बिजनेस स्टैंडर्ड - खुदरा निवेशकों का जोखिम
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खुदरा निवेशकों का जोखिम

संपादकीय /  July 23, 2020

हालिया महीनों में शेयर बाजार में खुदरा भागीदारी बढ़ी है। गत चार महीनों में 35 लाख नए शेयर कारोबार खाते खोले गए हैं और इसके साथ ही खुदरा निवेशक एक मजबूत ताकत बनकर उभरे हैं। एक्सचेंजों के कुल कारोबार का 75 फीसदी इन्हीं के माध्यम से होता है। बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अध्यक्ष अजय त्यागी ने बुधवार को कहा कि बढ़ती खुदरा भागीदारी चिंता का विषय नहीं है लेकिन इसके बढऩे का तरीका अवश्य चिंतित करता है। त्यागी का सुझाव है बाजार में उनका प्रवेश अधिक क्रमिक होना चाहिए और निवेशकों को सटीक जानकारी के साथ निर्णय लेना चाहिए। नए डीमैट खातों और खुदरा क्षेत्र में कारोबार का आकार बाजार के जोखिम को बढ़ा सकता है।

खुदरा भागीदारी में इस इजाफे के कई कारणों को समझा जा सकता है। मानक सूचकांकों में मार्च से बाद जो गिरावट आई है वह भी एक कारण है। इसके अलावा तयशुदा आय योजनाओं पर मिलने वाला प्रतिफल कम हुआ है क्योंकि रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था का समर्थन करने के लिए ब्याज दरों में कमी की है। बल्कि बैंकों की सावधि जमा योजनाओं का प्रतिफल अब नकारात्मक हो चुका है। अचल संपत्ति बाजार में भी भारी गिरावट है और निकट भविष्य में भी उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसे में अन्य परिसंपत्तियों में प्रतिफल की संभावना देखते हुए खुदरा निवेशक शेयर बाजार की ओर आकर्षित हो रहे हैं। चूंकि इक्विटी म्युचुअल फंडों ने भी हाल के वर्षों में काफी कमजोर प्रतिफल दिया है। ऐसा मोटे तौर पर बाजार के कमजोर प्रदर्शन के कारण हुआ है। ऐसे में बड़ी तादाद में खुदरा निवेशकों ने सीधे निवेश करने का निर्णय किया।

हालांकि वैश्विक शेयर बाजारों के साथ भारतीय शेयर बाजारों में भी सुधार हुआ है। यह तेजी बुनियादी रूप से नकदी आधारित रही है। मार्च में 58,000 करोड़ रुपये से अधिक की बिकवाली के बाद मई से विदेशी संस्थागत निवेशक विशुद्ध खरीदार बने हुए हैं। परंतु बाजार में ऐसे कई संकेत हैं जिनसे निवेशकों को सावधान रहना चाहिए। उदाहरण के लिए खुदरा निवेशक केवल इसलिए शेयर नहीं खरीद रहे क्योंकि उन्हें उनमें कुछ मूल्य नजर आ रहा है बल्कि वे तेजी की लहर पर सवार होकर तत्काल मुनाफा कमाना चाहते हैं। इससे मूल्यांकन बढ़ता है और आगे चलकर उसमें गिरावट आती है। कई मामलों में आय में सुधार न दिखने पर भी मूल्यांकन बढ़ा है। निफ्टी 50 अब आय के 29 गुना पर है जबकि उसका 10 वर्ष का औसत 22.3 गुना का है। यदि बाजार तेजी पर रहा तो मूल्यांकन और बढ़ेगा क्योंकि आय में जल्दी सुधार होता नहीं दिखता। कुछ निवेशक अगले कुछ वर्षों के लिए आय को ध्यान में रखकर चल रहे हैं। मौजूदा हालात में यह बात कतई समझदारी की नहीं लगती।

शेयर बाजार आर्थिक हकीकत की अनदेखी कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कोविड संकट के भारत में आने के पहले मंदी के बावजूद अर्थव्यवस्था के 5-6 फीसदी की दर से विकसित होने की बात कही जा रही थी। अब आर्थिक गतिविधियों में सुधार के बाद बाजार कोविड के पहले वाली स्थिति में पहुंचते दिख रहे हैं। जाहिर है इसका असर आय पर होगा। बल्कि कोविड के लगातार बढ़ते मामले और आर्थिक सुधार में गिरावट के संकेत के चलते वृद्धि अनुमान को संशोधित कर घटाया जा रहा है। रेटिंग एजेंसी इक्रा का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था में 9.5 फीसदी गिरावट आएगी। चूंकि आर्थिक सुधार में काफी अनिश्चितता है, ऐसे में शेयर बाजार का ऊंचे स्तर पर होना भी जोखिम की बात है। खासतौर पर खुदरा निवेशकों के लिए क्योंकि शेयरों की कीमतों को कोई बुनियादी समर्थन हासिल नहीं है।

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