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मौद्रिक नीति नियमन और तकनीकविद

टीटी राम मोहन /  August 19, 2020

रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य का मानना है कि देश में सरकारों ने वित्तीय स्थिरता के साथ समझौता किया है क्योंकि वे बैंकिंग तंत्र का इस्तेमाल वृद्धि को गति देने के लिए करना चाहती हैं।

बुनियादी ढंग से देखें तो वित्तीय स्थिरता के साथ तो हमेशा ही समझौता किया गया है। केंद्रीय बैंक जिन लक्ष्यों को लेकर चलता है उनमें से एक यह भी है। उसके अन्य लक्ष्यों में वृद्धि, मुद्रास्फीति, विनिमय दर और वित्तीय समावेशन शामिल हैं। अल्पावधि में वित्तीय स्थिरता को अन्य लक्ष्यों को संतुलित करने के लिए काम में लाया जाता है।

सैद्धांतिक तौर पर देखें तो केंद्रीय बैंक, बैंकों के लिए पूंजी पर्याप्तता का स्तर बढ़ाकर कहीं अधिक वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित कर सकता है। केंद्रीय बैंक की इस पर भी राय हो सकती है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए जरूरी पूंजी जुटाए। यदि ऐसा नहीं होता है और ऋण वृद्धि प्रभावित होती है तो यह सरकार की दिक्कत है।

सरकार द्वारा ऐसे कदम का विरोध करना लाजिमी है। क्या यह बात सरकार को बुरा बनाती है? यकीनन नहीं। इसका अर्थ केवल यह है कि सरकार केंद्रीय बैंक से इस बात को लेकर सहमत नहीं है कि वृद्धि और स्थिरता को लेकर अल्पावधि का संतुलन किस मोड़ पर कायम होगा।

अपनी हालिया प्रकाशित पुस्तक 'क्वेस्ट फॉर रिस्टोरिंग फाइनैंशियल स्टैबिलिटी इन इंडिया' में आचार्य ऐसे कई उपायों के बारे में बताते हैं जिनके माध्यम से राजकोषीय दबदबा वित्तीय स्थिरता को प्रभावित करता है। सरकारों के पास व्यय बढ़ाने की राजकोषीय गुंजाइश नहीं है। वे चाहेंगी कि केंद्रीय बैंक ऋण विस्तार के माध्यम से वृद्धि को गति प्रदान करे। फंसे हुए कर्ज के मानकों को शिथिल किया जाएगा ताकि बैंकों को दोबारा पूंजी प्रदान करने की आवश्यकता न हो। ऐसी तमाम बातों का ही परिणाम है कि बैंकिंग संकट और वृद्धि में रुकावट।

ये सारी बातें सही हैं लेकिन भारत के लिए ऐसी बात कुछ विशिष्ट नहीं है। अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों में भी ऋण में तेजी की घटनाएं देखने को मिली हैं। वैश्विक वित्तीय संकट तक ऐसे कई दौर आए जब राजकोषीय दबदबे का स्तर अवश्य अलग-अलग रहा। अमेरिकी केंद्रीय बैंक के बारे में कह सकते हैं कि उसके पास रिजर्व बैंक से अधिक स्वायत्तता है। परंतु इस बात ने भी फेडरल रिजर्व को नियमन में बदलाव करने से नहीं रोका। इन बदलाव ने ऋण विस्तार में मदद की। आखिरी समय में निजी बैंकरों ने भी जमकर लॉबीइंग की।

बैंकिंग संकट केवल उस समय नहीं होता जब राजनीतिक प्राधिकार केंद्रीय बैंक की नजर के नीचे सार्वजनिक क्षेत्र के दबदबे वाले तंत्र का इस्तेमाल वृद्धि बढ़ाने के लिए करता है। निजी बैंकरों के लिए ऋण वृद्धि से प्रोत्साहन जुड़ा है। स्वतंत्र केंद्रीय बैंक भी ऋण वृद्धि को लेकर पूर्वग्रह से मुक्त नहीं होते। निजी बैंकों का दबाव भी राजनेताओं के दबाव जैसा ही गहरा हो सकता है। केंद्रीय बैंकर भी सेवानिवृत्ति के बाद निजी बैंकों में आराम की नौकरी पर नजर रखते हैं। सरकार हो, बैंकर हों या केंद्रीय बैंक प्रोत्साहन हमेशा ऋण विस्तार के साथ होता है।

आचार्य का सुझाव है कि अगर हमारे यहां राजकोषीय अनुशासन और केंद्रीय बैंक को स्वतंत्रता होती तो वित्तीय स्थिरता तय होती और वृद्धि में आए दिन गिरावट नहीं आती। आखिर कितनी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं उस स्थिति में पहुंच सकीं? कितने बाजारोन्मुखी, लोकतांत्रिक देश बिना तेजी और गिरावट के चक्र के वृद्धि हासिल करने में कामयाब हुए? अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक अध्ययन में वर्ष 1970 से 2011 के बीच 115 देशों में हुए 140 बैंकिंग संकट का दस्तावेजीकरण किया गया। इसके मुताबिक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की औसत लागत 6.8 फीसदी थी।

इन अर्थव्यवस्थाओं में निजी बैंकों का दबदबा है और उनके केंद्रीय बैंक स्वतंत्र हैं। ऐसे में चीन की सफलता की कहानी सामने आती है। यह लोकतांत्रिक देश नहीं है। वहां राज्य पूंजीवाद है और उसका बैंकिंग क्षेत्र में सरकारी बैंकों का दबदबा भारत से ज्यादा है।

ऋण विस्तार वृद्धि को बढ़ावा देता है और बैंकिंग तंत्र को संकट से निकलने में मदद करता है। इसमें फंसे हुए कर्ज का निपटान शामिल हो सकता है। मसलन हाल ही में आरबीआई द्वारा घोषित ऋण पुनर्गठन योजना। वित्तीय स्थिरता के लिए केंद्रीय बैंक शायद कठिन विकल्प अपनाने से बचे। सरकार भी नाखुश होगी और केंद्रीय बैंक पर दबाव बढ़ाएगी। यह अच्छे और बुरे के बीच की लड़ाई नहीं है। यह उन दो लोगों के बीच नजरिये का फर्क है जिनमें से एक मतदाताओं के प्रति जवाबदेह है और दूसरा नहीं।

जब सरकार का केंद्रीय बैंक से मतभेद होता है तो जरूरी नहीं कि प्रेरणा हमेशा दुर्भावना भरी हो। विरोधाभासी लक्ष्यों में संतुलन को लेकर मतांतर हो सकता है। सवाल यह है कि मौद्रिक नीति और नियमन पर कौन निर्णय लेगा? कुछ लोगों का मानना है कि ये निर्णय तकनीकविदों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। उनका मानना है कि तकनीकविद दूरगामी निर्णय लेने में बेहतर सक्षम होते हैं जबकि राजनेता चुनावों को ही ध्यान में रखते हैं। आचार्य इसकी तुलना टेस्ट मैच खिलाड़ी और टी-20 के खिलाड़ी से करते हैं।

क्या यह बात भारत के लिए सही है? यहां राजनीतिक दलों को आए दिन चुनावों का सामना करना पड़ता है। उन्हें न केवल आम चुनावों की चिंता करनी होती है बल्कि राज्यों और नगर निकायों के चुनावों का भी ध्यान रखना होता है। क्या वे केंद्र में सत्ता हासिल करने के लिए वित्तीय स्थिरता और दीर्घावधि की वृद्धि को दांव पर लगा सकते हैं? आज देश में जिस राजनीतिक दल का दबदबा है वह निकट भविष्य में सत्ता में बना रहना चाहेगा। प्रमुख विपक्षी दल करीब एक सदी से भी अधिक पुराना है। ऐसे में प्रश्न यह है कि टेस्ट मैच खिलाड़ी कौन है: दीर्घकालिक राजनीतिक दल या तीन वर्ष के कार्यकाल वाले तकनीकविद?

आचार्य चाहेंगे कि केंद्रीय बैंक को कानूनी सहायता प्रदान की जाए। इससे असहमत हुआ जा सकता है। एक लोकतांत्रिक देश में मौद्रिक नीति और नियमन को पूरी तरह तकनीकविदों पर नहीं छोड़ा जा सकता है। हमने बीते वर्षों के दौरान यही सीखा है कि निर्वाचित सरकार के प्रति जवाबदेह तकनीकविदों से भी बुरे वे तकनीकविद होंगे जो किसी के अधीन और किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे।
(लेखक आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफसर हैं)

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