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सुशांत के बहाने मिथकों के विध्वंस की कवायद

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  07 31, 2020

महाराष्ट्र का मानचित्र उठाइए और उसमें बॉलीवुड को तलाशने की कोशिश करें। लेकिन आपको बॉलीवुड नाम की कोई जगह नहीं दिखेगी। दरअसल बॉलीवुड कोई जगह न होकर मुंबई स्थित हिंदी फिल्म उद्योग के लिए इस्तेमाल होने वाला एक अपमानजनक शब्द है जो हॉलीवुड का कमतर भाई सरीखा है। भारत के दूसरे हिस्सों में मौजूद फिल्म उद्योगों को भी ऐसे ही संबोधित किया जाता है- मसलन, तेलुगू फिल्म उद्योग के लिए टॉलीवुड और तमिल फिल्म उद्योग के लिए कॉलीवुड। अमिताभ बच्चन और शबाना आजमी जैसे फिल्मी दिग्गज ऐसी शब्दावलियों के इस्तेमाल के खिलाफ रहे हैं। इस मामले में वे सही भी हैं। करीब 19,100 करोड़ रुपये के आकार वाला 'भारतीय फिल्म उद्योग' तीन सहज कारणों से इन उपनामों से कहीं बड़ा है।

पहला, यह परिघटना के स्तर पर लचीला है। हॉलीवुड के जबरदस्त असर वाली दुनिया में भी भारत के सृजनात्मक उद्योगों ने 100 साल से अपना वजूद बनाए रखा है और यह काम उसने किसी सब्सिडी, आरक्षण या संरक्षण के बगैर किया है। फिल्म उद्योग का 85 फीसदी से भी अधिक राजस्व दर्शकों की जेब से आता है।

मोटे तौर पर टेलीविजन पर देखे जाने वाले एक-चौथाई कार्यक्रम, सभी तरह के संगीत में से 70 फीसदी और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी देखे जाने वाले कार्यक्रमों का बड़ा हिस्सा फिल्मों का होता है। भारत उन गिने-चुने देशों में से एक है जहां मौलिक स्थानीय कहानियों पर फिल्में बनती हैं। इस दशक में बनी कुछ अहम फिल्मों में शामिल गली बॉय, गैंग्स ऑफ वासेपुर, विकी डोनर, पीकू, मसान और अंधाधुन हिंदी भाषा की हैं। तमिल, मराठी और बांग्ला भाषाओं में भी कई बेहतरीन फिल्में बनी हैं।

दूसरा, सूचना प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन के अलावा भारत का फिल्म उद्योग भी एक सॉफ्ट पावर के तौर पर उसकी पहचान मजबूत करता है। जब दंगल और सीक्रेट सुपरस्टार ने चीन में कामयाबी हासिल की थी तो घबराए चीन ने रचनात्मक सॉफ्ट पावर के मामले में अपनी कमजोरी को लेकर बैठक बुलाई थी। जब ए आर रहमान, ऐश्वर्या राय बच्चन, प्रियंका चोपड़ा और शाहरुख खान कोई पुरस्कार जीतते हैं, ऑस्कर समारोह के मंच पर कार्यक्रम पेश करते हैं, दावोस सम्मेलन में भाषण देते हैं या टेड टॉक्स करते हैं तो भारत का गौरव ही बढ़ता है।

तीसरा, वैश्विक मीडिया मानचित्र के पुनर्निर्धारण के साथ ही गूगल, फेसबुक, एमेजॉन, डिज्नी और ऐपल जैसी कुछ बड़ी फर्में अपना वैश्विक फलक बढ़ाने और दर्शकों की तलाश में लगी हुई हैं। इस नए परिवेश में भारत का प्रतिनिधित्व इसकी अग्रणी मीडिया या प्रौद्योगिकी फर्में नहीं बल्कि इसका फिल्म उद्योग कर रहा है। दुनिया के सबसे बड़े स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म यूट्यूब पर सबसे ज्यादा देखा जाने वाला चैनल भारत की संगीत कंपनी टी-सीरीज का है। वहीं पेड स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स के लिए भी भारत सामग्री के मामले में बड़ा बाजार बना है। नेटफ्लिक्स पर दर्जन भर से अधिक भारतीय शो विकास के कई चरणों में हैं। 19 मौलिक भारतीय फिल्में एवं 14 मौलिक शो करीब 200 देशों में फैले उसके 19.3 करोड़ ग्राहकों के लिए उपलब्ध हैं। एमेजॉन प्राइम वीडियो के मामले में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही है। एमेजॉन प्राइम पर रिलीज सेक्रेड गेम्स और द फेमिली मैन जैसे शो विशुद्ध भारतीय हैं और उन्हें दुनिया भर में पसंद किया गया है।

भारत का सिनेमा विविधता का प्रकाश-स्तंभ रहा है। जाति, धर्म, विचारधारा, रंग और पृष्ठभूमि जैसे वे तमाम पहलू जो नौकरी या घर या फिर दोस्तों की तलाश में भी बाधा खड़ी करते हैं, उनका फिल्म उद्योग में कोई मायने नहीं होता है। आप मौके की तलाश में संघर्ष करोगे लेकिन हुनर होने पर आप शिखर तक जा सकते हो। यह बात पिछले 100 साल से हजारों तकनीशियनों, लेखकों एवं अभिनेताओं के मामले में सही साबित होती रही है। एक पूर्व बस कंडक्टर (रजनीकांत), कॉपीराइटर (रणवीर सिंह), वॉचमैन (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) और चिप्स बेचने वाले (बोमन ईरानी) की आज फिल्म उद्योग में बहुत ज्यादा इज्जत है।

कई पेशों में दूसरी पीढ़ी भी अपने माता-पिता की राह पर चलते हुए कामयाबी हासिल कर लेती है। इनमें डॉक्टर, अध्यापक, वकील, बैंकर, कॉर्पोरेट जगत और राजनीति जैसे पेशे शामिल हैं। लेकिन सिनेमा जगत में दूसरी पीढ़ी का सफल होना दुर्लभ ही है। क्या आपको कुमार गौरव (राजेंद्र कुमार के बेटे) या उदय चोपड़ा (यश चोपड़ा के बेटे) याद हैं? राज कपूर तो भारतीय सिनेमा का प्रथम परिवार कहे जाने वाले कपूर खानदान से थे, लेकिन उनके तीन बेटों में से केवल ऋषि कपूर ही कामयाबी पा सके। आज किसी को भी रणधीर कपूर या राजीव कपूर याद नहीं हैं।

इसी वजह से अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की दुखद खुदकुशी के बाद बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद और अलग-अलग गुटों को लेकर सोशल मीडिया पर जारी तकरार का कोई मतलब नहीं है। इस दौरान जैसी भाषा इस्तेमाल की जा रही है और जो कुछ कहा जा रहा है, उनसे यही लगता है कि मनचाहा काम नहीं पा सके और दूसरों का ध्यान खींचने की कोशिश करने वाले लोग सुशांत के मृत शरीर का इस्तेमाल डिजिटल निशाना लगाने के लिए कर रहे हैं। भारतीय सिनेमा की विविधता, इसकी निष्ठुरता, प्रतिभा को सम्मान देने वाली प्रवृत्ति 'बाहरी' या भीतरी को लेकर किसी भी तरह का भेद नहीं करती है। आपको केवल सफलता ही बचा सकती है और वह दर्शकों के साथ से ही आती है। भारतीय सिनेमा को कोई भी सब्सिडी, आरक्षण या संरक्षण नहीं मिलता है। ऐसे में अगर दर्शक किसी फिल्म को पसंद नहीं करते हैं तो फिर उसका सफर थम जाता है। आप किसी अभिनेता या लेखक को 'मौका' दिए जाने के पक्ष में होने से दर्शकों को कोई फिल्म पसंद करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं। शायद फिल्म उद्योग में सक्रिय संगठनों के लिए अब दखल देने का वक्त आ गया है। हमें सिनेमा को फिर से चर्चा के केंद्र में लाना होगा, न कि फिल्म निर्माण में शामिल लोगों के आपसी झगड़ों पर बात करें।

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