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'हम पर्यावरण और वृद्धि को देते हैं बराबर अहमियत'

आदिति फडणीस /  August 16, 2020

बीएस बातचीत

पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने आदिति फडणीस को बताया कि पर्यावरण प्रभाव आकलन योजना का प्र्रारूप अदालती फैसलों और वृद्धि की अनिवार्यताओं को मद्देनजर रखते हुए पर्यावरण की सुरक्षा करता है। बातचीत के अंश:

बहुत सी परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी लेने की प्रक्रिया में जनता के साथ विचार-विमर्श को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। कुछ में विचार-विमर्श की अवधि घटा दी गई। ऐसा क्यों किया गया? विचार-विमर्श की अवधि को 30 दिन से घटाकर 20 दिन करने से कारोबारी सहूलियत पर कैसे असर पड़ेगा?

वर्ष 2006 में जारी अधिसूचना में कहा गया है कि 1.5 लाख वर्ग मीटर तक की इमारतों के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन और जन सुनवाई आवश्यक नहीं है। इसलिए आज भी 2006 की अधिसूचना के मुताबिक पर्यावरण प्रभाव आकलन जरूरी नहीं है। हमने यह सुविधा केवल 50,000 वर्ग मीटर तक की इमारतों तक सीमित कर दी है। हम  प्रस्ताव रख रहे हैं कि केवल हरित इमारतों को ही 1.5 लाख वर्ग मीटर तक की यह रियायत मिलेगी।


लेकिन इसमें उन लोगों के बारे में विचार नहीं किया, जिनकी आजीविका प्रभावित हो सकती है...

नहीं। हमने 2006 का मौजूदा प्रावधान नहीं बदला है।


ऐसे बहुत से लोग हैं, जो यह मानते हैं कि 2006 का प्रावधान अपने आप में खामियों से भरा है।

वह एक अलग चीज है। लेकिन हमने 2006 के प्रावधान में कोई बदलाव नहीं किया है। इसलिए जो लोग 2006 में चुप थे, वे अब इस तरह से अपनी आपत्ति दर्ज नहीं करा सकते। केवल इसलिए कि हमने ऐसा किया है?


इसमें उल्लंघनों के लिए माफी का भी प्रावधान है।

आप परियोजना के बाद के उल्लंघनों के बारे में पूछ रही हैं। माना कि कोई व्यक्ति कुछ निर्माण करता है, जो पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करता है। इसके बाद वह व्यक्ति मंजूरी मांगता है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संपग्र) सरकार ने 2010, 2012 और 2013 में तीन कार्यालय ज्ञापन जारी किए। उन्होंने इन तीन कार्यालय ज्ञापनों के जरिये पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत महज एक लाख रुपये के जुर्माने के साथ निर्माण के बाद की मंजूरी दी। उन्होंने ऐसा तीन बार किया। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने उसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कार्यालय ज्ञापन अधिसूचनाओं की जगह नहीं ले सकते।

इस विषय में अदालत के तीन फैसले भी आए हैं। झारखंड उच्च न्यायालय ने कहा कि आप केवल इस आधार पर किसी उद्योग के आवेदन पर विचार करने से इनकार नहीं कर सकते क्योंकि उसने पहले समय से मंजूरी नहीं मांगी। आपको इसके बारे में गुणवत्ता के आधार पर विचार करना होगा। उच्चतम न्यायालय ने दो फैसले दिए। एक में शीर्ष अदालत ने कहा कि बंद करना कोई समाधान नहीं है। आप उसके बारे में गुणवत्ता के आधार पर विचार करेें, लेकिन पर्यावरण मंजूरी दी जाए। ऐसे में आज और संभावित पर्यावरण मंजूरी यानी उन्हें पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया के तहत पूर्ण मंजूरी मिलने के बीच क्या होता है? उन्हें पूरी पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया पूरी करनी होगी और उन्हें उसके बाद केवल संभावित अवधि के लिए पर्यावरण मंजूरी मिलेगी। ऐसे में इस अवधि के बीच में क्या किया जाता है? इस बीच की अवधि में भारी विलंब शुल्क लगाया जाता है क्योंकि हमें पर्यावरण संरक्षण कानून की धारा 15 के तहत यह शक्ति मिली हुई है। परियोजनाओं की वजह से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के लिए भारी शुल्क लगाए जाएंगे। इसलिए हम सभी इकाइयों को नियामकीय दायरे में लाना चाहते हैं। आप मंजूरी न लेने की वजह से हजारों उद्योगों को नियामकीय दायरे से बाहर नहीं रख सकते। अदालत ने भी कहा कि इन उद्योगों को बंद करना समाधान नहीं है। आपको उनके बारे में खूबी के आधार पर विचार करना चाहिए। इसलिए हमने अदालत के इन तीन फैसलों की भावनाओं को भी प्रारूप में शामिल किया है। हमने कुछ नया नहीं किया है।


ऐसे में सरकार उल्लंघनों से कैसे निपटेगी?

आज भी ताजा मामला लीला होटल्स का है। उन्होंने उल्लंघन किया था क्योंकि 2010, 2012 और 2013 और कुछ महीने हमारे कार्यकाल में उल्लंघन की खिड़की खुली थी। इसलिए हमने क्या किया? कंपनी पर 7.5 करोड़ रुपये और अपने क्षेत्र में पर्यावरण कार्य करने का जुर्माना लगाया। उन्होंने कुछ प्रस्ताव रखा था। उसके बाद जब फाइल मेरा पास आई तो उसमें 70 मदों में हर पर 10 लाख रुपये खर्च करने की पेशकश थी। मैंने कहा कि आप कुछ नहीं कर रहे हैं, कुछ ठोस करें। अब वे 50 जगहों पर 50 कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र खोल रहे हैं, इसलिए वह एक ठोस कार्य है। वे 300 घरों में सौर पैनल लगा रहे हैं। मेरा मानना है कि आगे ऐसा किया जाना चाहिए।


लेकिन पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं, मिट्टी को पहले ही काटा जा चुका है और हो सकता है कि मछलियां मर रही हों...

एक मिनट। हर एक पेड़ काटने या हटाने के लिए आपको पांच पेड़ लगाने होंगे। टिकाऊ विकास और पर्यावरण सुरक्षा का सबसे अच्छा उदाहरण दिल्ली मेट्रो है। हो सकता है कि उन्होंने प्रत्येक स्टेशन के लिए पांच से 10 पेड़ हटाए हों लेकिन उन्होंने पांच गुना पेड़ लगाए भी हैं।


लेकिन लीला होटल और उसके द्वारा पर्यावरण को पहुंचाए गए नुकसान को लेकर क्या होगा?

एक मिनट, एक मिनट। अब देश में 50 लाख लोग पर्यावरण अनुकूल तरीके से सफर कर रहे हैं, जिससे पांच लाख कार सड़कों पर नहीं आ रही हैं। इसलिए यह वृद्धि और टिकाऊ वृद्धि का सबसे अच्छा उदाहरण है, जिसमें आप प्रकृति को संरक्षित कर रहे हैं, पेड़ों की संख्या बढ़ी है, अन्यथा वे वृक्षारोपण नहीं करते। लेकिन उन्होंने पौधे लगाए हैं, पेड़ बढ़े हैं...केवल इस प्रावधान की वजह से। इसके साथ ही रोजाना 50 लाख लोग पर्यावरण अनुकूल सफर कर रहे हैं। यह कोई छोटी चीज नहीं है।


यह आगे के लिए है, लेकिन पिछले उल्लंघनों के लिए क्या करेंगे?

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उद्योग को बंद करना समाधान नहीं है। झारखंड उच्च न्यायालय ने भी कहा है कि आपको उनके मामलों पर गुणवत्ता के आधार पर विचार करना चाहिए। इसलिए इन आदेशों के बाद आप क्या कर सकते हैं? अगर आप मेरी जगह होती तो आप क्या करतीं?

ये अदालत के आदेश हैं। हम केवल अदालती आदेेशों का पालन कर रहे हैं। हम भारी जुर्माना लगा रहे हैं। पर्यावरण मंजूरी पिछली तारीख से नहीं दी जाएगी बल्कि आगे की संभावित तारीख से दी जाएगी। उन्हें ईएसी और ईआईए के पास जाना होगा और एक पर्यावरण प्रबंधन योजना देनी होगी। ऐसा करना उनके लिए अनिवार्य है। इस तरह उन्हें पेचीदा प्रक्रिया से गुजरना होगा और उसके बाद उन्हें पर्यावरण मंजूरी संभावित रूप से दी जाएगी। उस अवधि के बीच में उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।

मेरा सीधा सा सवाल यह है कि वर्ष 2010, 2012 और 2013 में इसी तरह के कार्यालय ज्ञापन जारी किए गए। उस समय किसी ने आपत्ति दर्ज नहीं कराई।


एक तर्क यह है कि अगर किसी व्यक्ति ने तब आपत्ति नहीं की तो उन्हें अब आपत्ति दर्ज करानी चाहिए...

तब इसमें समस्या है। नहीं? तीन बार आप कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराते हैं और आप केवल चौथी समीक्षा में जागते हैं...वह भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद। अन्यथा हमारा विकल्प उनको बंद करना था। हम उन्हें बंद करने को तैयार थे। मुद्दा यह है कि अदालत ने कहा कि बंद करना विकल्प नहीं है।

पर्यावरणविदों के बीच यह धारणा है कि आप किसी भी कीमत पर उद्योग के पक्षधर हैं, भले ही पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचे। उद्योग का मानना है कि आप वृद्धि की कीमत पर पर्यावरणविदों के आगे झुक गए हैं। क्या सही है?

हम पर्यावरण और वृद्धि को समान महत्त्व देते हैं।

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