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रातोरात नहीं बनाई जा सकती कोविड वैक्सीन

अतनु विश्वास /  July 20, 2020

कोविड-19 महामारी की वैक्सीन तैयार करने की जद्दोजहद युद्धस्तर पर जारी होने के बीच ऐसी अटकलें जोरों पर हैं कि वैक्सीन हाल-फिलहाल बाजार में नहीं आने वाली है। हालांकि ब्रिटेन के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार सर पैट्रिक वालेंस और अमेरिका के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार एंथनी फॉसी जैसे वैज्ञानिक लगातार यह कह रहे हैं कि कोविड की वैक्सीन बनने में 12 से 18 महीने लग जाएंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी फरवरी के आखिर में कहा था कि उसे 18 महीनों से पहले कोई वैक्सीन आने की उम्मीद नहीं है। इस तरह वैक्सीन को लेकर भ्रम का माहौल बना हुआ है।

निश्चित तौर पर कोई दवा उतनी जल्दी बनाई एवं इलाज में इस्तेमाल नहीं की जा सकती है जितनी जल्दी एक संभावित अणु को  प्रयोगशाला में जांच-परख लिया जाता है। उसके बाद जानवरों पर कुछ प्रारंभिक परीक्षण करने का रिवाज है। इतना ही काफी नहीं है, जानवरों पर सफल परीक्षण के बाद उस दवा को इंसानों पर कड़े परीक्षण के दौर से गुजारा जाता है जिसे 'क्लिनिकल परीक्षण' कहा जाता है। इस प्रक्रिया से दवा की सुरक्षा एवं असर दोनों पहलुओं को परखा जाता है। क्लिनिकल परीक्षण के चार चरण होते हैं जिनमें से पहले तीन चरणों से गुजरना किसी भी नई दवा या वैक्सीन के लिए अनिवार्य है। पहले चरण में उस दवा के इंसानों के लिए सुरक्षित होने से जुड़े बिंदुओं का अध्ययन किया जाता है और इसे वॉलंटियर के तौर पर सामने आने वाले लोगों पर आजमाया जाता है। इस चरण में उस बीमारी के वास्तविक मरीजों पर परीक्षण की जरूरत नहीं होती है और किसी भी इंसान पर इसे आजमाया जा सकता है।

वॉलंटियरों को एक पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के हिसाब से संभावित दवा की कई खुराकें दी जाती हैं। इसका मकसद यह पता लगाना होता है कि इंसानों को कितनी खुराक देने पर किसी गंभीर दुष्प्रभाव का खतरा नहीं होगा। इलाज की स्वीकृत सीमा वाली खुराकों को फिर दूसरे चरण के परीक्षण से गुजरना पड़ता है। यह सुरक्षा एवं असरकारिता दोनों को परखने वाला चरण है। लिहाजा अब से परीक्षण में असली मरीजों की जरूरत होती है। दूसरे चरण में दवा की संभावित खुराकों के बारे में अध्ययन किया जाता है और उनमें से केवल कुछ खुराकें ही सुरक्षित एवं असरदार दोनों मानकों पर खरी उतरती हैं। फिर परीक्षण का तीसरा चरण शुरू होता है जिसमें केवल असरकारिता का अध्ययन किया जाता है। इस दौरान इलाज के कुछ मौजूदा इलाजों के साथ उसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। ऐसे परीक्षण को 'नियंत्रित परीक्षण' कहा जाता है। यह परीक्षण बिना किसी क्रम वाला भी होना चाहिए। इसका मतलब है कि तीसरे चरण के परीक्षण में शामिल किसी भी मरीज को बिना किसी क्रम के कोई इलाज दिया जाता है और उसे या डॉक्टर किसी को भी पता नहीं होता है कि उसे कौन सा इलाज दिया गया है।

अगर तीसरा चरण पूरा होने के बाद संबंधित संगठन का यह लगता है कि संभावित इलाज सुरक्षित होने के साथ ही असरदार भी है तो फिर परीक्षण की अध्ययन रिपोर्ट उस देश की दवा मंजूरी देने वाली नियामक संस्था को भेजी जाती है। अगर नियामक संस्था रिपोर्ट में किए गए दावों से संतुष्ट होती है तो फिर वह उसकी बिक्री एवं व्यापक उपयोग की अनुमति देती है। चौथा चरण दवा की मार्केटिंग शुरू होने के बाद निगरानी रखे जाने से संबंधित है।

पिछले दो दशकों में वैज्ञानिकों और औषधि उद्योग ने सार्स, एच1एन1 इन्फ्लूएंजा, इबोला, मर्स और जिका के बाद अब कोविड जैसी महामारियां आने पर काफी तेजी से कदम उठाए। एच1एन1 इन्फ्लूएंजा की वैक्सीन उत्तरी गोलाद्र्ध में बीमारी फैलने के बाद ही उपलब्ध हो पाई। सार्स और जिका जैसी महामारियां तो वैक्सीन आने के पहले ही खत्म हो गईं। असल में, वायरस-जनित अन्य बीमारियों के वैक्सीन का इतिहास भी अधिक उत्साहवद्र्धक नहीं है। सार्स की कोई निवारक वैक्सीन नहीं उपलब्ध है जो सुरक्षित एवं असरदार दोनों हो। इसी तरह मर्स की भी कोई प्रमाणित वैक्सीन नहीं है।

हालांकि कोविड-19 का वैक्सीन बनाने के लिए दुनिया भर में 100 से अधिक प्रयास हो रहे हैं। इसमें दवा कंपनियों से लेकर सरकारें एवं विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाएं तक लगी हुई हैं। कोविड-19 के इलाज एवं वैक्सीन के विकास में लगे संस्थानों के बारे में उपलब्ध ऑनलाइन जानकारी से 192 प्रयासों का पता चलता है। असल में, अधिकांश परीक्षण अब भी पूर्व-क्लिनिकल चरण में हैं जबकि कुछ परीक्षण क्लिनिकल दौर में पहुंच चुके हैं। सामान्य हालात में नई वैक्सीन बनाने एवं इलाज में उनका इस्तेमाल शुरू होने में 10 से लेकर 20 साल तक लग सकते हैं। हालांकि दुनिया भर की दर्जनों दवा कंपनियां अब इस समयसीमा को कम करने की कोशिश में लगी हैं। वे परीक्षण प्रक्रिया को तेज कर जल्द नई वैक्सीन लाने की कोशिश में जुटी हैं। इसमें गैर-सरकारी संगठनों, सरकारी एजेंसियों और नियामकीय निकायों का भी सहयोग है।

जहां वैक्सीन के सुरक्षित एवं असरदार होना सुनिश्चित करने का कोई शॉर्टकट नहीं हो सकता है, वहीं कुछ कंपनियां वैक्सीन बनाने की चाह में संभावित रूप से जोखिम-भरे एवं विवादास्पद कदम उठा रही हैं। मसलन, ओस्लो के गैर-लाभकारी संगठन कोऑलिशन फॉर एपिडेमिक प्रीपेअर्डनेस इनोवेशंस (सीईपीआई) ने एक 'महामारी पैराडाइम' मॉडल लागू करने की योजना तैयार की है जिसमें जानवरों पर परीक्षण एवं पहले चरण के क्लिनिकल परीक्षण दोनों को ही साथ-साथ अंजाम दिया जाना है।

डब्ल्यूएचओ ने फरवरी में दूसरे एवं तीसरे चरण के परीक्षणों के बारे में मानदंडों का एक खाका पेश किया था। इसमें एक साथ कई देशों में साथ-साथ कई लोगों की जांच करने की बात कही गई थी। महामारी के दौरान क्लिनिकल परीक्षण करने में कुछ और चुनौतियां हो सकती हैं। यह स्थापित तथ्य है कि किसी भी वैक्सीन उम्मीदवार के लिए पहले चरण से लेकर तीसरे चरण की सफलता के बाद नियामकीय मंजूरी हासिल करने की दर बहुत अधिक नहीं होती है और सीईपीआई ने कोविड-19 के मामले में यह दर केवल 10 फीसदी रहने के संकेत दिए थे। लेकिन 100 से अधिक परीक्षण जारी रहने से कुछ सफल वैक्सीन आने की अच्छी संभावना है।

एक वैक्सीन सामने आने के बाद हरेक देश को इसके इस्तेमाल के बारे में खुद ही निर्णय लेना होगा जो उसके अपने स्वास्थ्य नियमों एवं क्षेत्राधिकार पर निर्भर करेगा। अरबों की संख्या में इस वैक्सीन का उत्पादन कैसे और कब होगा, उसे किस तरह वितरित किया जाएगा, उसकी लागत कितनी होगी और अरबों लोगों को टीका लगाने पर आने वाले खर्च का बोझ कौन उठाएगा, जैसे तमाम सवालों के जवाब आने बाकी हैं।

कुल मिलाकर, अगर एक वैक्सीन उपलब्ध होने का मतलब व्यापक स्तर पर उसकी उपलब्धता से है तो इसमें 12-18 महीने का समय लगना संभवत: तार्किक है। इस तरह पूरी संभावना है कि मौजूदा महामारी खत्म होने के पहले कोविड-19 की वैक्सीन नहीं आ पाएगी। यह वैक्सीन तैयार एवं उपलब्ध होने के बाद भी कोरोनावायरस आने वाले कई वर्षों तक बना रहेगा और आखिरकार एचआईवी, मीजल्स, चिकनपॉक्स और सर्दी-जुकाम के लिए जिम्मेदार चार अन्य वायरस-जनित बीमारियों की तरह एक संक्रामक बीमारी बन जाएगी। और इस बात को तो कोई नहीं जानता है कि कोविड-19 की वैक्सीन भी कितने लंबे समय तक इससे सुरक्षा दे पाएगी? फिलहाल तो शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करना ही सबसे अच्छा तरीका नजर आता है।

(लेखक भारतीय सांख्यिकीय संस्थान कोलकाता में प्रोफेसर हैं)

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