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राजस्थान: गहलोत-पायलट में घमासान

बीएस संवाददाता /  July 20, 2020

राजस्थान के बर्खास्त उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच फूट सोमवार को और गहरी हो गई क्योंकि विधायकों को सदस्यता के अयोग्य ठहराने में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका पर राजस्थान उच्च न्यायालय में बहस हुई। गहलोत ने इस बात में कोई संदेह नहीं छोड़ा कि उनका मकसद पायलट को कांग्रेस से बाहर करना था क्योंकि उन्होंने बगावती तेवर अपना लिए। उन्होंने युवा नेता पायलट को 'नालायक, निकम्मा और नाकारा' बताते हुए कहा कि राज्य में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपने सात सालों के कार्यकाल में पायलट ने राज्य में कांग्रेस की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए और बेहतर नतीजे दिखाने लायक 'कुछ भी नहीं' किया। गहलोत ने ट्वीट किया, 'हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा कभी नहीं सुना होगा कि कोई पार्टी का प्रमुख  अपनी ही सरकार को गिराने के लिए षडयंत्र करे...ऐसा आज तक मैंने कभी नहीं सुना।'

हालांकि बात यहीं तक नहीं थमी। कथित रूप से उनके खेमे के एक विधायक ने कहा कि उन्हें पायलट ने राज्यसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए क्रॉस वोट देने के लिए पैसे की पेशकश की थी। बाड़ी विधानसभा क्षेत्र के विधायक गिरिराज सिंह मलिंगा ने कहा, 'मैंने सचिन पायलट से बात की थी उन्होंने मुझसे पक्ष बदलने को कहा और मैंने मना कर दिया।  यह गलत बात है और मैं पैसे के लिए ऐसा नहीं करूंगा।' उन्होंने  आगे कहा, 'मैंने कहा कि हमने 2008 में बहुजन समाज पार्टी छोड़ दी जहां किसी को टिकट पाने के लिए पैसे देने पड़ते हैं। कांग्रेस और भाजपा में ऐसा नहीं है। मुझे बहुत पैसे की पेशकश की गई थी। सचिन पायलट ने कहा था पैसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, आप बताएं कि आप क्या चाहते हैं और आपको मिलेगा...35 करोड़ रुपये या इससे अधिक भी मिलेगा। लेकिन मैंने कहा कि यह गलत है।'

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए पायलट ने कहा, 'मैं विधायक गिरिराज सिंह मलिंगा के खिलाफ उचित और सख्त कानूनी कार्रवाई करूंगा जिन्हें ये आरोप लगाने के लिए तैयार किया गया। मुझे पूरा यकीन है कि इस तरह के कई और मनगढ़ंत आरोप मुझ पर लगाए जाएंगे ताकि मेरी सार्वजनिक छवि पर असर पड़े। लेकिन मुझे इन बातों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता और मैं अपने विश्वास और प्रतिबद्धता पर कायम रहूंगा।'

कांग्रेस पार्टी में गहलोत के समर्थक और वरिष्ठ नेता भी पायलट के खिलाफ अपने सुर बुलंद करने लगे मसलन पूर्व मंत्री और राज्यपाल मार्गरेट अल्वा भी सचिन पायलट की आलोचना करने से पीछे नहीं हटीं। राजस्थान की पूर्व राज्यपाल ने 42 वर्षीय पायलट से पूछा, 'आप इतनी जल्दी में कहां पहुंचना चाहते थे? क्या आप 43 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं और भाजपा में शामिल होकर 45 साल में प्रधानमंत्री बनना चाहते थे?'

गहलोत ने काफी सख्त रूख अपनाया था और पायलट तथा उनके समर्थकों पर राज्य पुलिस तंत्र का पूरा दबाव डालना जारी रखा। गहलोत सरकार को गिराने के लिए भाजपा के साथ सहयोग करने के लिए पायलट को विशेष संचालन समूह (एसओजी) ने नोटिस भेजा था जिसके बाद सारा मामला सार्वजनिक हो गया था। एसओजी हरियाणा के रिसॉर्ट में गया जहां बागी विधायक रह रहे थे लेकिन उसे खाली हाथ लौटना पड़ा क्योंकि रिसॉर्ट ने पुलिस को अंदर जाने से मना कर दिया। हरियाणा में भाजपा की सरकार है। गहलोत ने कहा कि विधायकों को कैद करके रखा गया है और अपने परिवार से भी बात करने के लिए उनके पास मोबाइल फोन तक नहीं है।

हालांकि, पायलट समर्थकों की संख्या 18 पर स्थिर बनी हुई है जिससे यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस में एक गुट ऐसा है जो अशोक गहलोत के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करेगा। इस गुट के कई विधायक जाट हैं  जिनकी गहलोत से काफी पुरानी शिकायत रही है।

इसके समानांतर राजस्थान उच्च न्यायालय में विधायकों को अयोग्य ठहराने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष या अदालत के पास है इसको लेकर बहस जारी रही। दिलचस्प बात यह है कि विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी और गहलोत लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। लेकिन इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष के वकील अभिषेक सिंघवी हैं और उन्होंने अध्यक्ष के प्रतिनिधि के तौर पर दलील दी कि अकेले अध्यक्ष को यह तय करने का अधिकार है कि विधायकों ने पक्ष बदला है या नहीं और उन्हें अयोग्य ठहराने का भी अधिकार है। इसे पायलट के वकील हरीश साल्वे ने चुनौती दी  जिन्होंने दलील दी कि विधानसभा अध्यक्ष ने पहले ही विधायकों को अयोग्य ठहराने का फैसला कर लिया था  इसलिए केंद्रीय मुद्दा अध्यक्ष के अधिकार नहीं बल्कि विधायकों के लिए न्याय है और विधानसभा की रिट विधानसभा के अंदर ही चलती है न कि सदन के बाहर विधायकों के आचरण पर इसके अनुसार कार्रवाई हो सकती है। उन्होंने कहा कि विधायकों को अयोग्य ठहराने का फैसला तभी लिया जा सका जब विधानसभा का सत्र चल रहा हो।

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