बिजनेस स्टैंडर्ड - चंबल के बीहड़ों में खेती होना मुश्किल
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चंबल के बीहड़ों में खेती होना मुश्किल

रामवीर सिंह गुर्जर और संजीव मुखर्जी /  August 21, 2020

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में चंबल नदी के करीब बसे नायकपुरा गांव के रामप्रकाश कंसाना सरकार के उस नवीनतम कदम के बारे में आशंकित है, जिसके तहत चंबल के बीहड़ों को समतल कर उन्हें खेती योग्य बनाने की योजना है। बीहड़ों में गहरे खड्डों जिन्हें स्थानीय स्तर पर भरका कहा जाता है बड़े खतरनाक हैं, वे लंबे समय से चंबल के बीहड़ों में पाए जाने वाले कई खूंखार डकैतों के घर थे। सरकार ने बीते 100 साल में चंबल के बीहड़ों में विकास और इन्हें खेती के मुफीद बनाने की कई योजनाएं बनाई हैं।

कंसाना कहते हैं कि बीहड़ की जमीन रेतीली और गहरी ज्यादा होती है। इसलिए इसे बड़े स्तर पर समतल करना संभव नहीं है। हालांकि छोटे छोटे टुकड़ों में लंबी दूरी का फासला देकर इसे खेती योग्य किया जा सकता है। चंबल एक्सप्रेसवे बनने के बारे में कंसाना का कहना है कि इसके बनने से निश्चित रूप से किसानों को लाभ होगा। लेकिन इसमें जाने वाली जमीन के बदले किसानों को जमीन मिलनी चाहिए। अगर चंबल के बीहड़ों में उद्योग लगते हैं तो यहां के लोगों को रोजगार भी मिल सकते हैं।

भारत में लगभग 70 फीसदी बीहड़ तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में फैले हुए हैं। पिछले महीने, ग्वालियर-चंबल संभाग से आने वाले और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने मध्य प्रदेश के कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, शिक्षाविदों और विश्व बैंक के प्रतिनिधियों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की, जिसमें इस बात की रिपोर्ट तैयार की गई थी कि इन बीहड़ों को कैसे समतल और कृषि योग्य बनाया जा सकता है। इसकी प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट एक महीने के भीतर प्रस्तुत की जानी है। तोमर का मानना है कि चंबल के बीहड़ में तीन लाख हेक्टेयर ऊबड़-खाबड़ जमीन खेती योग्य नहीं है, जो बेहतर होने पर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के बीहड़ क्षेत्र के एकीकृत विकास में मदद करेगी।


बीहड़ विकास के पूर्व में किए गए प्रयास

केंद्र और राज्यों की सरकारें वर्ष 1960 के दशक के बाद से बीहड़ों के सुधार के विभिन्न कार्यक्रम लाती रही हैं। केंद्र सरकार ने वर्ष 1971 में बीहड़ सुधार के लिए एक विशाल परियोजना शुरू की। 27 वर्षों में चार चरणों में कार्यान्वित की जाने वाली इस परियोजना की लागत 1,250 करोड़ रुपये थी। 25 वर्षों में इस क्षेत्र में सभी 19 परियोजनाएं शुरू की गई थीं, लेकिन लगभग 2,000 हेक्टेयर भूमि को ही पुन: प्राप्त किया जा सका। फिर, 1980 और 1990 के दशक में एक बड़े पैमाने पर प्रयास में, राज्य सरकार ने विभिन्न पौधों की प्रजातियों के बीजों को हवा में उगाने के लिए एरियल सीडिंग डिवीजन की स्थापना की। बबूल (बबूल नीलोटिका), विलायती बबूल (प्रोसोपिस) और जंगल जलेबी (पीथेसेलोबियम डलस) जैसी प्रजातियों के लिए एरियल सीडिंग की शुरुआत की गई थी। लेकिन ये प्रयोग भी असफल रहा। एक पूर्व अफसरशाह ने कहा, 'सरकारी विमान द्वारा गिराए गए बीज बारिश में बह जाते थे या एक स्थान पर फंस जाते थे और आस-पास के खेतों में भी अंकुरित हो जाते थे।' उन्होंने कहा कि भिंड-मुरैना क्षेत्र में उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी होने के बावजूद खेती करना और भी कठिन हो गया है। चंबल के बीहड़ों को विकसित करने का अंतिम प्रयास वर्ष 2015 के आखिर में किया गया था। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकार ने चंबल के बीहड़ों को समतल करने और उन्हें खेती योग्य क्षेत्रों में बदलने की एक महत्त्वाकांक्षी योजना केंद्रीय कृषि मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत की थी।

'मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र में बीहड़ों के उद्धार के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण ' नाम की इस योजना के अंतर्गत  राज्य सरकार ने चंबल, सिंध, बेतवा और क्वारी नदियों के साथ-साथ यमुना की सहायक नदियों (चंबल- यमुना की सहायक नदी) की पहचान की है। इस योजना में तीन जिलों मुरैना, श्योपुर और भिंड में पडऩे वाली 68,833 हेक्टेयर भूमि को पूरे खेत में परिवर्तित करने की परिकल्पना की गई है। इसके लिए उसने केंद्र सरकार से 900 करोड़ रुपये मांगे थे। प्रस्तावित परियोजना की कुल लागत लगभग 1,100 करोड़ रुपये होने का अनुमान था। शेष राशि राज्य सरकार और लाभार्थियों (जिन किसानों को विकसित भूमि आवंटित की जाएगी) को साझा करनी थी। इससे पहले कि यह योजना बड़े पैमाने पर आगे बढ़ सके, चौहान सरकार सत्ता से बाहर हो गई। सूत्रों ने कहा कि भाजपा ने राज्य में इस साल की शुरुआत में कांग्रेस शासन के कुछ समय बाद सत्ता में वापसी की तो एक बार फिर सरकार इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है।


बीहड़ विकास में समस्याएं

चंबल के बीहड़ों को नजदीक से जानने वाले और ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति विजय सिंह तोमर कहते हैं कि चंबल के बीहड़ों के विकास के लिए वर्ष 1919 से अब तक 50 से ज्यादा योजनाएं बन चुकी हैं। लेकिन ये योजनाएं कामयाब नहीं हुईं। अब फिर से चंबल के बीहड़ों के विकास की बात चल रही है। जहां तक चंबल के बीहड़ों को समतल कर खेती योग्य बनाने की बात है तो बीहड़ों को ना तो समतल करना संभव है और ना ही उचित है। ये बीहड़ काफी गहरे और ज्यादा कटाव वाले है। अगर बीहड़ की जमीन को समतल कर भी लिया तो अगली बारिश में मिट्टी बह जाएगी। जिससे भविष्य इनके बीहड़ बनने की फिर से संभावना बनी रहेगी। बीहड़ों में खेती करने के लिए व्यावहारिक सोच अपनानी होगी। बीहड़ों को समतल कर अनाज की खेती संभव नहीं है। लेकिन बीहड़ों की जमीन के ढांचे में थोडा बहुत बदलाव कर बागवानी मसलन अमरूद, आंवला, अनार, किन्नू, आम, बेर के साथ नीम, बबूल आदि के पेड़ लगाए जा सकते हैं। जिससे चंबल के इलाके में अच्छी बारिश होने से बीहड़ों से दूर हो रही है खेती को भी लाभ होगा। तोमर बताते हैं, 'मैंने विश्वविद्यालय में रहने के दौरान दिमनी के पास ऐसाह गांव में 25 से 30 एकड़ भूमि में फल व पेड़ के पौधे लगाए थे, जो उस समय सफल प्रयोग रहा। मेरे जाने के बाद इस योजना पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। बीहड़ों की जमीन पर विकास के कार्य करने के दौरान किसानों का गुस्सा भी झेलना पड़ता है। उस दौरान जब मैं वहां पौधरोपण करने गया तो किसान लाठी लेकर आ गए थे। बड़ी मुश्किल से किसानों को समझाया गया था।'

बीहड़ों में औद्योगिक विकास की संभावना के बारे में तोमर ने कहा कि अगर व्यावहारिक सोच के काम किया जाए तो बीहड़ों में उद्योग लग सकते हैं। बीहड़ों में बागवानी की खेती की जाए और इनसे संबंधित खाद्य प्रसंस्करण के उद्योग लगाए जाएं। इन उद्योगों को लगाने के लिए जरूरत भर की जमीन बीहड़ों में विकसित की जा सकती है। ग्वालियर स्थित माधव इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ऐंड साइंस के एक शोध से पता चला था कि बीहड़ के इलाकों में उद्योग लगाने की लागत मैदानी इलाकों से डेढ़ गुना अधिक होगी। शोध से पता चलता है कि पहले बीहड़ को समतल करना होगा। मिट्टी और कटाव की संभावना वाले इलाकों को मजबूत करना होगा।


पारिस्थितिकी मसला

यही नहीं, कृषि उपयुक्त बनाने के लिए बीह​ड़ों को समतल करना भी पारिस्थितिक समस्याएं पैदा कर सकता है क्योंकि चंबल नदी जिस क्षेत्र में है वह कई प्रकार की मछलियों, मगरमच्छों और कई प्रवासी पक्षियों का घर भी है। चंबल में लंबे समय काम करने वाले और वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट डॉ मनोज जैन बताते हैं कि चंबल के बीहड़ों का विकास होना जरूरी है। लेकिन इससे जीव जंतुओं को नुकसान नहीं होना चाहिए। चंबल एक्सप्रेसवे और बीहड़ों को समतल करने से निश्चित रूप से पर्यावरण को कुछ न कुछ नुकसान होगा। लेकिन देखना होगा कि सरकार इसकी भरपाई कैसे करती है। अगर सरकार भरपाई कर दे तो फिर विकास के लिए यह ठीक है। जब चंबल के बीहड़ों के विकास की परियोजना का पर्यावरणीय आकलन होगा, तब इस पर सवाल उठेंगे। जैन कहते हैं कि चंबल नदी घडिय़ाल और गेंगेटिक डॉल्फिन के लिए मशहूर हैं। जब गंगा में 1967 से प्रदूषण बढऩे लगा तो गैंजेटिक डॉल्फिन ने चंबल नदी की ओर रुख किया और चंबल का वातावरण इनके लिए मुफीद भी है। जैन कहते हैं कि चंबल एक्सप्रेसवे नदी किनारे से 1.5 किलोमीटर दूर बन रहा है। फिर भी चंबल के बीहड़ों में पाए जाने वाले जानवरों के आवागमन की व्यवस्था होनी चाहिए। पक्षी एक दूसरे पर आश्रित होते हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि बीहड़ों के विकास से प्रभावित होने वाले पक्षियों का दूसरा ठिकाना या विकल्प क्या होगा।

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