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भारतीय रेल की सब्सिडी के सामने टिक सकेंगी निजी ट्रेन!

शाइन जैकब /  08 20, 2020

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 4 अक्टूबर, 2019 को दिल्ली और लखनऊ के बीच तेजस एक्सप्रेस ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी। सरकार तथा कई मीडिया संगठनों ने इसे स्वतंत्र भारत की पहली 'निजी ट्रेन' का दर्जा दिया। हालांकि इस ट्रेन का परिचालन सरकारी कंपनी भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) द्वारा किया जाता है। तेजस को इस बात का नमूना माना जा सकता है कि भारतीय रेल पटरियों पर एक निजी ट्रेन किस तरह दिखेगी।

तेजस एक्सप्रेस का एसी टिकट 1,280 रुपये और एग्जीक्यूटिव चेयर कार का टिकट 2,450 रुपये है, जो भारतीय रेल द्वारा संचालित स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस के मुकाबले (एसी टिकट 970 रुपये तथा एग्जीक्यूटिव चेयर कार टिकट 1,935 रुपये) काफी अधिक है। हालांकि, दोनों ट्रेनों में डायनैमिक यानी घट-बढ़ कीमत प्रणाली लागू थी। जनवरी 2020 में आईआरसीटीसी ने रेलवे सेवाओं के निजीकरण के व्यापक अभियान के तहत मुंबई और अहमदाबाद के बीच दूसरी रेल सेवा शुरू की।

साल 2023 तक लगभग 30,000 करोड़ रुपये के निवेश से 109 मार्गों पर 151 निजी ट्रेन की योजना के साथ सवाल यह उठता है कि क्या अत्यधिक रियायती दरों पर परिचालन करने वाली भारतीय रेल के मुकाबले निजी कंपनियां प्रतिस्पर्धा कर सकेंगी? भारतीय रेलवे यात्री खंड में यात्रा की लागत का केवल 57 प्रतिशत वसूलती है जबकि उपनगरीय मार्गों पर यह वसूली लगभग 40 प्रतिशत है। हालिया उपलब्ध अनुमानों के आधार पर, रेलवे यात्रियों के लिए केवल 36 पैसा प्रति 10 किलोमीटर के आसपास शुल्क लेता है, लेकिन उसी दूरी के लिए लगभग 73 पैसे खर्च करता है। वहीं, दिल्ली -लखनऊ तेजस एक्सप्रेस में एसी चेयर कार और एग्जीक्यूटिव श्रेणी के लिए यह शुल्क क्रमश: 2.5 रुपये और 4.8 रुपये प्रति किमी है। भारत में निजी रेल सेवा के लिए संभावित बोलीदार एक कंपनी के अधिकारी ने कहा, 'दुनिया में कहीं भी रेलगाडिय़ां उस दर पर नहीं चलती हैं जिस दर पर भारतीय रेल चलती है। रेलवे के लिए अधिक सब्सिडी पर परिचालन करना एवं अपने कर्मचारियों को भुगतान करना मुश्किल हो जाएगा। इसीलिए मेरा मानना ​​है कि भविष्य में दरों में वृद्धि होनी चाहिए।' पिछले महीने, जीएमआर ग्रुप, स्टरलाइट पावर, भारत फोर्ज, जेकेबी इन्फ्रास्ट्रक्चर, मेधा ग्रुप, आरके एसोसिएट्स, बॉम्बार्डियर, आईआरसीटीसी और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स (बीएचईएल) ने एक बैठक में भाग लिया था और रेलवे पटरियों पर 160 किलोमीटर प्रति घंटे की निर्धारित ट्रेन गति सहित कई चिंताओं को उठाया था। वर्तमान में केवल दिल्ली और झांसी के बीच चल रही गतिमान एक्सप्रेस ही इस सीमा तक चलने में सक्षम है।

लॉकडाउन से पहले, यात्री पैसेंजर ट्रेनों की औसत गति लगभग 44 किमी प्रति घंटे और मालवाहक ट्रेनों की लगभग 23 किमी प्रति घंटा थी। इसके अलावा, व्यवहार्यता भी एक प्रमुख कारक रहा। बेंगलूरु स्थित एक ऑनलाइन आरक्षण कराने वाले ऐप, कन्फर्मटिकट के सह-संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी दिनेश कुमार कोठा को लगता है कि यह कोई मुद्दा नहीं होना चाहिए। वह कहते हैं, 'सब्सिडी केवल गैर-एसी श्रेणी के लिए है। निजी कंपनियों की प्रीमियम श्रेणी में परिचालन करने की उम्मीद है, जहां  भारतीय रेल के लिए भी कोई सब्सिडी नहीं है।' वह कहते हैं, 'साथ ही, तत्काल एवं डायनैमिक कीमतें निर्धारण प्रणाली में भी लोग टिकट की अधिक कीमत का भुगतान करने के लिए तैयार हैं। दिल्ली-वाराणसी मार्ग पर चलने वाली तेजस के मामले आईआरसीटीसी ने साबित किया है कि उच्च कीमतों एवं विमानन कंपनियों जैसी सुविधाओं के साथ लाभ कमाया जा सकता है।'

वास्तव में मूल्य निर्धारण संबंधी चिंताओं का जवाब तेजस एक्सप्रेस से लिया जा सकता है। आईआरसीटीसी ने पहले महीने में 7.73 लाख रुपये की कमाई की है। तेजस ने पहले महीने के दौरान 62 प्रतिशत की औसत सीट यात्रा के साथ कमाई के इस कड़े को छुआ। कोठा का मानना ​​है कि इस स्तर पर सेवाएं व्यवहार्य हैं। वह कहते हैं, 'प्रत्येक ट्रेन की लागत लगभग 150 करोड़ रुपये होगी। इसमें रेलवे को भुगतान किए जाने वाले बिजली तथा दूसरे शुल्क के अलावा पूंजी एवं विपणन लागत भी शामिल होगी। मेरा मानना ​​है कि 50-60 फीसदी औसत सीट यात्रा के साथ कंपनियां ट्रिप लेवल पर ब्रेकईवन यानी नफा न नुकसान का स्तर हासिल कर सकेंगी।' उन्होंने कहा, 'पांच वर्षों तक औसत सीट यात्रा लगभग 70-80 प्रतिशत रहने से आपको लगभग पूरा निवेश वापस मिल जाएगा।'

रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह भी कहा कि मांग कोई मुद्दा नहीं होगा। निजी ट्रेनों के लिए चुने गए मार्गों में 100 प्रतिशत से अधिक की व्यस्तता है, इसलिए एक और ट्रेन को जोडऩे से केवल मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी। डायनैमिक कीमत निर्धारण प्रणाली भी व्यवहार्यता सुनिश्चित करेगी। स्पेनिश निर्माता टैल्गो की भारतीय इकाई के प्रमुख सुब्रत नाथ ने कहा, 'मेरा मानना ​​है कि ऐसी ट्रेनों के किराये की कोई ऊपरी सीमा नहीं होगी। वर्तमान में, भारतीय रेलवे का उपयोग करने वालों में से 30 प्रतिशत वातानुकूलित श्रेणी में यात्रा करते हैं। निजी कंपनी से बेहतर सेवाएं मिलने पर वे अधिक भुगतान करने के लिए तैयार हैं।'

इसके अलावा, विमानन सेवाओं के मुकाबले ट्रेनों को एक अतिरिक्त लाभ है। ट्रेन शहर के अंदर से होते हुए गुजरती हैं जबकि हवाई अड्डे बाहरी इलाकों में होते हैं और लोगों को आवाजाही एवं प्रतीक्षा में काफी समय लग जाता है, क्योंकि विमान की उड़ान से दो घंटे पहले सुरक्षा जांच होना आवश्यक है। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा तथा छुपी हुई लागत भी शामिल है। उदाहरण के लिए, आईआरसीटीसी नई दिल्ली-लखनऊ तेजस एक्सप्रेस पर एक घंटे से अधिक की देरी के लिए 100 रुपये और दो घंटे से अधिक की देरी के लिए 200 रुपये का मुआवजा देती है।

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