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श्रीलंकाई राजनीति में राजपक्षे और भारत-श्रीलंका के रिश्ते

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  August 21, 2020

श्रीलंका में आयोजित हालिया संसदीय चुनावों का विश्लेषण करते हुए रूस और फ्रांस में राजदूत रहे, जिनेवा में संयुक्तराष्ट्र के स्थायी प्रतिनिधि रह चुके और मौजूदा नेता प्रतिपक्ष सजित प्रेमदासा के सलाहकार दयान जयतिलक ने लिखा: 'राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं से बार-बार दो अनुरोध किए। पहला यह कि मतदाताओं ने उन्हें राष्ट्रपति चुनाव में 69 लाख मत दिए थे लेकिन अब उन्हें 79 लाख मतों की आवश्यकता है। उनका दूसरा अनुरोध यह था कि वह दो तिहाई बहुमत चाहते हैं। उन्हें 68 लाख वोट मिले जो नवंबर 2019 में राष्ट्रपति चुनाव में मिले मतों से थोड़े ही कम हैं। पांच वर्ष पहले अगस्त 2015 में महिंदा राजपक्षे राष्ट्रपति चुनाव हार गए थे और संसदीय चुनावों में भी उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। वह श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के नेता भी नहीं रहे, उन्हें नेता प्रतिपक्ष तक नहीं बनने दिया गया और उनके पास अपना कोई राजनीतिक दल तक नहीं रह गया था। पांच वर्ष बाद महिंदा राजपक्षे दक्षिण एशियाई राजनीति में मजबूती से खड़े हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अपने इतने कार्यकालों में पहली बार उन्होंने एक बौद्ध मंदिर में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह पहला मौका था जब किसी श्रीलंकाई प्रधानमंत्री ने ऐसा किया। नया दौर दरअसल बहुत पुराना दौर ही होता है।'

जाहिर है इस पूरे वाकये को इससे बेहतर ढंग से कोई और नहीं कह सकता था। इस एक पैराग्राफ में श्रीलंका के हालिया संसदीय चुनावों का पूरा सार संक्षेप निहित है। दो तिहाई बहुमत के निहितार्थ एकदम स्पष्ट हैं: यह सत्ताधारी दल को संविधान में संशोधन करने और श्रीलंका को अपनी मर्जी से चलाने की अनुमति देता है। श्रीलंका में अधिकांश लोग इस बात पर शर्त लगा रहे हैं कि सरकार 13वें संविधान संशोधन को कितनी जल्दी खत्म करेगी। यह संशोधन भारत-श्रीलंका समझौते की उपज है और इसके माध्यम से ही श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी प्रांत में रहने वाले तमिलों को अधिकार हस्तांतरित करने की परिकल्पना निकली थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी में महिंदा राजपक्षे की भारत यात्रा के समय उनसे कहा था कि वह 13वें संशोधन का पूरी तरह क्रियान्वयन होता हुआ देखना चाहते हैं। पूरा क्रियान्वयन? प्रांतीय परिषदों को पूरी तरह प्रभावहीन किए जाने की संभावना है, तमिल बहुल उत्तरी प्रांत के गवर्नर के रूप में किसी सैन्य अधिकारी की नियुक्ति हो सकती है और तमिलों को दी गई जमीन को सशस्त्र बलों के माध्यम से यह कहते हुए वापस लिया जा सकता है कि देश की रक्षा के लिए उस जमीन की आवश्यकता है। स्पष्ट है कि नया समय बहुत जल्दी पुराने समय में तब्दील हो जाएगा।

श्रीलंका की बहुसंख्य आबादी सिंहल बौद्धों का क्या? महिंदा राजपक्षे ने भारत-तमिल गठजोड़ की पुरानी बात को दोबारा शुरू करके सिंहल बौद्धों को यह स्मरण कराना शुरू कर दिया कि सन 1980 के दशक में उन्हें किन हालात से गुजरना पड़ा था। उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि उनके साथ वह सब दोबारा हो सकता है। भारतीय विश्लेषकों का कहना है कि श्रीलंका की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। लेकिन श्रीलंका से एकमत आवाज उठ रही है कि वहां के लोगों को खतरा है और वह खतरा तमिलों के जरिये भारत से ही है। संसद में दो तिहाई बहुमत का अर्थ है कि सिंहल बौद्ध पहचान को इस तरह मजबूत किया जाएगा जैसा पहले कभी नहीं किया गया। ऐसा इसलिए किया जाएगा ताकि उन्हें दोबारा उस शर्मिंदगी से कभी न गुजरना पड़े जिसका सामना उन्हें तब करना पड़ा था जब भारत बीच में था। परंतु अब भारत कोई विकल्प ही नहीं है। अब वह केवल खड़ा-खड़ा देख सकता है कि श्रीलंका में क्या हो रहा है?

श्रीलंका में चीन की बहुत रुचि है। उसने वहां निवेश तो किया ही है राजपक्षे परिवार के कारण वहां और निवेश आएगा। परंतु श्रीलंका में तमाम लोग ऐसे भी हैं जो स्वयं यह आकलन कर रहे हैं कि यह विकल्प कैसा है। हंबनटोटा बंदरगाह सफेद हाथी बना हुआ है। मताले हवाई अड्डा दुनिया का सबसे वीरान हवाई अड्डा है। वहां से न कोई उड़ान जाती है, न वहां कोई उड़ान आती है। कोलंबो बंदरगाह का पूर्वी टर्मिनल, जिसे जापान और भारत को मिलकर बनाना था, उस पर अब नए सिरे से बातचीत होगी लेकिन इस दौरान चीन को यह चेतावनी भी है कि वह श्रीलंका के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास अन्य विकल्प हैं।

श्रीलंका के समक्ष सबसे बड़ा तात्कालिक संकट है अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करना। सरकार का कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 90 फीसदी के स्तर पर है और 50 अरब डॉलर से अधिक का बाहरी कर्ज जीडीपी के 60 प्रतिशत से अधिक हो चुका है। यदि कोविड-19 के असर को ध्यान में रखा जाए तो इस वर्ष का बजट घाटा जीडीपी के 10 फीसदी तक हो सकता है। इतना ही नहीं अर्थव्यवस्था में 5 फीसदी की गिरावट आ सकती है। करों में कटौती तथा सरकारी व्यय कम करने की कोई गुंजाइश नहीं है। सरकार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण भुगतान को स्थगित करने, बाह्य ऋण के अलावा कर्ज के पुनर्गठन पर चर्चा करनी चाहिए। अगर मुद्रा कोष मददगार नहीं साबित होता तो चीन से एक और ऋण की संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता।

बार-बार आपदाओं के बावजूद वापसी करने की श्रीलंका की क्षमता अभूतपूर्व है और यह दक्षिण एशिया के अन्य देशों के लिए उदाहरण भी है। राजपक्षे परिवार के शासन को लेकर जो भी चिंताएं और आशंकाएं हों लेकिन श्रीलंका जब भी मदद मांगे तो भारत को उसकी बिना शर्त सहायता करनी चाहिए। क्योंकि वह मदद मांगेगा अवश्य।

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