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ऋण अदायगी पर रोक खत्म होने के बाद?

तमाल बंद्योपाध्याय /  August 10, 2020

आईडीबीआई बैंक लिमिटेड और यूको बैंक ने जून तिमाही में मार्च तिमाही का प्रदर्शन दोहराया। आईडीबीआई बैंक ने जून तिमाही में 144.43 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया। मार्च तिमाही में उसने 139 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा अर्जित किया था। इससे पहले लगातार 13 तिमाहियों में बैंक को करीब 42,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। यूको बैंक ने जून तिमाही में 21.45 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया, मार्च तिमाही में बैंक ने 17 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया था। यूको बैंक ने इससे पहले 17 तिमाहियों में 16,000 करोड़ रुपये के नुकसान का सामना किया था।

भारतीय स्टेट बैंक का प्रदर्शन शानदार रहा। जून तिमाही में बैंक का शुद्ध मुनाफा 4,189 करोड़ रुपये रहा जो सालाना आधार पर 81 फीसदी अधिक था। इसमें बैंक की बीमा शाखा की हिस्सेदारी बिक्री से मिला 1,540 करोड़ रुपये का लाभ शामिल है। आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड का शुद्ध लाभ भी 36 फीसदी बढ़कर 2,599 करोड़ रुपये रहा। इस बैंक को भी जीवन बीमा तथा गैर बीमा कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर आय हासिल हुई है।

एचडीएफसी बैंक लिमिटेड का शुद्ध मुनाफा 19.6 फीसदी रहा लेकिन कई अन्य निजी बैंकों मसलन ऐक्सिस बैंक लिमिटेड, इंडसइंड बैंक लिमिटेड, बंधन बैंक लिमिटेड, येस बैंक लिमिटेड और कोटक महिंद्रा बैंक लिमिटेड का शुद्ध मुनाफा जून तिमाही में कम हुआ। इंडसइंड बैंक का लाभ 67.8 फीसदी जबकि कोटक महिंद्रा बैंक का लाभ 8.5 फीसदी कम हुआ। भारतीय बैंकों के लिए इनके क्या मायने हैं?

ऋण अदायगी स्थगन के बाद?

सन 1992 के आखिर में जब विनाशकारी एंड्रयू तूफान बहामास, फ्लोरिडा और लुइसियाना से टकराया तब अमेरिका के बीमा उद्योग की कमजोरी उजागर हो गई। उस समय वॉरेन बफेट ने कहा था, 'लहरों के गुजर जाने के बाद ही पता चलता है कि कौन बिना कपड़ों के तैर रहा था।' उनका इशारा बीमा उद्योग की ओर था। बफेट की उक्ति को बदलकर मैं यह कहना चाहता हूं कि ऋण अदायगी का स्थगन समाप्त होने के बाद ही पता चलेगा कि कौन सा बैंक स्वस्थ है और कौन सा नहीं।

कुछ बैंकों के छोड़कर शेष बैंकों का फंसा हुआ कर्ज जून तिमाही में कम हुआ। बैंकों ने परिसंपत्ति गुणवत्ता में गिरावट का अनुमान लगाकर काफी भारी प्रॉविजनिंग की। क्या इससे उनके बही खातोंं का बचाव होगा? यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आर्थिक गतिविधियां कैसे जोर पकड़ती हैं और ऋण अदायगी स्थगन का लाभ लेने वाले कर्जदार किस तरह उसे चुकाते हैं।

रिजर्व बैंक की ओर से कोविड महामारी को देखते हुए ऋण पर पहले मार्च से जून और फिर अगस्त तक छह महीने के स्थगन की घोषणा की गई। चूंकि इस बीच देशभर में लॉकडाउन लगा रहा इसलिए बैंकों के खुदरा ऋण पर दबाव बन सकता है। कार और मकान खरीदने वाले कई लोगों की नौकरी जा चुकी है या उनका वेतन कम हुआ है।

फंसे कर्ज की बाढ़?

इस मामले में नजरिया अलग-अलग है। अधिकांश बैंकर नहीं चाहते कि ऋण स्थगन बढ़ाया जाए। बल्कि वे तो चाहते हैं कि विमानन, पर्यटन और यात्रा तथा निर्माण जैसे सर्वाधिक प्रभावित उद्योगों को ऋण भी न दिया जाए। वहीं कुछ बैंकरों को लगता है कि हालात सामान्य होने तक बड़े शहरों में ऋण अदायगी का स्थगन जारी रहने दिया जाए।

छोटे बैंकों में ग्रामीण और शहरी कर्जदारों के बीच स्पष्ट भेद है। ग्रामीण इलाकों के कुछ ग्राहकों ने ऋण स्थगन लिया है और वहां पुनभुर्गतान बढ़ेगा लेकिन शहरी इलाकों में ऐसा नहीं है। शहरों के छोटे कारोबारी संघर्ष कर रहे हैं। अनेक ने दुकानें बंद कर गांवों का रुख किया है।

एक नजरिया यह भी है कि संपूर्ण विस्तार के बजाय केवल प्रभावित उद्योगों को ऋण स्थगन दिया जाए। दूसरे शब्दों में बैंकों को तनावग्रस्त कर्ज के पुनर्गठन की छूट होनी चाहिए।

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कोविड महामारी बैंकों पर कितना असर डालेगी। बैंकरों का दावा है कि ऋण का पुनर्भुगतान बढ़ रहा है परंतु अगर अगस्त में ऋण अदायगी का स्थगन समाप्त हुआ तो सही तस्वीर वर्ष की दूसरी छमाही मेंं सामने आएगी।

महामारी के पहले विशेषज्ञों को लग रहा था कि बैंकिंग उद्योग का सबसे बुरा दौर बीत चुका है। सितंबर 2015 में फंसे हुए कर्ज को पहचानने की प्रक्रिया जोरशोर से शुरू हुई और आरबीआई ने परिसंपत्ति गुणवत्ता की समीक्षा करना आरंभ किया तो लगा कि अब सुधार करीब है। ऋणशोधन कानून को बहुत सफलता नहीं मिली है लेकिन बैंकर गड़बड़ी करने वाले कर्जदारों को चर्चा के लिए तैयार करने और फंसे हुए कर्ज की वसूली करने कामयाब होने लगे।

फंसे कर्ज का अंकेक्षण

सकल फंसा हुआ कर्ज जो मार्च 2018 में 12.5 फीसदी था वह एक वर्ष बाद गिरकर 9.7 फीसदी रह गया और सितंबर 2019 में यह 9.3 फीसदी तथा मार्च 2020 में यह मात्र 8.5 फीसदी रहा। कोरोनावायरस ने हालात को बदल दिया। रिजर्व बैंक की ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2021 तक यह दोबारा बढ़कर 14.7 फीसदी हो सकता है। मोटे अनुमान से भी इसके 12.5 फीसदी होने की ही आशा है। यदि मार्च 2021 तक सकल फंसा हुआ कर्ज 14.7 फीसदी हुआ तो यह 22 साल का उच्चतम स्तर होगा।  इससे पहले सन 1999 में 15.9 फीसदी का स्तर देखने को मिला था। 2000 में वह घटकर 14 फीसदी और 2003 में 9.3 फीसदी रह गया।

सरकारी बैंकों की स्थिति निजी बैंकों से खराब है। वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक बुरी स्थितियों में यह मार्च तक 15.2 फीसदी तक हो सकता है। दिक्कत यह है कि कई भारतीय बैंकों, खासकर सरकारी बैंकों का अच्छी तरह पूंजीकरण नहीं किया गया। फंसे कर्ज की पहचान का असर उनकी पूंजी और ऋण देने की क्षमता पर भी पड़ेगा।  पूंजी और जोखिम अनुपात की बात करें तो यह मार्च 2020 के 14.6 फीसदी से मार्च 2021 तक यह 13.3 फीसदी हो जाएगा। अत्यंत तनावपूर्ण स्थितियों में यह 11.8 फीसदी भी हो सकता है। वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट कहती है कि तनाव परीक्षण के मुताबिक गहरे तनाव की स्थित में पांच बैंक मार्च 2021 तक न्यूनतम पूंजी स्तर का पालन करने में चूक सकते हैं।

मान लें कि अगर बैंक फंसे हुए कर्ज में इजाफे को नहीं रोक सकते तो उनका ध्यान पूंजी बरकरार रखने और अनिश्चय से निपटने पर होगा। निजी बैंक पूंजी बढ़ा चुके हैं या इस प्रक्रिया में हैं। सरकार को अभी भी सरकारी बैंकों में पूंजी डालने की योजना की घोषणा करनी है। बजट में इस बारे में कोई प्रावधान नहीं किया गया। जिन बैंकों को पूंजी नहीं मिलेगी, उनकी हालत खराब होना तय है।

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