बिजनेस स्टैंडर्ड - दो करों के बहाने कर नीति की कहानी
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दो करों के बहाने कर नीति की कहानी

पार्थसारथि शोम /  July 16, 2020

कॉर्पोरेट कर की बढ़ती जटिलता का एक अवांछित नतीजा यह भी है कि इससे अर्जित राजस्व में कमी आ रही है। इसके अलावा ट्रांसफर प्राइसिंग और ऐसे कॉर्पोरेट ढांचों के जरिये कर वंचना की जा रही है जिन पर सवालिया निशान लग रहे हैं। व्यवस्था चाहे जितनी सुसंगत हो लेकिन कॉर्पोरेट कर समय के साथ ऐसे निहित स्वार्थ वाले समूहों के लिए रियायत की व्यवस्था बना ही देता है जिनका वित्तीय रसूख हो। न्यूनतम वैकल्पिक कर अर्थात एमएटी विभिन्न सरकारों के नीति निर्माताओं के बीच विषनाशक औषधि के रूप में लोकप्रिय रहा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न एमएटी आधार का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसमें सकल परिसंपत्ति, बिक्री व कुल कारोबार शामिल हैं। भारत में यह मुनाफेे से संबंधित है।

कर योगदान में इजाफा करके एमएटी गतिविधियों को कानून में उल्लिखित मूल इरादों के करीब ले जाता है। एक एमएटी दरअसल प्रभावी कर दर के औसत को सामने रखता है। ऐसे में मार्जिनल कर दर कम रहती है। इस तरह यह आवंटन आधारित विसंगतियों को दूर कर किफायत बढ़ाता है। इसके अलावा यह सभी कंपनियों को औसत कर दर के आसपास का भुगतान करने की आवश्यकता तय करके समता बढ़ाने का काम करता है तथा शून्य कर वाली कंपनियों को समाप्त करने मेंं सहायता करता है।

एमएटी एक ऐसा कर है जो उचित कॉर्पोरेट आय कर (सीआईटी) राजस्व हासिल करने के लिए लगाया जाता है। ऐसे में जब सीआईटी दर में कमी आती है तो एमएटी दर में भी कमी आनी चाहिए। इसका उलटा भी उतना ही सही है। इसे और स्पष्ट करें तो जब सरकार सीआईटी दर में कमी करती है तो उसका इरादा शायद यही होना चाहिए कि वह करदाताओं के पास और अधिक संसाधन छोड़े। इसी तरह कमतर एमएटी नए, कम सीआईटी राजस्व के आसपास हासिल करने में मददगार होगा।

सीआईटी और एमएटी शृंखला में सन 1987 के वित्त अधिनियम के जरिये एमएटी की शुरअुात के बाद से बार-बार बदलाव आया है। शुरुआत में इसे खाते में दर्ज मुनाफे के 15 फीसदी के स्तर पर तय किया गया था। यह वह वाणिज्यिक मुनाफा था जो विभिन्न समायोजन के बाद सामने आता। जबकि सीआईटी की दर 50 फीसदी थी। उपकरों और अधिभार में बदलाव ने भी इस अंतर में योगदान दिया। सन 1988-89 से सन 2021-22 के बीच एमएटी दरों में आठ बार बदलाव आया। इसी दौरान इसे समाप्त किया गया और दोबारा लागू किया गया। समान अवधि में सीआईटी में नौ बार बदलाव आया। अधिभार में 15 बार और उपकर में दो बार। जबकि सीआईटी का आधार पांच बार बदला गया।

सवाल यह उठता है कि क्या सीआईटी और एमएटी दरें एक ही दिशा में गईं या विपरीत? सीआईटी और एमएटी दरों के रिश्ते का विश्लेषण वैसे नतीजे नहीं देता है कि अनुमानित थे। अध्ययन करने पर पता चला कि एक ओर जहां समेकित सीआईटी दर (अधिभार और उपकर समेत) समय के साथ गिरी वहीं एमएटी दरों में इजाफा हुआ (हाल के वर्षों को छोड़कर)। जाहिर है यह सरकार के सीआईटी दरों को कम करके उद्योग जगत को बढ़ावा देने के सरकार के घोषित उद्देश्य के प्रतिकूल रहा। वर्ष 2017-18 और 2021-22 के बीच के सीआईटी के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2019-20 से शायद कोशिश यह रही हो कि छोटे करदाताओं को प्रोत्साहित किया जाए तथा कर प्रशासन की सहायता की जाए हालांकि कर अधिकारियों को भी कर वंचना रोकने की चुनौती का सामना करना पड़ता है। करदाताओं को अपनी घोषणा को सत्य साबित करना होता है।

सीआईटी-एमएटी का रिश्ता इस बात के परीक्षण से स्पष्ट हो जाता है कि क्या सीआईटी दर एमएटी दर को किसी तरह जटिल बनाती है या उसमें बदलाव लाती है? जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं, संकेत सकारात्मक होने चाहिए। सीआईटी दर में बदलाव का एमएटी दर पर करीब 0.32 ऋणात्मक गुणांक प्रभाव होता है और यह रिश्ता नकारात्मक है। बहरहाल अनुमान मजबूत होने के नाते आसानी से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जब वर्षों के दौरान सीआईटी दर में कमी आई, एमएटी दर बढ़ी।

एमएटी के साथ कई मसले हैं। उदाहरण के लिए सरकार की एसईजेड नीति शुरुआत से ही कमजोर और भ्रामक थी। एक बार यह नीति लागू होने के बाद कारोबारी निर्णय इसमें करों को लेकर किए गए वादे से जुड़े थे। एसईजेड को अतीत प्रभाव से एमएटी के दायरे में लाने का निर्णय गलत नीति थी।

एमएटी की एक और अनसुलझी सीमा है इसकी बुनियाद बुक प्रॉफिट का होना। उससे बीते वर्षों में कई बार छेड़छाड़ की गई। वह घोषित आय पर निर्भर है इसलिए इससे जुड़े लेखा पर भी प्रश्न उठते हैं। सन 2000-2001 में 10वें वित्त आयोग के कर नीति और कर प्रशासन सलाहकार समूह ने यह अनुशंसा की थी कि एमएटी का दायरा बढ़ाया जाए। उसने कहा था कि एमएटी का आधार कंपनी की कर लायक क्षमता के अनुमान पर आधारित होना चाहिए। यह अनुमान व्यापक तौर पर आय की क्षमता के औसत के आधार पर लगाया जा सकता है।

ऐसा आधार घोषित वाणिज्यिक मुनाफे के अलावा कुछ और होगा। कुल परिसंपत्ति, कुल बिक्री या शुद्ध मूल्य इसके संभावित विकल्प हो सकते हैं। इनमें से विशुद्ध मूल्य अवधारणा के स्तर पर आय के सबसे करीब है लेकिन उसका दायरा सीमित है और उसमें छेड़छाड़ संभव है। बिक्री के आधार पर न्यूनतम कर आधार में सेवाओं के साथ भेदभाव होगा जबकि कुल परिसंपत्तियों पर आधारित आकलन बैंकों, भारी उद्योगों आदि के खिलाफ जाएगा।

सकल परिसंपत्ति और कुल बिक्री या कारोबार के मिश्रण का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। दूसरा विकल्प यह है कि शुद्ध मूल्य के प्रतिशत और वितरित लाभांश के एक प्रतिशत का इस्तेमाल किया जाए। यह आर्थिक दृष्टि से किफायती और समतापूर्ण होगा। किफायती इसलिए क्योंकि स्वामी की पूंजी पर प्रतिफल की न्यूनतम अनुमानित कीमत से जुड़ा होगा। किसी कंपनी का प्रदर्शन जितना खराब होता है, वास्तविक आय पर कर दर भी उसी तरह प्रभावित होती है। समतापूर्ण इसलिए क्योंकि सभी कंपनियां लगभग समान होंगी तो कर वंचना देखने को शायद न मिले। सलाहकार समूह ने अपना प्रस्ताव विस्तार से समझाया और अगर एमएटी के डिजाइन में सुधार करना है तो उस पर एक नजर पुन: मारना बेहतर होगा।

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