बिजनेस स्टैंडर्ड - रुपया 6 महीने के उच्च स्तर पर
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रुपया 6 महीने के उच्च स्तर पर

अनूप रॉय / मुंबई 08 28, 2020

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आज पूरी तरह साफ कर दिया कि वह सहज दायरे से ज्यादा बाजार दरों को बढऩे देने के पक्ष में नहीं हैं। यही वजह रही कि उसने 10 वर्षीय बेंचमार्क बॉन्ड के तकरीबन पूरे स्टॉक को बेचने से इनकार कर दिया क्योंकि उसके लिए ज्यादा ब्याज दरों की मांग की गई थी।

इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने हाजिर मुद्रा बाजार से हस्तक्षेप वापस ले लिया जिससे डॉलर के मुकाबले रुपया 6 माह के उच्च स्तर पर पहुंच गया मगर वायदा बाजार में आरबीआई ने अपना हस्तक्षेप जारी रखा।

रुपये के मजबूूत होने से आयात सस्ता होता है और मुद्रास्फीति को काबू में रहती है। इसे नीतिगत दरों में सीधे तौर पर बदलाव किए बिना ब्याज दरों में अप्रत्यक्ष तौर पर वृद्घि करने का तरीका भी माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह रणनीति अंतरिम तौर पर बनी रह सकती है क्योंकि इससे निर्यात पर फिलहाल व्यापक असर नहीं पड़ेगा चूंकि वैश्विक स्तर पर मांग में कमी बनी हुई है।

आज बॉन्ड की नीलामी ने बॉन्ड बाजार के डीलरों को हैरान कर दिया। 18,000 करोड़ रुपये के 10 वर्षीय बॉन्ड की पेशकश की गई थी लेकिन आरबीआई ने 17,983.75 करोड़ रुपये के बॉन्ड को बेचने से इनकार कर दिया। बाजार के भागीदारों द्वारा लगाई गई प्रतिस्पर्धी बोली में आरबीआई ने केवल 4 करोड़ रुपये की बोली स्वीकार की जबकि 12.26 करोड़ रुपये के बॉन्ड फर्मों, भविष्य निधि, न्यासों और खुदरा निवेशकों को गैर-प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर दिए गए।

आरबीआई के बॉन्ड पर ब्याज दर 6.14 फीसदी रखने के निर्णय के बाद 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल 6.14 फीसदी पर बंद हुआ, जो कल के बंद स्तर 6.15 फीसदी के करीब है। लक्ष्मी विलास बैंक के ट्रेजरी प्रमुख आरके गुरुमूर्ति ने कहा, 'पूरा घटनाक्रम यह दर्शाता है कि आरबीआई प्रतिफल को बढऩे देने के पक्ष में नहीं है।' उन्होंने कहा, 'सकारात्मक संकेत यह है कि वित्तपोषण की लागत कम हो और मनोबल पर असर न पड़े और यह भी कि ज्यादा प्रतिफल का भविष्य अस्थायी है।'

एक वरिष्ठ बॉन्ड डीलर ने कहा कि बेंचमार्क बॉन्ड को लेकर जिस तरह का घटनाक्रम हुआ, वैसा कभी नहीं देखा गया। सरकार ने बाजार से रिकॉर्ड 12 लाख करोड़ रुपये उधारी लेने की योजना बनाई है, जिसनेे बाजार के गणित को बिगाड़ दिया है। पिछले पखवाड़े में भी बेंचमार्क बॉन्ड में आंशिक गिरावट आई थी।

एक वरिष्ठ बॉन्ड डीलर ने नाम जाहिर नहींं करने की शर्त पर बताया, 'यह कुछ ऐसा ही है कि आरबीआई को बॉन्ड बाजार की जरूरत नहीं है और निवेशकों को बॉन्ड नहीं चाहिए। यह थोड़ा अजीब है कि जब आप तीन महीने में 10 वर्षीय बेंचमार्क को रिटायर करते हैं और फिर वापसी पर बेंचमार्क बदल जाता है।'

बिज़नेस स्टैंडर्ड की वेबिनार शृंखला अनलॉक बीएफएसआई 2.0 में आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने मुद्रा बाजार में दरें नीचे रखने के आरबीआई के कदम का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि फरवरी 2019 से नीतिगत दरों में 250 आधार अंक की कटौती की गई है और बॉन्ड बाजार को इसका पूरा लाभ दिया गया मगर प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों के बयानों से पिछले 15 दिनों सेे प्रतिफल में तेजी देखी जा रही है। दास ने दो टूक शब्दों में कहा कि सरकार के मुद्रा प्रबंधक होने के नाते आरबीआई उधारी कार्यक्रम को बिना किसी बाधा के अंजाम तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।  

शक्तिकांत दास ने कहा, 'केंद्रीय बैंक के तौर पर हम बॉन्ड एवं मुद्रा बाजार सहित वित्तीय बाजार के सभी खंडों में परिचालन में स्थिरता बनानए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम मौजूदा हालात पर पैनी नजर बनाए हुए हैं और भविष्य में सामने वाली परिस्थितियों से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद एवं सतर्क हैं।' शुक्रवार को नीलामी के दौरान बॉन्ड की बिक्री करने से इनकार करने का आरबीआई का फैसला उसके इसी इरादे की झलक थी।

सरकार ने चालू वित्त वर्ष में अब तक 6.5 लाख करोड़ रुपये उधार लिए हैं, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 73.5 प्रतिशत अधिक है। बाजार की गतिविधियों पर केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, 'अब इस वर्ष 17 नीलाद्गी हुई है, जिनमें वास्तविक रकम अधिसूचित रकम से अधिक रही।' इस बीच, शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग छह महीने के सर्वोच्च स्तर 73.40 पर पहुंच गया। आरबीआई हाजिर बाजार में दखल देने से दूर रहा।

रुपये की चाल पर फॉरेक्ससर्व के प्रबंध निदेशक सत्यजीत कांजीलाल ने कहा, 'भारत में विदेशी रकम का प्रवाह मजबूत रहा है, जिससे आरबीआई का विदेशी मुद्रा भंडार भरता चला गया। आरबीआई ने डॉलर की खरीदारी कुछ समय के लिए रोक दी और रुपये को मजबूत होने दिया। युआन और येन की देखादेखी रुपया भी डॉलर के मुकाबले सरपट ऊपर भागा।'

एमके ग्लोबल फाइनैंशियल रिसर्च सर्विसेस में प्रमुख (रिसर्च-करेंसी) राहुल गुप्ता ने कहा कि  अमेरिकी फेडरल रिजर्व सहित दुनिया के बड़े केंद्रीय बैंकों की तरफ से वित्तीय प्रणाली में रकम झोंकने के कारण वैश्विक स्तर पर जोखिम लेने का माद्दा बरकरार है।

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