बिजनेस स्टैंडर्ड - नई शिक्षा नीति के विभिन्न पहलुओं पर एक नजर
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, September 18, 2020 07:05 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

नई शिक्षा नीति के विभिन्न पहलुओं पर एक नजर

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  August 06, 2020

भारतीय नीति निर्माण में महत्त्वाकांक्षा के अतिरेक का दोष हमेशा ही रहा है। नीति भारतीय संदर्भ में क्रियान्वयन की असली बाधाओं के बरक्स बहुत कम ही लिखित रूप में दर्ज होती है। ये बाधाएं संसाधनों की भारी कमी, निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण की बुरी क्षमता, राजनीतिक मतभेद और फंडिंग में देरी के रूप में होती हैं। कभी-कभी वास्तविकता से इनकार या प्रगति को रोकने वाली तात्कालिक एवं गंभीर समस्याओं के बारे में बुनियादी रूप से गलत आकलन भी होता है।

इस प्रवृत्ति के आलोक में ही हमें नई शिक्षा नीति को देखना चाहिए। यह 1980 के दशक के बाद शिक्षा को दिशा देने की पहली गंभीर कोशिश है। इस नीति को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वर्षों की मेहनत से बनाया है। लेकिन इसकी महत्ता को बढ़ा-चढ़ाकर भी नहीं दिखाना चाहिए। समवर्ती सूची में शामिल विषयों के लिए पेश किसी भी नीतिगत दस्तावेज की तरह नई शिक्षा नीति भी वास्तविक एवं ठोस ताकत का एक मेल होगी। राज्य सरकारें उन बिंदुओं को नजरअंदाज कर सकती हैं जो उनकी पसंद से मेल नहीं खाते हैं।

हालांकि नई नीति में खुश करने के लिए बहुत कुछ है। बहु-विषयक, लचीलापन और आसान परीक्षाएं जैसी कई बातें बिना शर्त समर्थन की हकदार हैं। इसमें नियामकीय स्तर पर किए गए आमूलचूल बदलाव की बात अच्छी लगती है लेकिन नियामकीय स्वतंत्रता एवं उच्च शिक्षा पर पिछला प्रदर्शन देखें तो हमें यह देखने के लिए इंतजार करना होगा कि कहीं यह विश्वविद्यालयों पर अधिक राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने का तरीका तो नहीं है। राष्ट्रीय शोध कोष निश्चित रूप से अपनी विचारधारा थोपने का जरिया बन जाएगा।

पहले विवादास्पद माने जाते रहे मसलों पर अपनाए गए मंत्रालय के रुख की प्रशंसा होनी चाहिए। दिल्ली विश्वविद्यालय में चार-वर्षीय डिग्री पाठ्यक्रम लागू करने की योजना पहले सरकार को वापस लेनी पड़ी थी लेकिन नई नीति में स्नातक स्तर पर चार वर्ष का पाठ्यक्रम अब मानक हो जाएगा। लेकिन दो बिंदुओं पर नजदीकी परीक्षण की जरूरत है। भाषा के मसले पर सुझाव गलत दिशा में जाता है। शिक्षा नीति के अंतिम प्रारूप में कहा गया है कि छात्रों पर किसी भी भाषा को थोपने की कोई कोशिश नहीं होगी। लेकिन इसी के साथ बच्चों को पांचवीं कक्षा तक और उसके बाद आठवीं कक्षा तक भी उनकी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाने की अनुशंसा भी की गई है। इससे यूनेस्को की उस सोच को स्वीकार किया गया है कि माता-पिता की भाषा में शुरुआती शिक्षा देना आगे की उपलब्धियों के लिए अहम है। इससे कई सवाल भी खड़े होते हैं। पहला, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जरूरी नहीं है कि क्षेत्रीय भाषा अनिवार्य तौर पर मातृभाषा ही हो। खासकर कोलकाता, मुंबई एवं बेंगलूरु जैसे गैर-हिंदीभाषी महानगरों में यह सच होगा। शिक्षा नीति के लिहाज से देखें तो मुंबई में हिंदी, तमिल और गुजराती माध्यम वाले स्कूलों की अच्छी संख्या हो सकती है। लेकिन क्या राज्य सरकार इसकी अनुमति या प्रोत्साहन देगी? हमें क्षेत्रीय एवं मातृभाषा के बीच अंतर को लेकर पूरी स्पष्टता की जरूरत है क्योंकि आने वाले वर्षों में एक से दूसरे राज्य जाने का सिलसिला बढ़ेगा। गैर-हिंदी भाषियों का बच्चों पर अधिक बोझ बढऩे को लेकर फिक्रमंद होना भी वाजिब है क्योंकि मुंबई में रहने वाले एक तमिल-भाषी बच्चे से हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और तमिल जानने की अपेक्षा की जा सकती है। इसके अलावा संस्कृत को भी बढ़ावा देने की एक कोशिश है।

फिर अंग्रेजी का मसला भी है। सच कहें तो नई शिक्षा नीति में अंग्रेजी के बारे में अधिक सख्त रुख अपनाने की जरूरत थी। अंग्रेजी के बारे में राष्ट्रीय एकता, मां-बाप के दबाव, भू-सामरिक मान्यताओं एवं आर्थिक अनिवार्यता जैसी बातों पर सभी सहमत हैं। भारतीय बच्चों को कम उम्र से ही अंग्रेजी पढ़ाई जानी चाहिए। अंग्रेजी के प्रति सरकारी प्रतिबद्धता नहीं होने पर सरकारी एवं निजी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों के बीच फर्क बढ़ता जाएगा। वर्गीय दीवारों को गिराने और अवसरों की अधिक समानता लाने के लिए अंग्रेजी के प्रसार का कोई विकल्प नहीं है। इस मामले में नीति निर्माण में वास्तविकता एवं साक्ष्यों को नहीं स्वीकार किया गया है। मां-बाप अधिक अंग्रेजी शिक्षा चाहते हैं और नियोक्ता भी अधिक अंग्रेजी के पक्षधर हैं। केवल सरकार ही ऐसा नहीं चाहती है।

इस नीति की दूसरी बड़ी समस्या शुरुआती बचपन की शिक्षा से जुड़ी है। सिद्धांत रूप में तो यह तारीफ के काबिल है। इसमें सार्वभौम बुनियादी साक्षरता को शिक्षा व्यवस्था में सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही गई है और यह एकदम सही भी है। लेकिन अभी तक ऐसा हुआ नहीं है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के कार्तिक मुरलीधरन का मानना है कि बच्चे के शुरुआती वर्षों में साक्षरता एवं जोड़-घटाना सीखने के मामले में अत्यधिक विविधता है। प्राथमिक स्कूल पूरा कर चुके भारतीय बच्चों का गणित का ज्ञान अपनी उम्र से 2.5 साल कम होता है। इसका मतलब है कि नाम के लिए शिक्षित भारतीयों की एक बड़ी संख्या व्यावहारिक स्तर पर अशिक्षित एवं साधारण जोड़-घटाने में भी नाकाम होती है।

इस स्थिति में सुधार के लिए स्कूल-पूर्व शिक्षा पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। इस लिहाज से स्कूली शिक्षा को 10+2 के बजाय 5+3+3+4 परिपाटी में ढालना काफी अहम है।

दरअसल हमारी समूची शिक्षा नीति इस सोच पर बनी है कि प्राथमिक स्कूल के बच्चों को साक्षर एवं गणित ज्ञान दिया जाए। लेकिन हमारा ध्यान सार्वभौम साक्षरता एवं गणित ज्ञान पर होना चाहिए। इसमें केंद्र भी निचली पायदान के बच्चों के लिए विशेष शिक्षकों के कैडर को वित्तपोषण कर मदद कर सकता है।

नई शिक्षा नीति ऊंची आकांक्षाओं और तमाम प्रशंसनीय सिद्धांतों से भरपूर है। लेकिन राष्ट्रीय संख्यात्मक ज्ञान मिशन एक बढिय़ा नीति-निर्माण होता जिसमें अगले पांच वर्षों में सार्वभौम साक्षरता एवं गणित ज्ञान सुनिश्चित करने पर जोर रहता। हमारे पास अधिक वक्तनहीं है।

Keyword: Foreign Institutions, Education Policy, Higher Education, NEP, विदेशी संस्थान, शिक्षा नीति, स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, एनईपी,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सरकार को वाहनों पर जीएसटी दरों में करनी चाहिए कटौती?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.