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क्या बॉन्ड प्रतिफल में कमी ला सकता है आरबीआई?

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  August 26, 2020

गत शुक्रवार को एक चैनल को दिए साक्षात्कार में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने दोहराया कि केंद्रीय बैंक वृद्धि और वित्तीय स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध है और वह हर परिस्थिति के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि बैंक जरूरत पडऩे पर हर उपाय अपनाएगा। दास ने कहा कि सरकार के ऋण प्रबंधक के रूप में आरबीआई यह सुनिश्चित करेगा कि बाजार उधारी को इस तरह निपटाया जाए कि कोई विसंगति न पैदा हो।

साक्षात्कार के कुछ घंटे बाद ही बैंक को सरकारी बॉन्ड की तीन नीलामियों को निपटाने में उच्च प्रतिफल चुकता करना पड़ा। ये बॉन्ड पांच से 30 वर्ष की परिपक्वता अवधि के थे। इनके माध्यम से 32,000 करोड़ रुपये की राशि जुटाई गई जिसमें 2,000 करोड़ रुपये का ग्रीन शू विकल्प शामिल है (यह विकल्प आरंभिक पेशकश की अतिरिक्त खरीदी की इजाजत देता है)। नीलामी को पूरा करने के लिए कट ऑफ कीमत कम रखी गई। प्रतिभूतियां खरीदने वाले नुकसान कम करने के लिए द्वितीयक बाजार में बॉन्ड बेचने पहुंचे और कीमतें और कम हो गईं। 10 वर्ष का मानक प्रतिफल अब 6 फीसदी से अधिक है। बाजार में 10 वर्ष अवधि वाले तीन पत्र कारोबार के लिए हैं, इन सभी का प्रतिफल 6 फीसदी से अधिक है। पांच अगस्त से 21 अगस्त के पखवाड़े के बीच 10 वर्ष के पत्र का प्रतिफल 30 आधार अंक तक बढ़ा है। ध्यान रहे 6 अगस्त को मौद्रिक नीति समिति ने दरें अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया था। पांच वर्ष के बॉन्ड प्रतिफल में करीब 40 आधार अंक का इजाफा हुआ। वहीं 364 दिन के ट्रेजरी बिल का प्रतिफल इससे पिछले पखवाड़े से थोड़ा ज्यादा रहा। पिछले सप्ताह की नीलामी में 4,637 करोड़ रुपये की राशि प्राथमिक डीलरों को हस्तांतरित कर दी गई क्योंकि आरबीआई की तय कीमत पर सरकारी बॉन्ड के अधिक खरीदार नहीं थे। यदि इससे यह संकेत गया कि सरकारी ऋण प्रबंधक बॉन्ड प्रतिफल को मजबूत नहीं करना चाहता तो शुक्रवार की नीलामी ने बाजार को भ्रमित किया। आरबीआई न केवल उच्च प्रतिफल के लिए मान गया बल्कि उसने 2,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त जुटाने के लिए ग्रीन शू विकल्प का भी प्रयोग किया। गौरतलब है कि यह विकल्प तभी अपनाया जाता है जब किसी प्रतिभूति की मांग अनुमान से अधिक हो।

व्यवस्था में 3.75 लाख करोड़ रुपये से अधिक की नकदी होने के बाद भी बॉन्ड प्रतिफल तेज क्यों हो रही है? वह भी तब जब आरबीआई सरकार की बाजार उधारी के निपटान में कोई विसंगति न आने देने पर प्रतिबद्ध है। मैंने यह प्रश्न एक बॉन्ड कारोबारी से किया तो उसने कहा 'आधी नदी पार करने के बाद यदि नाविक आपसे पूछे कि क्या आप तैरना जानते हैं? आप क्या कहेंगे?' वह कहना चाहते थे कि आरबीआई ने काम अधूरा छोड़ दिया। मार्च से उसने नीतिगत दरों में 115 आधार अंकों की कटौती की है और व्यवस्था में प्रचुर नकदी डाली है। यह ठीक है लेकिन केंद्रीय बैंक वह नहीं कर रहा जिसका उसने वादा किया था। आरबीआई की प्रतीक्षा करने की नीति बाजार का भरोसा हिला रही है। जब तक वह तथाकथित खुली खरीद के जरिये बॉन्ड नहीं खरीदता और दीर्घावधि की प्रतिभूति की खरीद और अल्पावधि की बिक्री एक साथ शुरू नहीं करता बॉन्ड प्रतिफल मजबूत होगा। इसे कम करने के लिए मेहनत करनी होगी। चालू वर्ष में सरकारी उधारी कार्यक्रम को 7.8 लाख करोड़ के बजट उल्लेख से बढ़ाकर 12 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है ताकि राजकोषीय घाटे की भरपाई हो सके। वर्ष की पहली छमाही में 6.16 लाख करोड़ रुपये जुटाए गए इसमें ग्रीन शू विकल्प भी शामिल था। 2.33 लाख करोड़ रुपये की राशि एक वर्ष के ट्रेजरी बिल से आई और आरबीआई ने 1.44 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड खुले बाजार से खरीदे।

हालांकि भारतीय केंद्रीय बैंक सरकारी उधारी कार्यक्रम को बचाने के लिए हरसंभव उपाय करेगा लेकिन आरबीआई के डिप्टी गवर्नर और मौद्रिक नीति समिति के सदस्य माइकल पात्रा का पर्यवेक्षण मंदी का है। उनके मुताबिक पूर्वानुमान कमजोर हैं और यदि मुद्रास्फीति एक और तिमाही 6 फीसदी से ऊपर बनी रही तो मौद्रिक नीति को कुछ उपाय करने होंगे। चालू वर्ष के वृद्धि अनुमान और मुद्रास्फीति का अनुमान लगाने की आरबीआई की अनिच्छा भी अनिश्चितता बढ़ा रही है। तमाम अन्य लोगों की तरह आरबीआई भी यही तो नहीं मान रहा कि वित्त वर्ष के अंत तक मुद्रास्फीति घटकर 4 फीसदी रह जाएगी? यदि ऐसा है तो बॉन्ड कारोबारियों को कुछ राहत मिलेगी। यदि बॉन्ड प्रतिफल में इजाफा जारी रहता है तो मौद्रिक पारेषण रुक जाएगा। गत मार्च में दरों में कटौती के बाद से यह सुचारु रूप से चल रहा है। नीतिगत दरें अपने न्यूनतम स्तर पर हो सकती हैं लेकिन इसका कर्जदारों के पैसे की लागत पर कोई प्रभाव नहीं होगा। इसके समग्र प्रभाव की बात करें तो सबसे पहले तो सरकार की उधारी की लागत बढ़ेगी। इससे राजकोषीय घाटे पर दबाव बढ़ेगा। दूसरा, कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार बढ़ते सरकारी बॉन्ड प्रतिफल की राह पर चलेगा। इससे निजी उपक्रमों के लिए मुद्रा की लागत बढ़ेगी और नया निवेश करने की उनकी इच्छाशक्ति प्रभावित होगी।

इसका असर बैंक की बैलेंस शीट पर भी होगा। ऐतिहासिक रूप से देखें तो ट्रेजरी से होने वाली आय ऐसी मुद्रा है जो बैंकों को बढ़ते फंसे हुए कर्ज के उस असर से बचाती है जो ब्याज आय को क्षति पहुंचाता है। आश्चर्य नहीं कि उनका फंसा हुआ कर्ज बढ़ेगा लेकिन ट्रेजरी आय बचाव के लिए नहीं होगी। ऐसे में कई को नुकसान होगा। इसके बाद मार्क टु मार्केट नुकसान भी होगा। मार्क टु मार्केट एक लेखा व्यवहार है जहां बॉन्ड पोर्टफोलियो का मूल्यांकन चालू बाजार मूल्य पर होता है न कि उस मूल्य पर जिस पर उसे खरीदा गया था। बैंक इस नुकसान को दूर नहीं कर सकते क्योंकि बॉन्ड कीमतों में गिरावट आ रही है और प्रतिफल बढ़ रहा है। आरबीआई बैंकों की बैलेंस शीट को बचाने के लिए उनके बॉन्ड पोर्टफोलियो में रद्दोबदल कर सकती है और उन्हें परिपक्वता तक धारण रखने के तथाकथित स्तर को बढ़ा सकती है। परंतु सफल मौद्रिक पारेषण तब तक नहीं होगा जब तक ठोस कदम नहीं उठाए जाते। केवल बातों से बॉन्ड प्रतिफल में कमी नहीं आएगी।

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