बिजनेस स्टैंडर्ड - पारिवारिक कारोबार में उत्तराधिकार पर गंभीरता से ध्यान देने की दरकार
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पारिवारिक कारोबार में उत्तराधिकार पर गंभीरता से ध्यान देने की दरकार

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  July 23, 2020

हिंदुजा परिवार ने हमेशा एक खुशहाल परिवार की कहानी पेश की है, जहां चार भाई, उनकी पत्नियां, बच्चे और पोते-पोती एक चट्टान की तरह एकजुट हैं। बीते वर्षों के दौरान चारों भाई सार्वजनिक तौर पर यह भी कह चुके हैं कि वे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की तरह हैं। उनके शरीर चार हैं, लेकिन आत्मा एक है। हालांकि जहां तक उनके कारोबारी संबंधों का सवाल है, अब यह पटकथा एक अलग मोड़ ले चुकी है।

ऐसा लगता है कि सभी भाइयों ने 'चार शरीर, एक आत्मा' के सिद्धांत को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया। इतना अधिक कि ब्रिटेन के दूसरे सबसे धनी और 20 अरब डॉलर से अधिक संपत्ति के मालिक परिवार की उत्तराधिकार योजना महज एक पत्र तक सीमित थी। उन सभी ने इस पत्र पर 2014 में हस्ताक्षर किए थे, जिसमें कहा गया कि 'किसी एक भाई के नाम संपत्ति सभी की है।' इस परिवार की न कोई वसीयत थी, न अन्य कोई बाध्यकारी दस्तावेज, न परिवार का संविधान। केवल एक पत्र था। इस वजह से एक बड़े वकील को कहना पड़ा कि यह मामला इससे अधिक हास्यास्पद नहीं हो सकता था। सभी भाई अपनी सेवानिवृत्ति की उम्र से काफी आगे पहुंच चुके हैं। सबसे बड़े श्रीचंद 84 साल के हैं, गोपीचंद 80, प्रकाश 75 और अशोक 70 साल के हैं। हालांकि हिंदुजा परिवार की तीसरी पीढ़ी समूह की कंपनियों की अगुआई कर रही है, जिनमें से ज्यादातर लड़के हैं। मगर एक पत्र अच्छी उत्तराधिकार योजना का सबूत नहीं है।

इस तरह की व्यवस्था से कुछ बड़ी दिक्कतों का दस्तक देना तय था। पहली दिक्कत हाल में उस समय आई, जब समूह के 'मौजूदा प्रमुख' माने जाने वाले श्रीचंद हिंदुजा ने इस पत्र की कानूनी शुचिता को चुनौती दी। श्रीचंद ने चार साल पहले भी साफ किया था कि पत्र उनकी अभिलाषाओं को नहीं दर्शाता है और परिवार की संपत्ति का बंटवारा होना चाहिए। ब्रिटेन की अदालत में सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि परिवार के सदस्यों के बीच हिंदुजा बैंक के नियंत्रण को लेकर स्विटजरलैंड में मुकदमा चल रहा है। यह बैंक केवल श्रीचंद के नाम है। परिवार के सदस्यों के बीच जर्सी में भी कानूनी मामले चल रहे हैं। हालांकि वजहों का पता नहीं है, मगर तीन अन्य भाई अपने इस बात पर अड़े हैं कि 'हर चीज हर किसी की है और कोई भी चीज किसी एक की नहीं है।' हालांकि ऐसा लगता है कि वे मुख्य रूप से इस बात से खफा हैं कि श्रीचंद ने अपने प्रतिनिधि के रूप में बेटी को नियुक्त कर दिया है।

दरअसल तीसरी पीढ़ी को स्वामित्व का हस्तांतरण काफी पहले हो जाना चाहिए था क्योंकि इस समय केवल लड़के ही बड़ी भूमिका में हैं और केवल श्रीचंद हिंदुजा की बेटियां ही समूह के कारोबार में हाथ आजमा रही हैं।

कंपनियों का इतिहास बताता है कि कैसे संस्थापकों ने उद्यम शुरू करने और उन्हें बनाने में प्रशंसनीय कार्य किया, मगर संगठन को छोडऩे और उसे किसी दूसरे अगुआ के हाथ में सौंपकर दूसरे चरण की वृद्धि को मंजूरी देने के स्तर पर खराब काम किया। भारतीय उद्यमों में खराब उत्तराधिकार योजना के असंख्य उदाहरण हैं। इनमें पिताओं और पुत्रों के बीच अदालती झगड़ा (रैनबैक्सी के परविंदर सिंह बनाम भाई मोहन सिंह), भाइयों और चचेरे भाइयों के बीच कानूनी विवाद (मोदी परिवार) और यहां तक कि सास और बहुओं के बीच के विवाद (मफतलाल मामला) शामिल हैं। इससे यह साफ होता है कि इन कंपनियों में से ज्यादातर इसलिए डूब गईं क्योंकि उनके मालिक परिवार खुद अपना विवाद नहीं सुलझा पाए।

बहुत से प्रवर्तक परिवार उस चर्चा में उलझ जाते हैं, जो 'लेकिन हमने हमेशा ऐसे ही किया है' के साथ शुरू होती है। वे यह नहीं समझते कि तेजी से बदलती दुनिया में परंपरागत तरीका काम नहीं करता है। उदाहरण के लिए ज्यादातर परिवारों ने हर उत्तराधिकारी पीढ़ी में सबसे बड़े पुरुष को नियंत्रण स्वामित्व और सीईओ का पद दिया है। उन्होंने अन्य उम्मीदवारों के बारे में विचार भी नहीं किया।

हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू के एक अध्ययन में इटली के एंटीनोरी परिवार का उदाहरण दिया गया है, जिसने परंपरागत से इतर तरीका अख्तियार करने का साहस दिखाया। परिवार ने शराब बनाने के अपने कारोबार का स्वामित्व और अगुआई 25 पीढिय़ों के हाथों से गुजरने के बाद स्वामित्व को तीन बेटियों के बीच बराबर बांट दिया और कारोबार की अगुआई को प्रत्येक बेटी की काबिलियत के मुताबिक बांट दिया। वे ऐसा कुछ हद तक इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने इस पूर्व धारणा को हटा दिया कि कैसे उत्तराधिकार दिया जाता है और नए सिरे से शुरुआत की।

परिवार के स्वामित्व वाले सबसे अधिक कारोबारों की संख्या के लिहाज से भारत पूरे विश्व में तीसरे पायदान है। हर कोई यह तो कह देता है कि उत्तराधिकार योजना परिवार के स्वामित्व वाले उद्यमों की कार्यप्रणाली के डीएनए में होनी चाहिए, मगर पारिवारिक कारोबारों में इस चीज पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है। वे उत्तराधिकार योजना की अहमियत और उसकी कई पीढिय़ों का कारोबारी ढांचा खड़ा करने और परिवार की विरासत बरकरार रखने में भूमिका को कम करके आंकते हैं।

असल में भारत में 75 फीसदी से अधिक कंपनी बोर्ड उत्तराधिकार के मुद्दे पर चर्चा तक नहीं करते हैं। ज्यादातर मुख्य कार्याधिकारी अपनी जगह लेने के लिए किसी के बारे में सोच भी नहीं पाते हैं। अगर उन्हें किसी को चुनना होता है तो वे अपनी जगह अपने जैसे ही व्यक्ति को बैठाने के बारे में विचार करते हैं। इस तरह के माहौल में, जब परिवार का झगड़ा सामने आता है और परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति का बंटवारा होता है तो कई दशकों में बनाई गई संपत्ति लालच की वेदी पर स्वाहा हो जाती है। यह संभव है कि हिंदुजा और अन्य बहुत से परिवार के स्वामित्व वाले कारोबार उत्तराधिकार योजना के बारे में सीखें।

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