बिजनेस स्टैंडर्ड - घर से काम का चलन लाएगा बड़े परिवर्तन!
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घर से काम का चलन लाएगा बड़े परिवर्तन!

अजित बालकृष्णन /  August 20, 2020

'अजित, तुम इतने व्यस्त क्यों रहते हो? तुम अपना काम दूसरों के सुपुर्द करना क्यों नहीं सीखते? इससे तुम पर्यवेक्षण का काम अच्छी तरह कर पाओगे।' मुझे ऐसी दोस्ताना सलाह मेरे कामकाजी सहयोगी पहले दिन से ही देते रहे हैं। मुझे लगता है कि 1970 के दशक में भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कलकत्ता से निकलने के बाद मैं शुरुआती कामकाजी दिनों में खासा समय फेसिट कैलकुलेटिंग मशीन पर बिताया करता था। बाद में उस मशीन की जगह पर्सनल कंप्यूटर ने ले ली। जब भी मुझे ऐसी सलाह मिलती है तो मैं मुस्कराते हुए कहता हूं, 'मैं कुछ नहीं कर सकता। मेरा ताल्लुक ऐसे किसान खानदान से है जो अपने हाथों से खेत की जुताई करने एवं घास काटने के आदी हैं।' फिर मुझे सलाह देने वाला शख्स यह सोचने लगता है कि मैंने कोई जातिवादी टिप्पणी तो नहीं कर दी है। लेकिन ऐसी बातें करने और मजाक करने का मेरा कोई इतिहास न होने से वह चला जाता है।

किसी भी प्रबंध जर्नल पर सरसरी नजर भी डालें तो आपको प्रत्यायोजन के बारे में पढऩे को जरूर मिल जाएगा। अब प्रबंधन की बाइबिल कही जाने वाली हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू को ही लें, उसमें आपको महान नेता बनने के लिए यह सीखना जरूरी बताया गया है कि प्रत्यायोजन बेहतर ढंग से कैसे करें? इस बारे में सुझावों की भरमार है कि प्रत्यायोजन किस तरह और क्यों करें? हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू पत्रिका की ही सलाह है, 'ऐसे तमाम  कारण हैं जिनकी वजह से प्रबंधक अपना दायित्व दूसरों को नहीं सौंपते हैं। कुछ पूर्णतावादी होते हैं जिन्हें लगता है कि हर काम खुद कर लेना कहीं आसान है या फिर वे अपने काम को दूसरों से बेहतर मानते हैं।' एक प्रबंधक को लगातार ऐसे शख्स के तौर पर पेश किया जाता है जो अच्छे कपड़े पहनता है, अच्छी तरह बोलता है लेकिन किसी जटिल गुणा-भाग या किसी संभावित ग्राहक को सामान बेचने में अपना सिर नहीं खपाता है। इसी तरह किसी मीडिया कंपनी के प्रबंधक से साक्षात्कार लेने और लेख लिखने की अपेक्षा नहीं की जाती है। प्रबंधक से दूसरों के काम में समन्वय बिठाने के लिए महंगे सम्मेलन कक्ष में बैठक लेने की उम्मीद होती है। मेरी दृढ़ धारणा है कि जमीनी काम से दूर रहने वाले ऐसे प्रबंधकों की दुनिया अचानक ही ढहने वाली है। ऐसा कोविड-19 महामारी के प्रसार और उसकी वजह से कर्मचारियों के बीच घर से काम करने (वर्क फ्रॉम होम) की नई प्रवृत्ति के कारण हो सकता है। संचार एवं शेयरिंग करने वाले सॉफ्टवेयर टूल्स की अचानक भरमार होने से समन्वय एवं बंदोबस्त करने का वह काम काफी हद तक हो जा रहा है जो परंपरागत तौर पर इन प्रबंधकों का दायित्व माना जाता रहा है।

दुनिया भर में कंपनियां बड़ी शिद्दत से यह पता लगाने की कोशिश में जुटी हैं कि किस तरह के कामों को वर्क फ्रॉम होम की श्रेणी में रखा जाए और किस तरह के काम वर्क फ्रॉम ऑफिस श्रेणी में गिने जाएं। क्या यह विभाजन इस आधार पर होना चाहिए कि वह काम उस कंपनी के लिए कितना अहम है? इस तरह से निर्धारण करने पर उतने अहम नहीं माने जाने वाले कार्यों को वर्क फ्रॉम होम श्रेणी में डाला जा सकता है। क्या आने वाले समय में कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन में इस आधार पर भी विभेद देखने को मिलेगा कि अमुक काम किस श्रेणी में आता है? क्या वर्क फ्रॉम होम श्रेणी वाले कार्यों को आउटसोर्स कर किसी छोटे ठेकेदार को दे दिए जाएगा?

ऐसी निराशाजनक भविष्यवाणियों के बीच थोड़ा ठहरकर सांस लेना सही होगा। ऐसी स्थिति में इतिहास पर नजर डालने से कुछ सबक सीखे जा सकते हैं।

पहली बात तो यह है कि कर्मचारियों को कारखाने और फिर दफ्तर में एक साथ इक_ा करना कोई प्राचीन अवधारणा नहीं है। लोगों के एक समूह के एक छत के नीचे काम करने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्हें सीधी निगरानी में रखने की अवधारणा 18वीं सदी के आखिर में इंगलैंड में हुई प्रथम औद्योगिक क्रांति की ही देन है। सूत कातने वाली बड़ी मशीन वाटरफ्रेम के आविष्कारक रिचर्ड आर्कराइट को जल्द ही अहसास हो गया कि उनकी मशीन इतनी बड़ी है कि किसी एक घर में उसे नहीं रखा जा सकता है। फिर आर्कराइट ने इस मशीन को इंगलैंड के डर्बीशर स्थित एक बड़ी जगह पर लगाया और सभी श्रमिकों को क्रॉमफोर्ड मिल नाम की फैक्टरी में इक_ा बुलाया। उसके पहले तक पूरी दुनिया में धागे की कताई एवं कपड़े की बुनाई का सारा काम कारीगर अपने घरों में रहकर यानी वर्क फ्रॉम होम करते आए थे।

आर्कराइट की वाटरफ्रेम मशीन के आविष्कार ने फैक्टरी की अवधारणा को जन्म देने के साथ इसका विस्तार भी किया। इसी के साथ बैंकिंग, रेल, बीमा एवं टेलीग्राफी जैसे उद्योगों के समानांतर विकास ने भी क्लर्कों की जरूरत पैदा की। मिले हुए ऑर्डर को पूरा करने, अकाउंटिंग और कागजात को व्यवस्थित रखने की जरूरत पूरी करने के लिए क्लर्कों की दरकार थी। इन सभी चीजों के एक साथ इक_ा होने पर ऑफिस यानी दफ्तर का स्वरूप सामने आया। माना जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी का लंदन की लीडेनहॉल स्ट्रीट में 1729 में खुला कार्यालय दुनिया का पहला बड़ा ऑफिस था। इस दफ्तर से कंपनी के अफसर उपनिवेशों में कारोबार का संचालन करते थे।

शुरुआती दिनों से ही दफ्तरों एवं कारखानों की  प्रगति इतनी तीव्र रही है कि वह आधुनिकता एवं प्रगति के प्रतीक बनते गए और घर में रहते हुए काम करने की पुरानी परिपाटी को पिछड़े एवं गंवार लोगों का काम माना जाने लगा। इसका नतीजा यह हुआ कि दुनिया के किसी भी हिस्से में रहने वाले हरेक मध्यवर्गीय बच्चे की चाहत 'ऑफिस जॉब' पाने की हो गई। आखिर दफ्तरों में किए जाने वाले काम को आधुनिक माना जाता था।

बहुत जल्द बिज़नेस स्कूल भी नमूदार हो गए। इनकी शुरुआत अमेरिका में हुई और फिर दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी वे नजर आने लगे। ये बिज़नेस स्कूल दफ्तर में काम करने के सही एवं गलत तरीकों के बारे में उपदेश देने लगे। समाजशास्त्रियों एवं मनोविज्ञानियों ने आपसी गठजोड़ कर सांगठनिक व्यवहार के बारे में कई सिद्धांत पेश किए, संगठन के भीतर कर्मचारियों की भूमिका एवं संबंधों और दायित्वों को परिभाषित भी किया गया। ये सारे सिद्धांत वर्क फ्रॉम ऑफिस संगठन के लिए प्रतिपादित किए गए थे। यहां तक कि प्रबंधकों एवं कर्मचारियों के लिए पोशाकें भी निर्धारित की गईं। ऑफिस जॉब और इसकी संस्कृति सामंती ढांचे खासकर भारत में बखूबी फिट बैठी। इस तरह एक प्रबंधकीय तबका सामने आया जो बंद केबिन में बैठता था और लंबी कतारों में लगी मेजों पर तैनात कमतर लोगों के काम की निगरानी करने के साथ कॉन्फ्रेंस रूम में बैठक करने में व्यस्त रहता था।

दुनिया के कई प्रतिष्ठित संगठन इस समय अपने 60-70 फीसदी कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम ढांचे में ही बनाए रखने के बारे में सोच रहे हैं। वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था की तरफ अचानक हुए इस बड़े झुकाव से मध्यवर्ग की उस जानी-पहचानी दिनचर्या में कहीं नाटकीय बदलाव तो नहीं आने वाला है। आखिर अभी तक एक मध्यवर्गीय व्यक्ति सुबह जगने के बाद नहा-धोकर तैयार होने, नाश्ता करने, काम पर जाने, दिन भर दफ्तर में बिताने और शाम को वापस घर लौटने की दिनचर्या का कितना अभ्यस्त हो चुका है।

क्या आईआईएम समेत तमाम प्रबंध शिक्षण संस्थानों को जल्द ही अपने पाठ्यक्रम में बदलाव कर अपने छात्रों को यह बात भी सिखानी पड़ेगी कि उन्हें भी पॉलिटेक्निक एवं आईटीआई संस्थानों से निकले युवाओं की तरह अपने हाथों से ही काम करने होंगे?

(लेखक इंटरनेट उद्यमी एवं आईआईएम कलकत्ता के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के पूर्व चेयरमैन हैं)

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