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महिंदा राजपक्षे की जीत से बढ़ेगा चीन के प्रति श्रीलंका का झुकाव

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  August 04, 2020

कोलंबो में इस समय इस बात पर बाजियां नहीं लगाई जा रही हैं कि बुधवार को होने वाले संसदीय चुनावों में कौन जीत हासिल करने वाला है? बाजियां बस इस बात पर लग रही हैं कि पूर्व राष्ट्रपति एवं मौजूदा अंतरिम प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे की पार्टी श्रीलंका पोडुजना पेरामुना (एसएलपीपी) कितनी सीटों पर जीत हासिल करेगी। चर्चाएं इस बात पर हो रही हैं कि महिंदा की पार्टी 225 सदस्यीय संसद में सामान्य बहुमत से जीत हासिल करेगी या उसे भारी जीत मिलने वाली है।

निर्वासन में जीवन व्यतीत कर रहे वरिष्ठ राजनीतिक प्रेक्षक डीबीएस जयराज कहते हैं, 'राजपक्षे सरकार को इस संसदीय चुनाव में दो-तिहाई बहुमत मिलने जा रहा है। श्रीलंका में नया संविधान लागू करना या एकतरफा ढंग से संविधान संशोधन करना इस प्रचंड बहुमत का स्वीकृत उद्देश्य है।'संसद में दो-तिहाई बहुमत मिले बगैर संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता है। महिंदा राजपक्षे अपने सिंहली बौद्ध मतदाताओं को लुभाने के लिए सार्वजनिक सभाओं में इस बात का जिक्र अक्सर करते रहे हैं। इसकी वजह यह है कि महिंदा को लगातार दो बार राष्ट्रपति रहने के बाद तीसरा चुनाव इसलिए हारना पड़ा था कि सिंहली मतदाताओं का तगड़ा समर्थन मिलने के बावजूद तमिल एवं मुस्लिम प्रभाव वाले उत्तरी प्रांतों ने उनके खिलाफ मतदान किया था। उस घटना की पुनरावृत्ति रोकने के लिए एसएलपीपी एक ऐसी व्यवस्था बनाना चाहेगी जिसमें अल्पमत भविष्य में बहुमत की राय को पलट न सके। श्रीलंका की जनसंख्या में सिंहल बौद्ध मतावलंबियों की संख्या करीब 70 फीसदी है।

महिंदा राजपक्षे के दो प्रतिद्वंद्वी हैं- पिछली संसद में बहुमत रखने वाली यूनाइटेड नैशनल पार्टी (यूएनपी) और समागी जन बालवेगाया (एसजेबी)। एसजेबी का नेतृत्व सजित प्रेमदासा के पास है जो यूएनपी के ही पूर्व नेता हैं और पिछली गठबंधन सरकार में वरिष्ठ मंत्री भी थे। सजित ने यूएनपी से ही अलग होकर नई पार्टी बनाई है। लेकिन इस चुनाव के प्रचार के दौरान एसजेबी और यूएनपी दोनों ही दलों का रुख काफी हद तक एक जैसा रहा है। दोनों दल शासन में सरकार की भूमिका कम करने, अर्थव्यवस्था को अधिक आजादी देने और भारत एवं चीन दोनों ही ताकतों से समान दूरी रखने का परंपरागत रवैया कायम रखने की बात करते रहे हैं। एकसमान बातें करने वाले दो दलों के होने से उनके समर्थक मतदाताओं में बिखराव होने की संभावना है जबकि राजपक्षे के समर्थकों के पूरे जोरशोर से उनके पक्ष में लामबंद होने में मदद करेगा। वैसे महिंदा राजपक्षे के उभार से भारत को फिक्रमंद होना चाहिए। अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में महिंदा ने मौजूदा राष्ट्रपति एवं अपने भाई गोटाभाया राजपक्षे की उस घोषणा का समर्थन किया कि सरकार भारत के साथ हुए करोड़ों डॉलर के बंदरगाह समझौते की समीक्षा करेगी। इस समझौते के तहत ईस्ट कंटेनर टर्मिनल पर एक बंदरगाह का विकास भारत एवं जापान संयुक्त रूप से करने वाले थे। राजपक्षे बंधु चीन के भू-राजनीतिक प्रभाव पर अंकुश लगाने के लिए बनी अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं जापान की 'चौकड़ी' की तरफ से रखी गई फंडिंग की पेशकश से भी खुद को दूर कर रहे हैं। श्रीलंका सरकार ने हाल ही में जापान की मदद से बनने वाले कोलंबो लाइट रेलवे प्रोजेक्ट और अमेरिका के मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन से 48 करोड़ डॉलर के अनुदान को भी ठुकरा दिया है। यह सब चीन के प्रति उसके बढ़ते झुकाव का संकेत है।

श्रीलंका कर्ज के गहराते जाल में उलझता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) के मुताबिक कोविड महामारी के असर से श्रीलंका की शुद्ध सरकारी उधारी 2020 में बढ़कर जीडीपी का 9.4 फीसदी हो जाएगी। यह भी गौर करने वाली बात है कि 88 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था वाले देश पर 55 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है।

श्रीलंकाई केंद्रीय बैंक के पूर्व गवर्नर इंद्रजित कुमारास्वामी ने पिछले साल कहा था कि इसके कुल विदेशी कर्ज में चीन का हिस्सा 9 फीसदी था। लेकिन श्रीलंका ने कोविड महामारी से निपटने के लिए चीन से 50 करोड़ डॉलर का तात्कालिक ऋण लिया है। इसके अलावा सड़क परियोजनाओं के लिए चाइना डेवलपमेंट बैंक से 8 करोड़ डॉलर का एक और कर्ज लिया है।

वर्ष 2015 में हुए पिछले राष्ट्रपति चुनाव में भी महिंदा के पीछे चीन का हाथ माना जा रहा था लेकिन वह चुनाव हार गए। उस चुनाव में ऐसे आरोप भी लगे थे कि दक्षिण एशिया की ताकत भारत और चीन विरोधी खेमों के चुनाव अभियान में आर्थिक मदद भी कर रहे हैं। राजपक्षे गुट ने भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ पर विरोधी सियासी दलों को पैसे देने के आरोप लगाते हुए कहा था कि भारत महिंदा राजपक्षे को लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति बनने से रोकना चाहता है। वहीं इस चुनाव में चीन श्रीलंका की राजनीति में बहुत गहरे तक पैठ बना चुका है। वह मतदान सर्वेक्षकों की सेवाएं लेने से लेकर बड़ी ढांचागत परियोजनाओं के लिए अरबों डॉलर के कर्ज भी दे रहा है। मतदान के पहले चीनी सरकार के प्रतिनिधियों एवं स्थानीय नेताओं के बीच पर्दे के पीछे बैठकें भी हुई हैं। जापान कई दशकों तक श्रीलंका का सबसे बड़ा कर्जदाता एवं विकास साझेदार रहा है लेकिन अब उसे भी राजपक्षे बंधुओं के चीनपरस्त रुख का सामना करना होगा।

जाहिर है कि अल्पसंख्यक तमिल एवं मुस्लिम समुदाय महिंदा की जीत के बाद श्रीलंका की राजनीति एवं समाज में आने वाले बदलावों को लेकर फिक्रमंद हैं। वहीं भारत में राजीव गांधी की हत्या के बाद श्रीलंकाई तमिलों के प्रति भावना उतनी मजबूत नहीं रही है लेकिन समय-समय पर इसके सुलगने के आसार हैं।

जब गोटाभाया राजपक्षे राष्ट्रपति बने थे तो उन्हें बधाई देने वाले शुरुआती नेताओं में विदेश मंत्री एस जयशंकर भी शामिल थे। यह पिछली चूक सुधारने का प्रयास था। लेकिन इस बार भारतीय विदेश विभाग श्रीलंका को नई सतर्कता से देखेगा। यह इस पर निर्भर करता है कि 5 अगस्त को चुनाव में एसएलपीपी को कैसा बहुमत मिलता है।

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