बिजनेस स्टैंडर्ड - उच्च प्रतिफल देने वाले बाजारों की अहमियत
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उच्च प्रतिफल देने वाले बाजारों की अहमियत

आकाश प्रकाश /  August 11, 2020

जब कोई व्यक्ति अमेरिका में शेल उद्योग के विकास और वृद्धि का अध्ययन करता है तो पाता है कि यह वास्तव में बहुत अचंभित करने वाली सफलता की कहानी है। यह उद्यमिता, तकनीक, नियामकीय सहनशीलता और निजी संपत्ति अधिकारों की जीत है। कुछ ड्रिलरों ने गैर-परंपरागत क्षेत्रों में खुदाई का जोखिम लिया और उन्हें पूंजी बाजारों का यथासंभव समर्थन भी मिला। अमेरिका में तेल का दैनिक उत्पादन वर्ष 1970 में एक करोड़ बैरल के सर्वोच्च स्तर पर था, जो मुख्य रूप से शेल ऑयल के उत्पादन में बढ़ोतरी से पिछले कुछ वर्षों में नई ऊंचाइयों को छू गया है। अमेरिका में तेल का दैनिक उत्पादन वर्ष 2008 में घटकर 60 लाख बैरल पर आ गया था। लेकिन उसके बाद उत्पादन का रुझान पलटा और यह वर्ष 2019 में 1.2 करोड़ बैरल पर पहुंच गया। अमेरिका में ज्यादातर उत्पादन शेल की बदौलत बढ़ा है। इससे अमेरिका ऊर्जा के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रह गया है। इसने पेट्रोलियम उद्योग का अर्थशास्त्र और भूराजनीति भी बदल दी है। आज अमेरिकी शेल ऑयल ही कीमतें तय करता है और तेल की सीमांत बैरल का उत्पादन करता है।

शेल का सबसे पहले असर प्राकृतिक गैस पर पड़ा। प्राकृतिक गैस की कीमतें नए निचले स्तरों पर आ गईं, जिससे बिजली के लिए गैस की खपत बढ़ी। इससे बिजली बनाने के लिए कोयले पर निर्भरता कम हुई।

आप भले ही किसी भी तरह देखें, हर तरह से शेल अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यधिक सकारात्मक साबित हुई है। इससे पूंजीगत व्यय बढ़ा है, ऊर्जा सुरक्षा में सुधार हुआ है और विनिर्माण की लागत कम हुई है।

लेकिन बहुत से लोग यह नहीं जानते कि पूंजी बाजारों, विशेष रूप से डेट और उच्च प्रतिफल वाले बाजारों की शेल क्रांति में कितनी अहम भूमिका रही है। असल में तेल एवं गैस का बड़े पैमाने पर उत्पाद वर्ष 2010 में तब हुआ, जब अमेरिका में शेल ऑयल में क्रांति आई। शेल ऑयल का उत्पादन इसलिए शुरू हो पाया क्योंकि तेल की कीमतें करीब एक दशक से लगातार बढ़ रही थीं। तेल की कीमतें वर्ष 2008 में बढ़कर 150 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं।

तेल एवं गैस क्षेत्र ने वर्ष 2010 से 2014 के बीच 510 अरब डॉलर से अधिक के ऊंचे प्रतिफल वाले बॉन्ड जारी किए। वर्ष 2014 में केवल एक वर्ष में सबसे अधिक 160 अरब डॉलर के बॉन्ड जारी हुए। उसके बाद बॉन्ड निर्गम वर्ष 2015 से 2019 के बीच 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष के स्तर पर स्थिर हो गए। इस तरह पिछले 10 साल में एक लाख डॉलर जुटाए गए हैं। इन निर्गमों की औसत अवधि के हिसाब से अब भी करीब 640 अरब डॉलर के बॉन्ड परिपक्व नहीं हुए हैं। (स्रोत : डियालॉजिक)।

आज इस क्षेत्र में विवाद इस पूरे उच्च प्रतिफल वाले कर्ज को लौटाने के जोखिम को लेकर है। एक तिहाई से अधिक यानी करीब 222 अरब डॉलर के कर्ज का अगले दो साल में भुगतान करना होगा। अगर उच्च प्रतिफल वाला बाजार मददगार नहीं रहता है तो हमें दिवालेपन और बंदी की लहर देखने को मिली। चालू वर्ष में अब तक ऊर्जा क्षेत्र में उच्च प्रतिफल वाले निर्गम पहले ही काफी घट चुके हैं। अब तक केवल 30 अरब डॉलर के निर्गम आए हैं। असल में उच्च प्रतिफल वाले बाजार उद्योग का लंबी अवधि का भविष्य तय करेंगे। धन न मिलने या सीमित मात्रा में मिलन से ड्रिलिंग और उत्पादन में भविष्य में वृद्धि नहीं होगी। नई ड्रिलिंग न होने से शेल ऑयल का उत्पादन घटेगा क्योंकि पुराने फील्ड में उत्पादन की दर घट रही है। 

डेट बाजारों की मदद के बिना शेल ऑयल का कभी बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं हो पाता। बैंक खुुद जोखिम नहीं लेना चाहते थे।

अब यह सब भारत के लिए क्यों प्रासंगिक है? शेल ऑयल का उत्पादन घटने से तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होगी, जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा। हालांकि लंबी अवधि की सीख यह है कि उच्च प्रतिफल वाले डेट बाजारों की अहमियत और हमारे बुनियादी ढांचे तथा नए उद्योगों को बनाने में उनकी अहम भूमिका को समझने की कोशिश की जानी चाहिए।

आईएलएफएस के धराशायी होने, दीवान हाउसिंग के असफल होने और फ्रैंकलिन कॉरपोरेट बॉन्ड फंडों के बंद होने के बाद आज भारत में ऊंचे प्रतिफल का बाजार बहुत बड़ा नहीं है। कारोबारी मात्रा घट गई है और नए बॉन्ड जारी करना मुश्किल है। यह स्थिति तब है, जब भारत में बहुत से लोग एए से कम रेटिंग वाले बॉन्डों को उच्च प्रतिफल वाला मानते हैं। वास्तविक उच्च प्रतिफल वाले निवेश ग्रेड से कम रेटिंग (बीबीबी) के बॉन्डों का कोई बाजार या कारोबार नहीं है।

अगर हमें बैंकों पर निर्भरता कम करनी है तो हमें उच्च प्रतिफल बाजारों (एए से कम रेटिंग) को उबारने के तरीके ढूंढने होंगे। दुखद पहलू यह है कि इस समय हमारी 60 से 65 फीसदी वित्तीय प्रणाली यानी भारतीय स्टेट बैंक को छोड़कर सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पीएसबी), ज्यादातर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और ज्यादातर छोटे निजी बैंक ऋण देने की स्थिति में नहीं हैं। उनके पास पूंजी, फंड, जोखिम क्षमता या प्रबंधन में से किसी न किसी चीज का अभाव है।

कोविड के बाद हमारे यहां केवल केवल पांच से छह बैंक ही ऐसे होंगे, जो कर्ज देने में सक्षम होंगे। सभी पूंजी जुटा रहे हैं और वह पूंजी सोख रहे हैं, जो बाजार देंगे। अर्थव्यवस्था में वृद्धि को तेज करने के लिए हमें इन छह बैंकों के अलावा और पूंजी के स्रोतों की जरूरत है। ये बैंक बहुत बढिय़ा प्रदर्शन करेंगे, लेकिन वे पूरी अर्थव्यवस्था की वृद्धि को सहारा नहीं दे सकते। इस बात के बहुत से सबूत हैं कि हमारी वृद्धि में सुस्ती का पिछले कुछ वर्षों के दौरान वित्तीय प्रणाली के दबाव से गहरा संबंध है।

बॉन्ड बाजारों को कैसे उबारें, इसे लेकर बहुत सी रिपोर्ट और सुझाव हैं। इनमें पात्र कंपनियों और पात्र परिसंपत्तियों का समूह बढ़ाने से लेकर ज्यादा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश लाने और खुदरा आवक को प्रोत्साहन तक शामिल हैं। ये और अन्य कदम जल्द उठाए जाने चाहिए। इसमें कम दरों का दौर भी मददगार बन सकता है। प्रतिफल की तलाश से संस्थागत निवेशक ज्यादा जोखिम लेने को तैयार हो सकते हैं। उनके पास लक्ष्य या अच्छा प्रतिफल हासिल करने के लिए जोखिम लेने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में मदद के लिए एक अच्छा बॉन्ड बाजार अहम है। आज कोई भी बैंक कंपनियों को बड़ा ऋण नहीं लेना चाहता है। कोई बैंक बुनियादी ढांचा या ग्रीन फील्ड परियोजनाओं को धन मुहैया नहीं करना चाहता है। सभी छह बैंकों ने अपने निवेशकों से वादा किया है कि कॉरपोरेट ऋणों में जोखिम नहीं बढ़ाएंगे। निवेशकों की कॉरपोरेट ऋणों पर गिद्ध के समान नजर है। जोखिम में बढ़ोतरी की धारणा बनते ही शेयर लुढ़क जाते हैं।

कैसे नई परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे को धन मिलेगा? नई परिसंपत्तियां बनाने के लिए कौन ऋण मुहैया कराएगा? आखिर, सरकार पूरा नया बुनियादी ढांचा नहीं बना सकती। निजी पूंजी की भी दरकार है। ऋण बाजारों को ऋण जोखिम विकेंद्रित बनाने और इसे पूरी प्रणाली में फैलाने की जरूरत है ताकि किसी एक संस्थान के ऋण गैर-आनुपातिक न हों। उन्हें जोखिम से बचने की प्रवृत्ति को भी खत्म करना होगा क्योंकि बैंक अपने इतिहास में सबसे बदतर कॉरपोरेट ऋण चक्र से गुजर रहे हैं।

वे स्वाभाविक रूप से जोखिम से बचते हैं। हमें वैकल्पिक निवेश फंड जैसे नए ढांचे बनाने की जरूरत है, जो ग्रीन फील्ड परिसंपत्तियों में मौजूद ऋण और अवधि जोखिम को वहन कर सकें। जोखिम लेने में पारदर्शिता होनी चाहिए और प्रतिफल जोखिम के अनुपात में होना चाहिए। बॉन्ड बाजारों को उबारने के लिए जिन नियामकीय और ढांचागत बदलावों की जरूरत है, उन्हें अंजाम दिया जाना चाहिए। वे हमारी आर्थिक वृद्धि को तेज करने के लिए बहुत अहम हैं।
(लेखक अमांसा कैपिटल से जुड़े हैं)

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