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नई शिक्षा नीति और शिक्षा का भविष्य

नितिन देसाई /  August 25, 2020

सरकार ने करीब एक महीने पहले नई शिक्षा नीति (एनईपी) को मंजूरी दी थी। देश के भविष्य के लिए सार्वभौमिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा महत्त्वपूर्ण है। आर्थिक समृद्धि पाने के लिए शिक्षा के महत्त्व को भी सभी समझते हैं। खासकर अब जबकि हम सभी ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं। परंतु शिक्षा की सामाजिक भूमिका केवल उच्च उत्पादकता वाले श्रमिक तैयार करने तक सीमित नहीं है।

ऐसे में एनईपी के एक वक्तव्य का स्वागत किया जाना चाहिए: 'शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य बेहतर इंसान तैयार करना है जो तार्किक सोच और कार्य करने में सक्षम हों, जिनमें करुणा और समानुभूति हो, साहस और मजबूती हो, वैज्ञानिक सोच और रचनात्मक कल्पनाशीलता तथा मजबूत नैतिक मूल्य हों।' एनईपी में प्रस्तावित बदलाव इन लक्ष्यों को हासिल करने में सहायक होंगे या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा की मौजूदा कमियों से निपटने में कारगर होते हैं या नहीं। ये कमियां हैं शैक्षणिक उपलब्धियों का अपर्याप्त होना, शैक्षणिक संस्थानों के प्रबंधन में अत्यधिक राजनीतिक नियंत्रण, शिक्षा पर अपर्याप्त सरकारी व्यय आदि।

एनईपी में प्रस्तावित सबसे अहम बदलाव है 10+2 शिक्षा प्रणली के बजाय 5-3-3-4 की स्कूली शिक्षा व्यवस्था लागू करना। इसमें पहले पांच वर्ष लचीले, बहुस्तरीय खेलकूद और गतिविधि आधारित शिक्षण के होंगे। इस दौरान सबसे अधिक प्राथमिकता कक्षा तीन तक सभी छात्रों को साक्षर और अंकों की जानकारी से लैस करना होगी। इसके मूल में सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से पहले की शिक्षा मुहैया कराना अहम है। शायद एनईपी आंगनबाडिय़ों को प्राथमिक पूर्व शालाओं में बदलना चाहती है। इसके लिए उन्हें बेहतरीन बुनियादी ढांचा, खेलकूद का सामान और प्रशिक्षित शिक्षक और आंगनबाड़ी कर्मी मुहैया कराए जाएंगे। परंतु देश की 13.8 लाख आंगनबाडिय़ों का उन्नयन और 24 लाख कर्मचारियों को बतौर शिक्षक प्रशिक्षित करना आसान नहीं।

एनईपी में कहा गया है कि हर छात्र के लिए मनोरंजक पाठ्यक्रम सुनिश्चित किया जाएगा। इसके मुताबिक कक्षा 6 से 8 के बीच छात्रों को व्यावसायिक कलाएं मसलन बढ़ईगीरी, बिजली का काम, धातु का काम, बागवानी, कुम्हार का काम आदि सिखाया जाएगा। गुणवत्ता सुधारने के अन्य प्रस्ताव भी हैं। उनमें सबसे अहम है शिक्षकों के प्रशिक्षण का काम अलहदा महाविद्यालयों के बजाय विश्वविद्यालयों में करने की बात। सर्वाधिक विवादित प्रस्ताव यह है कि कम से कम कक्षा 5 तक या कक्षा 8 या उससे आगे तक शिक्षण मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा में कराया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि माता-पिता को अधिकार है वे अपने बच्चों के शिक्षण का माध्यम तय करें। एक हालिया अनुमान के मुताबिक वर्ष 2007-08 से 2017-18 के बीच अंग्रेजी माध्यम में पढऩे वाले बच्चों की तादाद 12 फीसदी से बढ़कर 23 फीसदी हो गई।

स्कूली शिक्षा की स्वायत्तता का वादा कम विश्वसनीय नजर आता है। अधिकांश स्कूलों पर केंद्र और राज्य सरकारों का सीधा नियंत्रण है और वहां शिक्षकों की भर्ती, तैनाती और स्थानांतरण आदि राजनीतिक मसले हैं। विद्यालयों में प्रधानाध्यापकों का शिक्षकों पर कोई खास अधिकार नहीं होता और उनके लिए किसी तरह का अनुशासन या प्रदर्शन मानक तय करना मुश्किल है।

एनईपी का एक प्रस्ताव स्कूल परिसरों की स्थापना करने का भी है। ऐसा उन विद्यालयों के प्रसार को देखते हुए किया गया है जहां बहुत कम छात्र और एक या दो शिक्षक होते हैं। ये परिसर एक सीमित भौगोलिक इलाके के विद्यालयों को जोड़ेंगे और इनका संचालन माता-पिता, शिक्षकों तथा अन्य अंशधारकों की समिति करेगी। ऐसा करके स्कूलों के प्रबंधन में राजनीतिक हस्तक्षेप कम किया जा सकता है। परंतु क्या हमारा राजनीतिक वर्ग इसके लिए तैयार होगा?

एनईपी के उच्च शिक्षा से संबंधित प्रस्ताव उन निजी विश्वविद्यालयों का विस्तार रोकने से संबंधित नजर आता है जो बेहतर रोजगार संभावना वाले विषयों में सीमित पाठ्यक्रम मुहैया कराते हैं। एनईपी का लक्ष्य बड़े, विविध विषयों वाले विश्वविद्यालय और कॉलेज स्थापित करने का है। इसके साथ ही वह राष्ट्रीय अनुसंधान प्रतिष्ठान की स्थापना के साथ विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शोध को बढ़ावा देने को उत्सुक है। कुछ बातें उच्च शिक्षण संस्थानों को अधिक स्वायत्तता देने से भी संबंधित है। इनका नियमन भारतीय उच्च शिक्षा आयोग के माध्यम से किया जाएगा। परंतु एनईपी में गुणवत्ता सुधार के बारे में कोई ठोस बात नहीं कही गई है। खासतौर पर मौजूदा विश्वविद्यालयों के बारे जहां शिक्षण का स्तर खराब है और राजनीति बहुत अधिक।

शिक्षा पर शासकीय व्यय की बात करें तो एनईपी में दो आंकड़े पेश किए गए हैं। इसके मुताबिक देश के जीडीपी का 4.43 फीसदी हिस्सा और सकल सार्वजनिक व्यय का 10 फीसदी शिक्षा पर व्यय होता है। दोनों आंकड़े सही नहीं हो सकते क्योंकि कुल सार्वजनिक व्यय जीडीपी का केवल 26-27 फीसदी है। परंतु आंकड़ों को लेकर उपजे इस भ्रम के बीच एनईपी दीर्घावधि में शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाकर जीडीपी के 6 फीसदी के स्तर पर ले जाने के लक्ष्य को लेकर कोई प्रस्ताव नहीं प्रस्तुत किया है। बल्कि रक्षा व्यय और आंतरिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने और गरीबी निवारण योजनाओं में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण बढ़ाने के राजनीतिक दबाव के कारण शिक्षा पर सरकारी व्यय जीडीपी के 6 फीसदी से कम बना रहा।

अहम वित्तीय चुनौती होगी उन 7.3 करोड़ बच्चों को जरूरी बुनियादी ढांचा मुहैया कराना जिन्हें प्राथमिक पूर्व शिक्षा देनी है। यही बात उन 2.5 करोड़ अतिरिक्त छात्रों पर लागू होती है जो तब उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालयों में प्रवेश लेंगे जब आने वाले वर्षों में छात्रों की तादाद में इजाफा देखने को मिलेगा। एनईपी में किंडरगार्टन नामांकन का सार्वभौमीकरण करने, व्यावसायिक शिक्षण पर जोर देने और शिक्षकों के प्रशिक्षण का काम विश्वविद्यालयों में करने की बात शामिल हैं जो भविष्य के लिए बेहतरी लाएंगी। परंतु हम यहां से वहां तक का सफर कैसे तय करेंगे। यह सवाल इसलिए क्योंकि फिलहाल स्कूलों और उच्च शिक्षा की हालत बहुत अच्छी नहीं है और मौजूदा शिक्षकों की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है।

सबसे बड़ी कमी यह है कि शिक्षा को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करने का कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया है। न ही स्वायत्तता और लचीलापन लाने की बातों में पर्याप्त विश्वसनीयता है। एनईपी में उन सुधारों का जिक्र नहीं है जो हमारे लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक हैं और जो वह नवाचारी शिक्षा मुहैया करा सकते हैं जो देश के भविष्य के लिए आवश्यक है।

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