बिजनेस स्टैंडर्ड - लॉकडाउन में लबालब हुआ दूध
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लॉकडाउन में लबालब हुआ दूध

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली August 19, 2020

कोविड-19 का प्रसार रोकने के लिए किया गया लॉकडाउन देश भर के लगभग सात करोड़ डेरी किसानों के लिए गलत समय पर सामने आया है, जैसा कि यह कई अन्य क्षेत्रों के लिए भी गलत साबित हुआ है। लगातार कई वषों से नरम दामों के बाद वर्ष 2019-20 के शीर्ष सत्र में दूध की खरीद दर बढऩी शुरू हुई थी। इससे किसानों को नकदी मिलने लगी थी जिसकी उन्हें बहुत जरूरत थी।

अलबत्ता मार्च में लगाई गई पाबंदी की वजह से होटल, रेस्तरां और सड़क किनारे चाय स्टॉल जैसे थोक उपभोक्तओं की मांग में तेज गिरावट आ गई, क्योंकि उन्हें काम बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। आइसक्रीम, मक्खन और पनीर जैसे प्रमुख दुग्ध उत्पादों की बिक्री में भी गिरावट आ गई। इनमें आम तौर पर गर्मियों के दौरान तेजी आती है।

इसका परिणाम यह हुआ कि निजी और सहकारी डेरियों द्वारा की जाने वाली खरीद कम हो गई। खबरों से पता चलता है कि अप्रैल के बाद से भैंस के दूध के खरीद मूल्य में 20 से 40 प्रतिशत तक की गिरावट आई है और गाय के दूध के मामले में तो यह गिरावट और भी ज्यादा है। चिंता की बात यह है कि यह गिरावट कमजोर सत्र के दौरान आई है, जब सामान्यत: दामों में तेजी आने लगती हैं, क्योंकि इस दौरान आपूर्ति कम रहती है।

फरवरी तक ऐसी बात नहीं थी। असल में, नवंबर 2019 और फरवरी 2020 के बीच देश के अधिकांश हिस्सों में खरीद मूल्य में लगभग 20 प्रतिशत और कुछ क्षेत्रों में तो 35 प्रतिशत से भी अधिक का इजाफा हुआ था।

दुग्ध उत्पादकों के लिए, विशेष रूप से दूध जैसी जिंसों के मामलें में जहां उपभोक्ता मूल्य का 80 प्रतिशत से अधिक भाग उत्पादकों के खाते में स्थानांतरित होता है, यह इजाफा पिछले तीन सालों कीकम आमदनी वाली प्रवृत्ति के उलट था जिसकी बहुत ज्यादा जरूरत थी।

स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी) के दाम केवल एक साल पहले तक तकरीबन 150 से 170 रुपये प्रति किलोग्राम चल रहे थे। फरवरी के आखिर और मार्च की शुरुआत तक इसके दाम दोगुने होकर 310 से 320 रुपये हो गए थे। मक्खन के दाम लगभग 290 से 310 रुपये प्रति किलोग्राम बोले जा रहे थे, जबकि पनीर 350 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर बिक रहा था। इस कमजोर सत्र से पहले एसएमपी का स्टॉक 1,25,000 टन औसत के मुकाबले लुढ़ककर 30,000-40,000 टन के स्तर पर आ गया था।

लॉकडाउन के बाद

लॉकडाउन के बाद परिदृश्य में बदलाव हुआ है। हाल तक किसानों का अनुसरण करने वाली डेरियों ने मांग में गिरावट की वजह से दरों में कमी करनी शुरू कर दी थी। हालांकि राज्य सरकारों ने महाराष्ट्र की तरह मदद के लिए कुछ व्यवस्था की, लेकिन यह पर्याप्त नहीं थी। जिस अतिरिक्त दूध को छोटी निजी डेरियों ने खरीदने से मना कर दिया, वह दूध सहकारी बास्केट में आ गया, हालांकि आइसक्रीम और मक्खन युक्त दूध जैसी अधिक मूल्य वाली चीजों की बिक्री में कोई इजाफा नहीं हुआ था।

लॉकडाउन के दौरान सहकारी डेरियों द्वारा की जाने वाली औसत दैनिक खरीद में जहां पिछले साल के मुकाबले 3.4 प्रतिशत तक की गिरावट आई, वहीं दैनिक बिक्री में लगभग नौ प्रतिशत तक की गिरावट आ गई जिससे स्टॉक बढऩे लगा।

उद्योग के भागीदारों का कहना है कि हालांकि सरकार द्वारा प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के बाद जुलाई के बाद से मांग में तेजी आई है और अप्रैल से जून के दौरान खरीद व बिक्री के बीच का अंतर 13 प्रतिशत से घटकर नौ प्रतिशत रह गया है, लेकिन यह अंतर अब भी अधिक है। उद्योग के सूत्रों के अनुसार फिलहाल सहकारी संघों के पास 1,70,000 टन एसएमपी है जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाले 62 प्रतिशत अधिक है तथा उनके पास 1,04,000 टन मक्खन (40.50 प्रतिशत अधिक) और 22,000 टन घी (47 प्रतिशत अधिक) है।

भारत के कुल अनुमानित 18 करोड़ टन से अधिक दूध उत्पादन में लगभग 48 प्रतिशत की खपत या तो उत्पादक स्तर पर होती है या फिर ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-उत्पादकों को बेचा जाता है। बाकी 52 प्रतिशत विपणन योग्य अधिशेष होता है।

उपभोक्ताओं के लिए कोई राहत नहीं

उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के अनुसार लॉकडाउन के दौरान उपभोक्ता खुदरा मूल्य में गिरावट नहीं आई। असल में कुछ शहरों में यह प्रति लीटर दो से आठ रुपये तक बढ़ गया है, जबकि उत्पादकों की खरीद दरों में तेज गिरावट आई है।

चिंता की बड़ी बात यह है कि अब देश अतिरिक्त दूध और दुग्ध उत्पादों से लबालब है। इसलिए जब तक यह स्टॉक समाप्त नहीं हो जाता, तब तक खरीद में तेजी नहीं आएगी। लेकिन यह बात उत्पादकों को दूध बिक्री से नहीं रोकेगी क्योंकि शीर्ष सत्र शुरू हो रहा है। इसका मतलब यह है कि दूध प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होगा और अगर डेरियां तथा सहकारी समितियां खरीद में कटौती कर देती हैं, तो दामों में और गिरावट आएगी तथा ग्रामीण परिवार तबाह हो सकते हैं क्योंकि दूध उनके लिए नकदी का शीघ्र प्रबंध करने का सबसे आसान तरीका होता है।

स्टॉक का निपटान करने का एक जरिया निर्यात है। वैश्विक बाजार में भारतीय दूध की कुछ मांग है और अगर कुछ सब्सिडी दी जाती है, तो इस अतिरिक्त मात्रा को बाहर निकाला जा सकता है। राज्य सरकारों के लिए दूसरा विकल्प अस्पतालों, आंगनबाड़ी केंद्रों या स्कूलों के जरिये मुफ्त दूध वितरण योजनाएं शुरू करना है। तीसरा विकल्प जिसकी कुछ विशेषज्ञ तरफदारी कर रहे हैं, वह है मिल्क पाउडर का बफर स्टॉक बनाना।

इस बीच सहकारी डेरियों ने निर्यात छूट के लिए केंद्र से संपर्क किया है। उन्होंने कृषि उत्पादों की परिवहन और विपणन सहायता योजना (टीएमएएस) में डेरी उत्पादों को शामिल करने का दबाव बनाया है। इसके अलावा वे भारत से व्यापारिक वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस) के अंतर्गत निर्यात प्रोत्साहन को मौजूदा पांच प्रतिशत से बढ़वाकर 20 प्रतिशत करवाना चाहते हैं।

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