बिजनेस स्टैंडर्ड - राजनीति में धन का इस्तेमाल
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राजनीति में धन का इस्तेमाल

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  07 17, 2020

हमारी वर्तमान राजनीति में मतदाताओं का जनादेश नहीं मिलने के बावजूद राज्य सरकारों को हड़पना इतना महत्त्वपूर्ण क्यों हो गया है? इस सवाल का एक जवाब यह हो सकता है कि इससे अगले चुनाव के समय राज्य सरकार पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है। पुलिस तथा अन्य अधिकारियों का स्थानांतरण इस मनचाहे ढंग से किया जा सकता है कि सत्ताधारी दल को प्रचार प्रसार में मदद मिले, किसी भी प्रकार के छल-कपट के मौकों पर नजरें फेरी जा सकें या फिर इस तरह की नियुक्तियां और तैनातियां की जा सकें जो स्थानीय स्तर पर प्रभाव उत्पन्न करने वाली हों।

एक और संभावना है: सरकारी व्यवस्था से राजनीतिक इस्तेमाल के लिए जो धनराशि निकाली जा सकती है वह ज्यादातर केंद्र स्तर के बजाय राज्य स्तर पर मौजूद है। दोहरा लाभ यह है कि विपक्ष को उस धन का इस्तेमाल करने से रोका जा सकता है। जबकि वह पहले से ही घाटे में रहता है क्योंकि उसकी पहुंच उस फंड तक नहीं होती जो केंद्र सरकार की मदद से जुटाया जा सकता है। कारोबारी इसलिए धन चुकाने को तैयार रहते हैं क्योंकि उनकी राह कठिन बनाई जा सकती है या केंद्र की एजेंसियां, कर अधिकारी, बैंक अधिकारी और क्षेत्रीय नियामक परेशानी खड़ी कर सकते हैं।

ऐसी फंडिंग काफी बड़ी और महत्त्वपूर्ण होती है और हमारा राजकोषीय परिदृश्य कुछ ऐसा है कि सरकारी धन का ज्यादातर हिस्सा राज्यों के हाथ में जाता है, न कि केंद्र के। गत वर्ष केंद्र का कुल व्यय 27 लाख करोड़ रुपये था लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा पूर्व प्रतिबद्धता वाला था। एक करोड़ से अधिक कर्मचारियों तथा पेंशनरों का वेतन और पेंशन, सरकारी ऋण पर ब्याज भुगतान और राज्यों को किया जाने वाला हस्तांतरण आदि को मिला दिया जाए तो यह उपरोक्त 27 लाख करोड़ रुपये का करीब तीन चौथाई हो जाता है। यानी केंद्र सरकार द्वारा विवेकाधीन व्यय के लिए करीब 7 लाख करोड़ रुपये बचे। इसके उलट राज्यों ने 34 लाख करोड़ रुपये व्यय किए। उनकी पूर्व प्रतिबद्धता केंद्र से काफी कम थी। उदाहरण के लिए ब्याज भुगतान केंद्रीय बिल के 60 फीसदी से भी कम था। साफ है कि धन जुटाने के ज्यादा अवसर राज्यों में हैं। सिंचाई और सड़क निर्माण अनुबंधों, शराब के सौदों और खनन लीज (कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं) और तमाम प्रकार की खरीद आदि के बारे में सोचिए। मिसाल के तौर पर बिजली खरीद, कोयला खरीद, चारा खरीद, तेंदू पत्ता अनुबंध आदि..सूची लंबी है। इतना ही नहीं राज्य स्तरीय सौदों की जांच भी कम होती है, बशर्ते कि आप लालू प्रसाद यादव की तरह बदकिस्मत न हों।

ऐसे में एक या दो राज्य सरकारों का नियंत्रण कांग्रेस जैसी पार्टी के प्रभावी कामकाज के लिए काफी आवश्यक है। इसके मुख्यमंत्रियों के इतना ताकतवर होने की एक वजह यह है कि वे केंद्र में पार्टी को फंड मुहैया कराते हैं। जरा अन्य नेताओं के साथ वाईएस राजशेखर रेड्डी (और उनके बेटे द्वारा अर्जित संपत्ति) और भूपेंद्र सिंह हुड्डा (भूमि उपयोग में बदलाव की इजाजत) की ताकत के बारे में सोचिए।

ऐसे में कांग्रेस से किसी राज्य का शासन छीनने के राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े गहरे निहितार्थ हैं। ऐसा होने से पार्टी के पास प्रभावी चुनाव अभियान के लिए आवश्यक धन नहीं बचेगा। जैसा कि खबरों में कहा जा रहा है कि पाला बदलने की मंशा रखने वाले प्रत्येक विधायक को 15 से 25 करोड़ रुपये की पेशकश की जा रही है। ऐसे में सरकार बदलने के लिए जरूरी 15 से 20 विधायकों को इसके लिए राजी करने के लिए 400 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। प्रतिद्वंद्वी दल को राजकोष से दूर रखने मेंं इतना धन तो लग ही सकता है। यह वैसा ही है जैसे ऐतिहासिक संदर्भों में बंगाल में दखल बढ़ाने के लिए नवाब सिराजुद्दौला के खिलाफ ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा मीर जाफर को रिश्वत देना। बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे कुछ बड़े राज्यों में कांग्रेस की हैसियत बहुत मामूली रह गई है। ऐसे में कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे अन्य बड़े राज्यों पर नियंत्रण उसके लिए बहुत अहम है। तभी वह ताकतवर बनी रह सकेगी। इसी तरह कांग्रेस को इन राज्यों में सत्ता से वंचित करके ही कांग्रेस मुक्त भारत का घोषित लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

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