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देश की वित्तीय व्यवस्था मजबूत

अनूप राय / मुंबई 07 24, 2020

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आज अपनी छमाही वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट (एफएसआर) जारी करते हुए कहा कि पूंजीकरण अधिक होने और बैंकों के बीच जुड़ाव कम होने से बैंकिंग प्रणाली सुरक्षित है और मुश्किल हालात से उबरने में सक्षम है, लेकिन कोविड-19 संकट से फंसे ऋणों (एनपीए) में खासी बढ़ोतरी हो सकती है।

आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा, 'आर्थिक सुधार सुस्त होने का जोखिम काफी ज्यादा है, लेकिन अर्थव्यवस्था बेहतर होने के शुरुआती संकेत भी दिख रहे हैं। मगर हमें अत्यधिक सतर्क और केंद्रित रहना होगा।' रिपोर्ट बताती है कि बैंकों का सकल एनपीए अनुपात मार्च में 8.5 फीसदी था, जो आज की स्थिति में मार्च 2021 तक बढ़कर 12.5 फीसदी पर पहुंच सकता है। लेकिन स्थिति बहुत खराब हुई तो आंकड़ा 14.7 फीसदी तक भी पहुंच सकता है।

बैंकों का जोखिम भारित परिसंपत्ति के मुकाबले पूंजी अनुपात (सीआरएआर) मार्च 2020 में मामूली गिरकर 14.8 फीसदी पर आ गया है, जो सितंबर 2019 में 15 फीसदी था। लेकिन बैंकों का जो सामान्य इक्विटी टियर (सीईटी) 1 पूंजी अनुपात मार्च में 11.7 फीसदी था, वह इन परिस्थितियों में घटकर मार्च 2021 तक 10.7 फीसदी हो सकता है। हालात और बिगड़े तो यह 9.4 फीसदी तक लुढ़क सकता है।

एफएसआर में कहा गया है, 'इन हालात में तीन बैंक मार्च 2021 तक 5.5 फीसदी का न्यूनतम नियामकीय सीईटी 1 पूंजी अनुपात हासिल करने में भी नाकाम रह सकते हैं।' इसके बावजूद बैंकों के पास रोजमर्रा की नकदी जरूरतें पूरी करने के लिए उच्च गुणवत्ता की तरल परिसंपत्तियां पर्याप्त मात्रा में हैं। इस बार रिपोर्ट में कुछ अहम अवधारणाओं में बदलाव किया गया है। उदाहरण के लिए जोखिम विश्लेषण में 'अत्यधिक' दबाव की स्थिति को शामिल किया गया है, लेकिन बैंकिंग प्रणाली में धोखाधड़ी जैसी बातों को बाहर रखा गया है। जिन्हें छोड़ दिया गया है, उन्हें सालाना रुझान एवं प्रगति रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा।

गवर्नर शक्तिकांत दास ने अपनी प्रस्तावना में लिखा, 'कोविड-19 महामारी के प्रसार, तीव्रता और अवधि से इतनी ज्यादा अनिश्चितता पैदा हुई है, जो हमने अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखी।'

गवर्नर ने कहा कि पिछले कुछ समय से देशव्यापी लॉकडाउन के बाद धीरे-धीरे सुधार के संकेत नजर आ रहे हैं। लेकिन इस समय मुख्य मकसद वित्तीय प्रणाली के दीर्घकालीन स्थायित्व को बनाए रखना होना चाहिए, जो सुधार को आगे ले जाने के लिए बहुत अहम है।

अलबत्ता रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि निकट अवधि की आर्थिक संभावनाएं बुरी तरह प्रभावित हुई लगती हैं, जिन पर लॉकडाउन की वजह से मांग और आपूर्ति में हुए अवरोध, उपभोक्ता आत्मविश्वास में आई कमी और जोखिम से बचने की भावना का असर पड़ा है। हालांकि नियामकों और सरकार ने अपने स्तर पर कदम उठाए हैं, लेकिन लघु अवधि में आर्थिक संभावनाओं के कमजोर रहने के जोखिम अधिक हैं।

आरबीआई गवर्नर के मुताबिक महामारी खत्म होने के बाद नियामकीय और अन्य बंदिशों में ढील देने के प्रयास किए जाने चाहिए।

बहरहाल आरबीआई का हालिया सर्वेक्षण बताता है कि सभी प्रमुख श्रेणियों में जोखिम बढ़ा है। मुश्किल दौर से गुजर रही गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) और आवास वित्त फाइनैंस कंपनियां (एचएफसी) पर वित्तीय प्रणाली का सबसे ज्यादा कर्ज है और इसमें से काफी ज्यादा कर्ज बैंकों का है। लेकिन उनमें से सबसे बड़ी कंपनी अगर कर्ज नहीं चुका पाई तो भी बैंक डावांडोल नहीं होंगे क्योंकि वे मुश्किल से पार पाने में सक्षम हैं और उनके पास पर्याप्त पूंजी है और अंतर-बैंक बाजारों का आकार घट रहा है।

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