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कोरोना के जबड़े से निकल आई ग्वालियर की टॉफी

रामवीर सिंह गुर्जर / ग्वालियर July 28, 2020

लॉकडाउन ने बुंदेलखंड के तमाम उद्योगों को झटका दिया और ग्वालियर के उद्योग भी इससे बच नहीं पाए। मगर यहां का टॉफी उद्योग लॉकडाउन खुलते ही दौडऩे लगा। हालांकि ग्वालियर को टॉफी के लिए शायद ज्यादा लोग नहीं जानते होंगे मगर यहां बनी मुलायम टॉफी उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में बिकती हैं। लॉकडाउन के दौरान यह उद्योग लगभग ठप पड़ गया था मगर जैसे ही ताला खुला, ऑर्डरों का अंबार लग गया।

ग्वालियर में टॉफी के 20-25 कारखाने हैं और यहां रोजाना 40-50 टन माल बनता है। करीब 30-35 करोड़ रुपये के सालाना कारोबार वाले इस उद्योग से करीब 3,000 लोगों को रोजगार मिलता है। काम करने वाले ज्यादातर कारीगर और मजदूर स्थानीय ही हैं, इसलिए श्रमिकों की किल्लत का सामना इस उद्योग को नहीं करना पड़ा। सामाजिक दूरी का नियम जरूर उत्पादन में खलल डाल रहा है मगर ऑर्डर पूरे करने लायक माल यहां अब भी बन रहा है।

देहात और छोटे शहरों में बड़े ब्रांडों को टक्कर देने वाली ग्वालियर की टॉफियों में सिंधियों का बोलबाला है। आरके नाम के ब्रांड की टॉफी बनाने वाले सुशील कुमार बहरानी बताते हैं कि उनकी टॉफियां मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में तो बिकती ही हैं, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में काफी मंगाई जाती हैं। बहरानी का दावा है कि ग्वालियर जैसी मुलायम टॉफियां पूरे देश में कहीं नहीं बनतीं। टॉफियां मुलायम बनाने के लिए कच्चे माल में वसा का अच्छा खासा इस्तेमाल करना पड़ता है। मगर बहरानी के मुताबिक ग्वालियर का पानी खुद ही टॉफी को मुलायम कर देता है। इसीलिए देश के दूसरे हिस्सों में बनाने वाली टॉफियों में मुलायमियत के लिए अगर 100 किलोग्राम माल में 10 किलो वसा डालनी पड़ती है तो ग्वालियर में 2 किलो वसा में ही काम चल जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि लागत घट जाती है।

टॉफी बनाने वाले उद्यमी बताते हैं कि फ्लेवर और गुणवत्ता के हिसाब से ग्वालियर में बनने वाली टॉफी की थोक कीमत 10 पैसे से 50 पैसे आती है। इन टॉफियों को बाजार में 50 पैसे से 1 रुपये में बेचा जाता है। केपी ब्रांड की टॉफी बनाने वाले सुनील रोहारा कहते हैं कि कम कीमत होने की वजह से ही टॉफी जैसे उद्योग पर लॉकडाउन का अधिक असर नहीं पड़ा। हालांकि लॉकडाउन के दौरान करीब दो महीने कारोबार पूरी तरह ठप रहा। हालांकि उद्योग के सामने चुनौतियां तो हैं और लॉकडाउन से पहले भी यह दिक्कतों से जूझ रहा था। सबसे बड़ी दिक्कत बुनियादी सुविधाओं की है। रोहारा का कहना है कि कनेक्टिविटी की कमी सबसे ज्यादा साल रही है। हवाई संपर्क नहीं होने के कारण टॉफी के कई कारोबारी और उद्यमी इंदौर का रुख कर चुके हैं।

लॉकडाउन ने कुछ नई परेशानियां जोड़ दी हैं। बहरानी बताते हैं कि बंदी के दौरान का बिजली बिल, कारीगरों का अटका वेतन, फंसा हुआ भुगतान कुछ समय तक दिक्कत करता रहेगा। टॉफी कारोबारी सुनील जेसवानी के सामने मुश्किल यह है कि लंबे समय के लिए उधारी पर माल लेना-देना लॉकडाउन के कारण बंद कर दिया गया है।

कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स की मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष और ग्वालियर के कारोबारी भूपेंद्र जैन ने बताया कि करीब 70 साल पहले सिंधी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले कारोबारी जेबी मंगाराम का परिवार ग्वालियर आया और उन्होंने अपनी बिस्कुट कंपनी जेबी मंगाराम की इकाई ग्वालियर में लगाई। यह कंपनी तो ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज की हो चुकी है मगर मंगाराम परिवार के साथ भारी संख्या में यहां आए और बसे सिंधियों ने टॉफी का कारोबार खड़ा कर दिया। इसी वजह से आज भी इस कारोबार की कुंजी सिंधी समुदाय के हाथ में ही है।

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