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स्वर्ण ऋण: लोगों के हाथ में ज्यादा नकदी पर जोर देना सही कदम

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  August 19, 2020

भारतीयों का पुराने समय से ही सोने से तगड़ा मोह रहा है। वे आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों वजहों से अपने पास अधिक से अधिक सोना रखना चाहते हैं। मगर उनकी इस आदत से अर्थशास्त्री और सरकार खफा होते हैं, जो इसे मृत यानी अनुत्पादक परिसंपत्ति मानते हैं। इसलिए उनकी लगातार कोशिश रही है कि किसी भी तरीके से लोगों के सोने को बाहर निकलवाया जाए, जिस पर वे कुंडली मारे बैठे रहते हैं।

यही वजह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने पिछले दिनों घोषणा की कि अब केंद्रीय बैंक सभी बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को कर्जदारों द्वारा गिरवी रखे जाने वाले सोने के मूल्य के 90 फीसदी तक स्वर्ण ऋण देने की मंजूरी देगा। पहले यह सीमा 75 फीसदी थी। आरबीआई के इस कदम को कुछ लोगों ने अच्छा बताया है, लेकिन कुछ ने आलोचना भी की है। इसलिए हम यहां इस कदम और उसके मायनों की व्यापक पड़ताल कर रहे हैं।


क्या कदम उठाया गया?

आरबीआई गवर्नर ने रीपो और रिवर्स रीपो दरों से संबंधित मौद्रिक नीति समिति के फैसलों की जानकारी देने के अलावा अन्य बहुत से विकासात्मक और नियामकीय उपायों की घोषणा की ताकि कोविड-19 महामारी और उसके चलते लगाए गए लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था में पैदा हुए दबाव को कम किया जा सके। इन उपायों में से एक यह है कि गैर-कृषि उद्देश्यों की खातिर सोने के आभूषणों को गिरवी रखकर दिए जाने वाले ऋणों के लिए मूल्य की तुलना में स्वीकृत ऋण के स्तर को 75 फीसदी से बढ़ाकर 90 फीसदी कर दिया गया है। यह रियायत 31 मार्च, 2021 तक मिलती रहेगी।

इस कदम के असर को आसानी से समझा जा सकता है। अब आपको सोने की पहले जितनी मात्रा गिरवी रखने पर बैंक से ज्यादा ऋण मिलेगा। उदाहरण के लिए पहले आप 1,000 रुपये मूल्य का सोना गिरवी रखने पर अधिक से अधिक 750 रुपये का ही ऋण ले सकते थे, लेकिन अब आप 900 रुपये तक का ऋण ले पाएंगे।


ऐसा क्यों किया गया?

आत्मनिर्भर भारत पैकेज के ज्यादातर फैसलों का लक्ष्य छोटी और बड़ी दोनों तरह की कंपनियों के वजूद को बनाए रखना था। इस पैकेज में कंपनियों के लिए ऋण और अन्य प्रावधान किए गए थे। लोगों के लिए उठाए गए कदम मुख्य रूप से जरूरतमंदों को नकदी और खाद्यान्न के आपात हस्तांतरण की प्रकृति के थे। ऐसा लगता है कि वह आपात आवश्यकता खत्म हो चुकी है और उसकी जगह मध्यम अवधि के स्थायित्व के उपायों की जरूरत ने ले ली है। देश में बड़ी संख्या में सलाहकारों और खुद का काम-धंधा करने वाले उन लोगों की सहायता करने की भी जरूरत थी, जिनकी आमदनी का स्रोत बंद हो गया था।

इस नीति की दिशा में बदलाव का पहला कदम वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की हाल की घोषणा थी, जिसमें कहा गया कि आत्मनिर्भर भारत पैकेज में घोषित तीन लाख करोड़ रुपये की इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम अब लोगों के लिए भी उपलब्ध होगी। स्वर्ण ऋण के संबंध में गुरुवार को दी गई रियायत भी लोगों को ज्यादा नकदी मुहैया कराने की दिशा में दूसरा कदम है।

सोने की कीमत पिछले छह महीने के दौरान करीब 40 फीसदी चढ़ चुकी है, इसलिए ऐसी रियायत को लागू करने का यह अच्छा समय है। लोगों को न केवल सोने की कीमत बढऩे से सोने की पहले जितनी मात्रा पर ज्यादा ऋण मिल पाएगा, बल्कि सोने के मूल्य के मुकाबले ऋण की सीमा में ढील से भी ज्यादा कर्ज मिल सकेगा। स्वर्ण ऋण बैंक और एनबीएफसी मुहैया करा सकते हैं, इसलिए वे व्यापक रूप से उपलब्ध ऋण बढ़ाने के साधन हैं।


क्या कोई नकारात्मक असर होंगे?

पहले बैंकों को सोने की कीमत का 25 फीसदी बफर दिया जा रहा था यानी वे गिरवी रखे जाने वाले सोने की कीमत के मुकाबले अधिकतम 75 फीसदी ही ऋण दे रहे थे। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि वे सोने की कीमतों में संभावित गिरावट के असर से खुद को महफूज रख सकें। ऊपर इस्तेमाल किए गए उदाहरण को फिर देखते हैं। माना कि सोने की कीमत इतनी गिर जाती है कि आपने अपने बैंक के पास जो सोना गिरवी रखा है, उसकी कीमत 1,000 रुपये से घटकर 900 रुपये रह जाती है। अब जो ढील दी गई है, उससे पहले यह कीमत अधिकतम ऋण राशि 750 रुपये से ज्यादा होती, जो डिफॉल्ट की स्थिति में पर्याप्त बफर होता।

अब ढील के बाद बैंक के पास ऐसी स्थितियों में कोई बफर नहीं होगा। बैंक द्वारा दिया गया ऋण और उसके पास गिरवी रखे सोने का मूल्य दोनों एकसमान 900 रुपये हो जाएंगे। हालांकि यह एक जोखिम है, लेकिन सीमित है। सरकार ने समय-समय पर दिखाया है कि वह मुश्किल घड़ी में बैंकों और एनबीएफसी को मदद देने के लिए तैयार है, इसलिए यह कोई बड़ी चिंता नहीं है। इसके बजाय लोगों के हाथ में ज्यादा से ज्यादा नकदी देने पर ध्यान दिया जा रहा है और यह सही भी है।

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