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सबको साथ लेकर चलने का हुनर हो सकता है कारगर

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  August 07, 2020

देश की सर्वाधिक जटिल प्रशासनिक व्यवस्था (यह न तो राज्य है और न ही केंद्रशासित प्रदेश) के शीर्षस्थ पद पर दो नियुक्तियों के बाद केंद्र सरकार ने आखिरकार मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल के पद पर नियुक्त करके संभवत: सही कदम उठाया है।

भले ही सिन्हा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के मार्ग से आए लेकिन उनके आदर्श सरजू पांडेय थे। पांडेय एक प्रसिद्ध वामपंथी नेता और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े कद के नेताओं में से एक थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में शिरकत की थी और जब ब्रिटिश शासन ने उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया तब उन्होंने सजा की मांग की। उन्होंने सन 1967 और 1971 में दो बार गाजीपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। जब तक वह राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे, अच्छी खासी मुस्लिम आबादी वाले गाजीपुर में कोई दंगा नहीं हुआ।

दंगों की शुरुआत सन 1970 और 1980 के दशक में हुई जब केंद्र सरकार ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के बुनियादी विकास के लिए फंड देना शुरू किया और उत्तर प्रदेश की सरकार ने विकास परियोजनाओं के अनुबंध स्थानीय बाहुबलियों को देना शुरू किया। मुख्तार अंसारी और अफजल अंसारी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के माध्यम से राजनीति में आए। उन्होंने लाइसेंस और कोटा के माध्यम से तेजी से मजबूती हासिल की। परंतु जब उनके गिरोह का एक सदस्य बृजेश सिंह अलग हो गया तो एक ऐसी जंग छिड़ गई जिसका धर्म से कोई लेनादेना न था लेकिन उसने जाने अनजाने धार्मिक रंग ले लिया। सन 2005 में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या ने भारत के उस हिस्से को सबके सामने ला दिया जहां कोई विकास नहीं था, बेरोजगारी दर ऊंची थी और जिसकी अर्थव्यवस्था की बुनियाद मादक द्रव्यों और फिरौती वसूली पर टिकी थी।

मनोज सिन्हा उसी इलाके में बड़े हुए और उन्होंने वहीं राजनीति सीखी। वह भूमिहार जाति से आते हैं जो उत्तर प्रदेश की सत्ता की राजनीति में हाशिये पर थी। परंतु गाजीपुर ने अपने सबसे काबिल बेटों को यह नहीं सिखाया कि वे केवल इसलिए बैठे हाथ मलते रहें क्योंकि वे उपयुक्त जाति से नहीं आते। जिस समय सिन्हा ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के बीटेक पाठ्यक्रम में दाखिला लिया, उस समय विभाग राजनीतिक विचारधाराओं का संगम बना हुआ था। आचार्य नरेंद्र देव, प्रोफेसर मुकुट बिहारी लाल और अन्य नेताओं के कारण वहां समाजवादी परंपरा की विरासत मौजूद थी। कांग्रेस की उपस्थिति भी थी। वहीं नागभूषण पटनायक के इंडियन पीपुल्स फ्रंट के रूप में धुर वाम भी वहां उपस्थित था। इन सबके अलावा वहां गहन जातिगत राजनीति भी थी। सिन्हा पढ़ाई में अव्वल थे। उन्हें आसानी से कोई आकर्षक नौकरी मिल सकती थी लेकिन उन्होंने राजनीति में आने का निश्चय किया और छात्र संघ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा। बनारस में हर व्यक्ति उन्हें एक आदर्शवादी तेजतर्रार नेता के रूप में जानने लगा। अकादमिक मामलों में भी वह पीछे नहीं थे और पढ़ाई में प्राय: अव्वल आते रहे। उनके सभी के साथ अच्छे ताल्लुकात थे। जब समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्रा बनारस जाते तो वह युवा सिन्हा के बारे में पूछा करते कि वह 'मोटा लड़का' कहां है। दोनों को खाना पसंद था और सिन्हा उनके लिए बनारस के बेहतरीन गुलाब जामुन तलाश कर लाते।

बहरहाल, सिन्हा राज्य की राजनीति से दूर बने रहे। इसके बजाय उन्होंने सन 1996, 1999 और 2014 में तीन बार गाजीपुर संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व किया। वह रेल राज्य मंत्री बने और बाद में उन्हें संचार मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार भी मिला। जब सन 2019 के आम चुनाव करीब आए तो भाजपा ने उन्हें चेताया कि हालात उनके अनुकूल नहीं नजर आ रहे और उन्हें पड़ोस के बलिया लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लडऩा चाहिए। सिन्हा ने इससे इनकार कर दिया क्योंकि उनको गाजीपुर में अपने किए विकास कार्यों पर पूरा यकीन था। परंतु ऐसा नहीं हुआ और मोदी लहर के चरम पर होने के बावजूद वह बसपा के अफजल अंसारी से चुनाव हार गए। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के बाद चर्चा थी कि वह मुख्यमंत्री बन सकते हैं। यह अटकलबाजी उनकी शुरू की हुई नहीं थी लेकिन उन्हें इसका नुकसान उठाना पड़ा। यह बात अपने मित्रों के बीच स्वीकार भी करते हैं। वह वापस बनारस लौट गए और महज चंद रोज पहले उनके पास गृहमंत्री अमित शाह का फोन आया।

वह उस राजनीतिक की उपज हैं जहां बंदूकों का चलन आम है। इसलिए वह आसानी से नहीं डरते। उनकी सबसे बड़ी पूंजी यह है कि वह बिना राजनीतिक संबद्धता के हर किसी के साथ सहज जुड़ाव रखते हैं लेकिन वहीं अधिकारियों ने उन्हें आवाज ऊंची करते और अपनी बात मनवाते हुए भी देखा है। ऐसे में यदि अधिकारियों को लगा होगा कि वह कश्मीर का शासन चला सकते हैं तो उन्हें अपनी बात पर पुनर्विचार करना चाहिए। सिन्हा एक निहायत ईमानदार राजनेता माने जाते हैं।

सिन्हा के करियर का उतारचढ़ाव काफी हद तक अर्जुन सिंह के करियर जैसा नजर आता है हालांकि व्यक्तित्व के मामले में दोनों नेता खासे जुदा थे। मध्य प्रदेश में कांग्रेस को जीत दिलाने के तुरंत बाद राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को राज्यपाल बनाकर पंजाब भेज दिया था ताकि राज्य में चुनावों की तैयारी की जा सके। कई लोगों ने कहा था कि यह सिंह की राजनीति का अंत साबित होगा लेकिन उन्होंने इसे अवसर में बदल दिया। कश्मीर में भी वैसी ही चुनौतियां हैं। वहां अगर कोई व्यक्ति सबको साथ लेकर चल सकता है और विश्वास बहाली कर सकता है तो वह मनोज सिन्हा ही हैं।

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