बिजनेस स्टैंडर्ड - ध्वनि प्रदूषण पर लगाम
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ध्वनि प्रदूषण पर लगाम

संपादकीय /  August 19, 2020

राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) ने दिल्ली में ध्वनि प्रदूषण के मानकों का उल्लंघन करने पर जुर्माना बढ़ाने का निर्णय किया है जो ध्वनि प्रदूषण की बढ़ती समस्या पर लगाम लगाने की दिशा में सार्थक कदम है। परंतु केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को यह सलाह देना भी उतना ही अहम है कि वह देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसे कदम उठाए। संशोधित जुर्माने के तहत 10,000 रुपये से एक लाख रुपये तक के नकद जुर्माने के अलावा शोर करने वाले उपकरण की जब्ती और पांच वर्ष तक के कारावास की बात कही गई है। दरअसल यह कदम हाल के समय में उठाए गए उन उपायों का हिस्सा है जिनकी मदद से लगातार बेलगाम होते ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय तथा कुछ उच्च न्यायालयों ने कई बार बड़े शहरों के नगर निकायों और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की आलोचना करते हुए कहा है कि वे इस दिशा में जरूरी कदम नहीं उठा रहे। परंतु इसका भी कोई खास लाभ नहीं हुआ। ये संस्थान या तो ध्वनि प्रदूषण के तय मानक के उल्लंघन की अनदेखी करते हैं या फिर उल्लंघन करने वालों को महज चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है। दंडात्मक कार्रवाई बहुत कम की जाती है। यही कारण है कि एनजीटी ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है जो प्रदूषण मानकों का पालन सुनिश्चित कराएगी।

शहरी इलाकों में ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में तेज संगीत, सड़क, रेल और हवाई परिवहन, उद्योग-धंधे, विनिर्माण गतिविधियां, बिजली जनरेटर, पटाखे और सामाजिक तथा धार्मिक आयोजनों में लाडस्पीकर का इस्तेमाल प्रमुख हैं। यदि लंबे समय तक 80 डेसिबल से तेज ध्वनि सुनी जाए तो वह चाहे संगीत ही क्यों न हो, सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इससे सुनने की क्षमता अस्थायी अथवा स्थायी रूप से समाप्त हो सकती है। कारों, रेस्तरां या बार आदि में तेज संगीत युवाओं में श्रवण समस्याओं की प्रमुख वजह है। अत्यधिक शोर से उच्च रक्तचाप, हृदय की समस्याएं, तंत्रिका संबंधी समस्याएं, नींद का बाधित होना और तनाव जैसी बीमारियां हो सकती हैं। कार्यस्थल पर तेज शोर का असर कर्मचारियों की एकाग्रता, काम करने की क्षमता और उत्पादकता पर पड़ सकता है।

विभिन्न स्थानों पर ध्वनि का स्तर 80 डेसिबल से कम निर्धारित है। आवासीय इलाकों में यह दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल तक तथा औद्योगिक इलाकों में क्रमश: 75 और 70 डेसिबल हो सकता है। अस्पतालों तथा शैक्षणिक संस्थानों के आसपास यह दिन में 50 और रात में 40 डेसिबल तक रह सकता है। परंतु अधिकांश जगहों पर इन मानकों का उल्लंघन होता है। इनकी निगरानी की भी उचित व्यवस्था नहीं है। हालांकि 2011 में बेंगलूरु, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता, लखनऊ और मुंबई में राष्ट्रीय परिवेशी शोर निगरानी नेटवर्क स्थापित किए गए थे लेकिन अब तक 70 निगरानी केंद्र ही बन सके हैं। ये अपर्याप्त हैं। तमाम अन्य प्रदूषणों की तरह ध्वनि प्रदूषण भी इंसानी गतिविधियों मसलन औद्योगीकरण, शहरीकरण और आधुनिक जीवन शैली की देन है इसलिए इससे निपटने के लिए प्रतिरोधक और दंडात्मक कदम आवश्यक हैं। सबसे पहले तो लोगों को मानव स्वास्थ्य पर इसके नकारात्मक असर के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। विभिन्न जगहों पर ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि शोर का प्रभाव कम हो। हॉर्न बजाने पर प्रतिबंध तथा वाहनों के सही रखरखाव को बढ़ावा देने से भी इसमें कमी आ सकती है। एनजीटी ने जो तमाम अनुशंसा की हैं और जिनका अभी क्रियान्वयन होना है उनमें से एक यह है कि प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र जारी करते समय वाहन के शोर का स्तर भी मापा जाए। इसे तत्काल लागू किया जाए। ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम 2020 भी ध्वनि प्रदूषण रोकने में मददगार होंगे।

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