान नहीं है। परंतु इस मौके पर हमें तीन बातें अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए: पहली बात, कारोबारी सुगमता में सुधार सरकार का काम है। दूसरा, रैंकिंग के लिए अपनाई गई प्रविधि में भी गड़बड़ी थी और तीसरा, जमीनी हकीकत में कुछ खास बदलाव नहीं आया था।

क्या यह राज्य का काम है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब सन 2014 के चुनाव के पहले प्रचार अभियान पर थे तब उन्होंने सुशासन और विकास का वादा किया था। उन्होंने देश के लाखों छोटे मोटे कारोबारियों से लेकर बड़े कारोबारियों के दिलों को उस समय छू लिया जब उन्होंने यह जिक्र किया कि देश में कारोबारी माहौल कितना कठिन है और यह बताया कि उनके प्रांत गुजरात में कारोबार करना कितना आसान है। वह उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे। परंतु देश में संघीय ढांचा है जहां केंद्र और राज्यों के अधिकार और भूमिकाएं बंटी हुई हैं। कारोबारी सुगमता की राह में सबसे बड़ी बाधाएं राज्य ही उत्पन्न करते हैं। केंद्र की भूमिका सीमित है। यदि सभी राज्य बदलाव न करें तो मोदी अकेले कारोबारी सुगमता का वादा नहीं कर सकते। केंद्र की भूमिका ऐसे केंद्रीय कानून बनाने तक सीमित है जो कारोबारी सुगमता के कुछ पहलुओं को हल करते हैं। उदाहरण के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कराधान और ऋणशोधन निस्तारण। अधिकांश परमिट और लाइसेंस तथा भूमि और श्रम से जुड़े कानून राज्यों के हाथ में हैं। मोदी को उन राज्यों के साथ मिलकर काम करना था जहां उनकी पार्टी यानी भाजपा सत्ता में है। इससे माहौल सुधरता। परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया।

खामीयुक्त सूचकांक

परंतु विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता रैंकिंग जैसी अंतराष्ट्रीय और विश्वसनीय रैंकिंग में सुधार एक बेहतर अवसर भी प्रदान कर रही थी। सन 2014 से भारत ने इसमें 79 स्थानों की छलांग लगाई और सन 2018 से 2020 तक लगातार तीन साल यह सबसे बेहतरीन सुधार करने वाले 10 देशों में शुमार रहा। इसे सरकार की नीतियों की सफलता के रूप में प्रचारित किया गया। इस दौरान बहुपक्षीय संस्थान की प्रविधियों में कमी का पूरा लाभ लिया गया जो गैरवाजिब बदलावों को जरूरत से अधिक तवज्जो दे रही थी। भारत की रैंकिंग में तेजी से सुधार हुआ तो इसमें बैंक खाता खोलने के लिए कंपनी की सील या रबर स्टांप की जरूरत समाप्त करना, कर्मचारी भविष्य निधि के आवेदन के साथ कैंसिल चेक लगाने की जरूरत को खत्म करना, कारोबारियों से दस्तावेजों की हार्ड कॉपी की जरूरत को समाप्त करना और ऑनलाइन सीमा शुल्क भुगतान गेटवे की क्षमता बढ़ाना आदि शामिल था। परंतु मामला केवल प्रविधि तक सीमित नहीं था।

भारत की रैंकिंग में इसलिए भी उछाल आई क्योंकि स्वयं विश्व बैंक ने अपनी प्रविधि में तब्दीली की। जिस समय मोदी सरकार रैंकिंग में भारत के तेज सुधार का जश्न मना रही थी उस समय विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री पॉल रोमर ने रैंकिंग की प्रविधियों में बदलाव को लेकर विवादों के बीच अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। सेंटर फॉर डेवलपमेंट ने रैंकिंग का नए सिरे से आकलन किया और दिखाया कि भारत की रैंकिंग कहीं कमजोर थी। दिलचस्प बात यह है कि इस आकलन के मुताबिक 2012 में भारत की रैंकिंग 132 के बजाय 113 और 2018 में 100 के बजाय 114 होनी चाहिए थी। यानी कुल मिलाकर दोनों सरकारों के कार्यकाल में भारत की कारोबारी सुगमता में कोई बदलाव नहीं आया। जमीनी हकीकत भी इसकी तस्दीक करती है।

जमीनी हकीकत

मोदी के टूरिज्म नॉट टेररिज्म (आतंकवाद नहीं पर्यटन) जैसे दिल लुभाने वाले नारे के बावजूद तथा 140 देशों के बीच सांस्कृतिक संसाधन और कारोबारी पर्यटन के मामले में आठवां स्थान पाने के बावजूद विश्व आर्थिक मंच के एक अध्ययन में भारत पर्यटन सेवा बुनियादी ढांचे में 109वें स्थान पर रहा। पर्यटन के क्षेत्र में रेस्तरां की अलग अहमियत है। यदि सरकार वाकई विश्व बैंक रैंकिंग के जरिये छवि चमकाने के बजाय कारोबारी सुगमता के माहौल में सुधार लाना चाहती थी तो उसे ध्यान देना चाहिए था कि एक रेस्तरां खोलने के लिए भारत में 15 लाइसेंस की आवश्यकता होती है जबकि सिंगापुर में चार और तुर्की में दो लाइसेंस से काम हो जाता है। यह जानकारी पहले इंडिया फाउंडेशन की एक रिपोर्ट से ली गई है। उसमें स्वास्थ्य व्यापार, पर्यावरण, आग, पर्यटन, प्रदूषण, संगीत, शराब, वाइन और बियर, विधिक माप विज्ञान, पुलिस मंजूरी, परिचालन समय आदि शामिल हैं। ध्यान रहे कि ये सभी विषय राज्य से संबंधित हैं और कुछ का संबंध नगरपालिका से है। बाबुओं के लिए इनमें से प्रत्येक धन कमाने का अवसर है। कुछ तो मासिक वसूली की तरह हैं।

ऐसे तमाम उदाहरण दिए जा सकते हैं। मसलन कर प्रताडऩा के मामलों में केंद्र शामिल है। कुछ दिन पहले वित्तीय विशेषज्ञ और मौजूदा सत्ता को पसंद करने वाले वल्लभ भंसाली ने कहा था कि यह दुख की बात है कि हमारे देश में सरकारें कुछ गंवाना नहीं चाहतीं। यदि कुछ कर व्यवस्था या प्रावधान सरकार के खिलाफ जाते हैं तो वह कानून बदल देती है। नागरिकों को हमेशा नुकसान उठाना पड़ता है। उनके नवाचार कहीं काम नहीं आते। इन बातों के चलते भरोसे की कमी उत्पन्न हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि हम कारोबारी सुगमता से भी आगे ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं जहां सरकार को कहना पड़ रहा है कि कृपया कारोबार कीजिए।

जाहिर है यह बात बहुप्रशंसित कारोबारी सुगमता रैंकिंग में भारत की स्थिति के अनुरूप तो नहीं है।

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