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रोजगार संकट

संपादकीय /  August 20, 2020

कोविड-19 महामारी के प्रसार की रोकथाम के लिए लागू किए गए देशव्यापी लॉकडाउन का आर्थिक वृद्धि पर गहरा असर हुआ है। यह नुकसान स्थायी हो सकता है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के मुताबिक देश में बेरोजगारी की दर फरवरी के 7.76 फीसदी से बढ़कर अप्रैल में 23.52 फीसदी हो गई। जब लॉकडाउन खोला गया तो हालात में बदलाव आना शुरू हुआ और जुलाई में बेरोजगारी की दर 7.43 फीसदी रह गई जो फरवरी के स्तर से भी कम थी। देश के ग्रामीण इलाकों में रोजगार की स्थिति शहरी इलाकों से बेहतर रही और जुलाई में वहां बेरोजगारी दर घटकर 6.66 फीसदी रह गई। कई लोगों ने इसी आधार पर यह दलील दी कि ग्रामीण भारत सुधार का नेतृत्व करेगा।

परंतु नए आंकड़े बताते हैं कि शायद यह सही नहीं हो। ग्रामीण भारत में बेरोजगारी दर जुलाई के अंत के 6.55 फीसदी से बढ़कर 18 अगस्त तक 7.56 फीसदी हो गई थी। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि अधिकांश रोजगार कृषि क्षेत्र में उत्पन्न हो रहे थे। मॉनसूनी फसलों की बुआई पूरी होने के बाद बेरोजगारी बढऩी ही थी। हालांकि इस वर्ष कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन बेहतर रहने की आशा है लेकिन इससे सतत सुधार को गति मिलने की आशा नहीं है। ऐसे में लक्ष्य यह होना चाहिए कि लोगों को खेती से परे किया जाए और इसे अतिरिक्त रोजगार के रूप में न देखा जाए।

कुल मिलाकर देखें तो श्रम बाजार की स्थिति बड़ी चिंता का विषय है। जैसा कि सीएमआईई के महेश व्यास ने कहा, असंगठित क्षेत्र में रोजगार लौट आए हैं बल्कि उनमें इजाफा ही हुआ है जबकि संगठित रोजगार में ऐसा नहीं हुआ। आंकड़ों के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान 1.89 करोड़ वेतनभोगियों यानी करीब 22 फीसदी लोगों ने रोजगार गंवाए। जून तिमाही के वित्तीय नतीजे भी यही दिखाते हैं कि कुछ क्षेत्रों में कर्मचारियों की लागत में भारी कमी करके घाटे को संभालने का प्रयास किया गया है। असंगठित क्षेत्र में सुधार और नौकरीशुदा लोगों के रोजगार में कमी श्रम बाजार के ढांचे को बदलने वाली साबित होगी। इसका व्यापक असर होगा।

यह संभव है कि जो वेतनभोगी रोजगार गंवा रहे हैं उनकी हालत निकट भविष्य में न सुधरे क्योंकि विभिन्न कंपनियां लागत को कम करने में लगी हुई हैं। ऐसे में रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को कम वेतन वाली असंगठित व्यवस्था से भी समझौता करना पड़ सकता है। इससे आने वाले दिनों में अधिक संगठित होने के बजाय श्रम बाजार ज्यादा असंगठित होगा। दूसरी तरह से देखें तो श्रम शक्ति में शामिल लोगों का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा। श्रम बाजार का ज्यादा असंगठित होना सकल उत्पादकता पर भी असर डालेगा। इतना ही नहीं रोजगार और आय का जाना समग्र मांग और आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित करेगा।

यह भी संभव है कि एक बार अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों के सामान्य कामकाज शुरू करने और आर्थिक गतिविधियों में सुधार होने के बाद इन गंवाए गए रोजगारों का एक हिस्सा वापस मिल जाए। परंतु ऐसा तब तक होता नहीं दिखता जब तक कि वायरस पर अच्छी तरह काबू नहीं पा लिया जाता। ऐसे में तात्कालिक चुनौती वायरस पर नियंत्रण की है ताकि उत्पादन और रोजगार में हुए नुकसान की भरपाई की जा सके। सरकार को सतत सुधार के लिए सक्षम माहौल भी बनाना होगा। धीमी गति से होने वाले सुधार रोजगार निर्माण को कठिन बनाएंगे और मध्यम अवधि में हमें शायद धीमी आर्थिक वृद्धि से समझौता करना पड़े। कृषि क्षेत्र का बेहतर प्रदर्शन आश्वस्त करने वाली बात है लेकिन इससे समग्र नीतिगत लक्ष्य प्रभावित नहीं होना चाहिए। हमें विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में अधिक से अधिक रोजगार तैयार करने होंगे ताकि सतत रूप से उच्च वृद्धि हासिल की जा सके।

Keyword: रोजगार संकट, लॉकडाउन, सीएमआईई, बेरोजगारी, ग्रामीण रोजगार, कृषि क्षेत्र, वेतनभोगी,
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