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एमपीसी को लचीलेपन के साथ ताकत की दरकार

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  August 12, 2020

मौद्रिक नीतिगत ब्याज दरें तय करने के लिए 2016 में बनी मौद्र्रिक नीति समिति (एमपीसी) की पिछले हफ्ते 24वीं बैठक होने के साथ ही इसके चार साल पूरे हो गए। समिति के छह सदस्यों ने इस बार नीतिगत दरों को यथावत रखने का फैसला किया। एमपीसी की बैठकों में लिए गए अधिकांश फैसले सर्वसम्मत रहे हैं लेकिन 14 मौकों पर विभाजित रहे।

एमपीसी ने 13 बार नीतिगत दरें स्थिर रखने के फैसले किए जबकि नौ बार दरों में कटौती की। उसने दो बार दरों में 25 आधार अंकों की वृद्धि का फैसला भी किया। दरों में कटौती के समय 25 से लेकर 75 आधार अंकों के बदलाव हुए। कभी-कभी 35 और 40 आधार अंकों की गैर-परंपरागत कटौती भी की गई। एमपीसी के अस्तित्व में आने के बाद अधिकतम ब्याज दर 6.5 फीसदी रही है जबकि अभी यह 4.0 न्यूनतम फीसदी पर है जो कि इसका ऐतिहासिक निम्न स्तर भी है। एमपीसी का गठन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर ऊर्जित पटेल की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की उस रिपोर्ट के आधार पर किया गया था। उसे लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्य-निर्धारण का दायित्व सौंपा गया था। विशेषज्ञ समिति ने मुद्रास्फीति को 10 फीसदी से चरणबद्ध रूप से घटाते हुए 4 फीसदी पर लाने का लक्ष्य निर्धारित किया था जिसमें 2 फीसदी के दायरे में घट-बढ़ हो सकती है। पहले पांच वर्षों के लिए 4 फीसदी मुद्रास्फीति का लक्ष्य रखा गया है। यह अवधि मार्च 2021 में खत्म हो रही है।

अगर मुद्रास्फीति लगातार तीन तिमाहियों तक निर्धारित दायरे से अधिक रहती है तो आरबीआई को सरकार को यह बताना होगा कि ऐसा क्यों हुआ और वह किस तरह से मुद्रास्फीति को दायरे में लाना चाहती है? एमपीसी ने मुद्रास्फीति संबंधी अपने निर्देशों पर टिके रहने के मामले में अच्छा प्रदर्शन दिखाया है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद भारत में मुद्रास्फीति कमोबेश दायरे के भीतर ही रही है। केवल दो महीने यह निचले स्तर से भी नीचे रही और जून तक के पिछले छह महीनों में औसत मुद्रास्फीति 6 फीसदी से ऊपर रही है।

आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य कहते हैं, 'मौद्र्रिक नीति प्राधिकरण के ब्याज दर संबंधी फैसलों पर परोक्ष विषम दबाव है: ब्याज दरों में कटौती को तरजीह दी जाती है और मुद्रास्फीति पूर्वानुमान में गलतियां होना खास बात नहीं माना जाता है। वहीं ब्याज दरों में वृद्धि के साथ मुद्रास्फीति बढऩे का पूर्वानुमान खासकर नापसंद किया जाता है।'

सैद्धांतिक तौर पर सरकार हमेशा ही आरबीआई गवर्नर को प्रभावित कर सकती है और उसी तरह गवर्नर भी एमपीसी में शामिल आरबीआई के दो अधिकारियों को प्रभावित कर सकते हैं। मौद्रिक नीति तय करने में आरबीआई गवर्नर को अंतिम प्राधिकार देने वाली पिछली व्यवस्था में बदलाव होने के बाद एमपीसी में अब छह सदस्य होते हैं। इनमें से तीन सदस्य आरबीआई के होते हैं जबकि बाकी सदस्य अकादमिक जगत के होते हैं। अगर किसी फैसले पर 3-3 की बराबरी वाली स्थिति आ जाती है तो फिर गवर्नर के पास निर्णायक मत होता है।

हालांकि पहली एमपीसी की कार्यावधि में ऐसे मौके भी आए जब खुद आरबीआई के तीनों सदस्यों की राय एक जैसी नहीं थी। अगस्त 2017 में छठी बैठक में 25 आधार अंकों की कटौती के फैसले के समय तत्कालीन गवर्नर ऊर्जित और उनके नायब विरल आचार्य जहां इसके पक्ष में थे, वहीं उनके ही साथी माइकल पात्रा दरें स्थिर रखने के पक्षधर थे। इसी तरह अप्रैल 2019 में ब्याज दरों में एकसमान कटौती का निर्णय लेने के समय मौजूदा गवर्नर शक्तिकांत एवं पात्रा दो बाहरी सदस्यों से सहमत थे लेकिन विरल आचार्य इसके पक्ष में नहीं थे। इस बात को लेकर बहस तेज होने लगी है कि क्या मुद्रास्फीति लक्ष्य का अब भी कोई मतलब रह गया है? आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने हाल ही में कहा था, 'हम भारत में मुद्रास्फीति के स्तर को वैश्विक मुद्रास्फीति से जोड़कर देखते हैं। लेकिन अब इस पर आम राय बनने लगी है कि धर्मनिरपेक्ष ठहराव, जनांकिकी गतिशीलता और तकनीकी प्रगति के नाते दुनिया संरचनात्मक रूप से निम्न मुद्रास्फीति वाले दौर में प्रवेश कर चुकी है। अगर ऐसा है तो फिर क्या हमें अब भी मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4 फीसदी ही रखना चाहिए या फिर उसे नीचे लाना चाहिए?'

लेकिन इस राय से हर कोई सहमत नहीं है। कई लोगों का मत है कि भारत विकासशील अर्थव्यवस्था होने से मुद्रास्फीति को 2 फीसदी पर लाने का लक्ष्य नहीं रख सकता है। असल में, उन्हें लगता है कि आरबीआई ने मुद्रास्फीति के लक्ष्य निर्धारण में लचीलापन नहीं दिखाया है और 4 फीसदी के स्तर को लेकर वह आसक्त है। उनका कहना है कि भारतीय संदर्भ में 2 फीसदी की मुद्रास्फीति काफी कम है और इसे 3-6 फीसदी के दायरे में रखा जाना चाहिए। अगला सवाल यह है कि बाजार के जानकारों को लाकर क्या एमपीसी का संयोजन बदला जाना चाहिए? अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति-निर्माण इकाई फेडरल ओपन मार्केट कमेटी में भी ऐसे विशेषज्ञ शामिल नहीं हैं। पहली एमपीसी के तीन बाहरी सदस्य शानदार अकादमिक पृष्ठभूमि वाले सम्मानित विशेषज्ञ हैं। लेकिन अर्थशास्त्रियों के अलावा वित्त एवं श्रम जैसे विविध क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों को समिति का सदस्य बनाने के बारे में सोचने में कोई खराबी नहीं है।

आखिर में, एमपीसी को समूचे नीतिगत ढांचे के बारे में अपनी बात रखने का अधिकार जरूर होना चाहिए। यह आरबीआई द्वारा बैंकों को दिए जाने वाले धन पर लगने वाले ब्याज और बैंकों द्वारा अपनी अतिरिक्त रकम रखने पर आरबीआई द्वारा दिए जाने वाले ब्याज की दर (रिवर्स रीपो) दोनों मामलों में होना चाहिए। फिलहाल यह केवल नीतिगत रीपो दर के बारे में ही फैसला करती है। ऐसे में आरबीआई चाहे तो रिवर्स रीपो दर को कम कर एमपीसी को फालतू बना सकती है। जब आर्थिक प्रणाली में अतिरिक्त तरलता होती है तो रिवर्स रीपो दर ही असल में परिचालक रीपो दर बन जाती है।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

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