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जागरूकता जरूरी

संपादकीय /  August 26, 2020

गत जून माह में तीन अध्यादेशों के जरिये लागू  किए गए कृषि विपणन सुधारों को लेकर विरोध प्रदर्शन का जो सिलसिला शुरू हुआ वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इन उपायों के कुछ किसान समर्थक पहलुओं को लेकर किस तरह गलतफहमी व्याप्त है। ये सुधार काफी समय से लंबित थे और इन्होंने कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) का एकाधिकार तोड़ते हुए किसानों को यह आजादी प्रदान की है कि वे अपनी उपज जिसे चाहे, जहां चाहे बेच सकते हैं। निजी कृषि बाजार स्थापित करने से एपीएमसी मंडियों को प्रतिस्पर्धा मिलना भी सुनिश्चित हुआ है। मंडी परिसर के बाहर जिन वस्तुओं का कारोबार होगा उन्हें बाजार शुल्क से भी रियायत प्रदान की गई है। बहरहाल जैसी कि आशा की जा रही थी, इन कदमों को लेकर विभिन्न अंशधारकों मसलन राज्य सरकारों, एपीएमसी, व्यापारियों और किसानों की प्रतिक्रिया उनके हितों के मुताबिक अलग-अलग रही। मतों का यह अंतर कई राज्यों की कृषि मंडियों में हालिया हड़ताल के दौरान भी नजर आया।

अधिकांश राज्य सरकारों ने केंद्र की पहल पर इन बदलावों को खुले दिल से या कुछ रद्दोबदल के साथ स्वीकार कर लिया है। इनमें वे राज्य भी शामिल हैं जो शुरुआत में हिचकिचा रहे थे। परंतु कुछ अन्य राज्यों ने इसे संघवाद पर हमला बताया है क्योंकि कृषि राज्यों की विषयवस्तु है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, ओडिशा और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों को इस अध्यादेश से कोई दिक्कत नहीं क्योंकि वे पहले ही अपने एपीएमसी अधिनियम में बदलाव करके मंडी से बाहर कृषि जिंसों के लेनदेन को मंजूरी दे चुके हैं। पंजाब अवश्य अपवाद बना हुआ है। कांग्रेसनीत पंजाब सरकार केंद्र के कदम को लगातार निम्रतर दिखाने का प्रयास कर रही है जबकि हकीकत में वह स्वयं अपने एपीएमसी दर्जे में बदलाव कर चुकी है और कमोबेश वैसी ही इजाजत दे चुकी है जैसी अध्यादेश में उल्लिखित है। पंजाब सरकार राज्य के अधिकार क्षेत्र में घुसपैठ का हवाला देते हुए इसे अदालत में चुनौती देने की धमकी भी दे रही है। हालांकि विधिक जानकारों का कहना है कि संविधान केंद्र को ऐसे हस्तक्षेप की अनुमति देता है और यह विरोध राजनीति प्रेरित है।

उधर, एपीएमसी और व्यापारियों का एक धड़ा कृषि बाजार में खुलेपन को लेकर अलग तरह की दिक्कतें बता रहा है। बल्कि कहा जाए तो मंडी शुल्क को लेकर वे एक दूसरे के आमने-सामने हैं। मंडी में काम करने वाले व्यापारी (आढ़तिये) चाहते हैं कि इस शुल्क को समाप्त किया जाए ताकि उन्हें उन लोगों के समान कारोबारी माहौल मिल सके जो मंडी के बाहर बिना किसी शुल्क के कारोबार कर रहे हैं। उधर, एपीएमसी इसे बरकरार रखना चाहती है क्योंकि यह उनके फंड का प्राथमिक स्रोत है। इस पर तत्काल ध्यान देना आवश्यक है। इन सुधारों को जिन किसानों के फायदे के लिए अंजाम दिया गया है वे भी एकमत नहीं हैं, हालांकि अधिकांश ने इसे सही कदम बताया है। किसानों का एक धड़ा सुधार विरोधी लॉबी द्वारा प्रसारित गलत सूचनाओं से प्रभावित होकर इससे विमुख है। वाम रुझान वाले किसान संगठन इन सुधारों को न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद की व्यवस्था खत्म करने की दिशा में उठाया गया कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि इससे व्यापारियों द्वारा किसानों के शोषण की आशंका बढ़ेगी। ऐसे में इन आशंकाओं से निपटने के लिए गहन जागरूकता अभियान की आवश्यकता है। किसानों को आश्वस्त करना होगा कि मौजूदा मंडी ढांचे और समर्थन मूल्य पर खरीद प्रणाली को समाप्त करने की कोई योजना नहीं है। प्रस्तावित उपाय प्रमुख रूप से किसानों के लिए विपणन चयन बढ़ाने से संबंधित हैं। इसके अलावा यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि मंडी के बाहर अपनी उपज बेच रहे किसानों को समय पर पूरा भुगतान मिले। अन्यथा इन सुधारों का मूल उद्देश्य ही पूरा न हो सकेगा।

Keyword: जागरूकता, अध्यादेश, कृषि विपणन, एपीएमसी, उपज, किसान, हड़ताल, मंडी, भुगतान,
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