बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि क्षेत्र की तरह कोरोना संकट से सीख लेना होगा बेहतर
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कृषि क्षेत्र की तरह कोरोना संकट से सीख लेना होगा बेहतर

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  July 15, 2020

यह सामान्य धारणा आंशिक तौर पर ही सही है कि कृषि क्षेत्र कोविड-19 महामारी से अछूता रहा है। जहां फसलों की उपज आम तौर पर बरकरार रही है और कुछ मामलों में तो बेहतर भी हुई है, वहीं अधिकतर किसानों की आय कम हो गई है। इसका मुख्य कारण यह है कि महामारी पर काबू पाने के लिए लगाए गए लॉकडाउन में कृषि उत्पादों के दाम गिरे और आपूर्ति भी बाधित हुई। खास बात यह है कि लॉकडाउन का यह समय रबी फसलों की कटाई एवं विपणन का सबसे व्यस्त दौर था। होटलों एवं रेस्टोरेंट जैसे थोक उपभोक्ताओं से आने वाली मांग ठप हो जाने का भी कृषि उत्पादों की कीमतों पर असर पड़ा है।

वास्तव में जल्द खराब होने वाले कृषि उत्पादों को थोकमूल्य कीमतों में गिरावट की सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ी। हालांकि इनमें से कई उत्पादों की खुदरा कीमतों में तेजी का रुख देखा गया। कोविड संकट के दौरान बाजार से आई रिपोर्टों के अनुसार कई कृषि जिंसों के भाव 10 फीसदी से लेकर 50 फीसदी तक गिर गए जिसकी वजह से अधिक उपज होने का किसानों को कोई लाभ नहीं मिल सका। यह नतीजा विभिन्न जिंस समूहों पर कोविड महामारी के असर के विश्लेषण से निकला है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के शोध संस्थानों ने इससे बचाव के उपाय तलाशने की रणनीति के तहत यह विश्लेषण किया है। इससे पता चलता है कि कोविड काल की बंदिशों की सबसे तगड़ी मार बागवानी क्षेत्र से जुड़े उत्पादों पर पड़ी है।

वर्ष 2019-20 में फसल उत्पादन के नवीनतम सरकारी अनुमानों में बागवानी उत्पादों की उपज 31.33 करोड़ टन रहने की बात कही गई है जो एक साल पहले के 31.07 करोड़ टन उपज से 0.84 फीसदी अधिक है। इसके बावजूद किसानों ने बागवानी फसलों से कम प्रतिफल मिलने की शिकायत की।

उदाहरण के तौर पर, नागपुर स्थित सेंट्रल साइट्रस रिसर्च इंस्टीट्यूट का आकलन है कि खट्टे फल उगाने वाले उत्पादकों को 2,995 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा है। दूसरी तरफ, गंतोक स्थित राष्ट्रीय ऑर्किड शोध संस्थान के अनुसार ऑर्किड समूह के पौधे उगाने वालों की बिक्री लॉकडाउन की अवधि में शून्य रही है।

इसी तरह काली मिर्च, अदरक, हल्दी, इलायची, मिर्च और लौंग, दालचीनी एवं जायफल जैसे मसाला उत्पादों को भी खासा नुकसान उठाना पड़ा। कोझिकोड स्थित भारतीय मसाला शोध संस्थान का मानना है कि इन मसाला उत्पादों के कारोबार में करीब 475 करोड़ रुपये का घाटा उत्पादकों को उठाना पड़ा। केला उत्पादकों के लिए भी लॉकडाउन का समय बुरा साबित हुआ। तिरुचिरापल्ली स्थित राष्ट्रीय केला शोध केंद्र ने करीब 200 करोड़ रुपये का नुकसान केला उत्पादकों को होने का अनुमान लगाया है।

इस कहानी के दूसरे पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसका ताल्लुक कोविड महामारी के समय कृषि क्षेत्र द्वारा दिखाई गई जिजीविषा से है। कृषि क्षेत्र ने महामारी से उपजी चुनौतियों से निपटने में विनिर्माण, सेवा एवं अन्य क्षेत्रों को काफी पीछे छोड़ दिया है। असल में, कृषि क्षेत्र मौजूदा अंधियारे दौर में एक चमकदार पक्ष की तरह उभरकर सामने आया है। लेकिन इसका श्रेय किसी एक कारक को नहीं दिया जा सकता है। इसका श्रेय अलग-अलग मात्रा में कई लोगों को जाता है। किसानों की दृढ़ इच्छाशक्ति, कृषि क्षेत्र की मदद के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा दिखाई गई असाधारण तत्परता और कृषि शोध संस्थानों की तरफ से समय पर दी गई विशेषज्ञ सलाह का मिला-जुला योगदान रहा है।

केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर खासी तेजी दिखाते हुए कृषि गतिविधियों को फौरन ही लॉकडाउन की बंदिशों से मुक्त कर दिया था। अप्रैल एवं मई के महीनों में कोरोनावायरस का प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में होते ही सरकार ने कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र में अपना व्यय बढ़ा दिया। किसी क्षेत्र के सरकारी व्यय में इतनी तीव्र वृद्धि की शायद ही कोई तुलना हो। राज्य सरकारों ने भी महामारी के चलते पैदा हुई चुनौतियों एवं किसानों की अन्य समस्याओं से निपटने के लिए ज्यादा समय न गंवाते हुए सकारात्मक कदम बढ़ाए। सरकारों ने यह सुनिश्चित किया कि वायरस संक्रमण को लेकर बरते जा रहे तमाम एहतियात एवं कर्मचारियों की कमी के बावजूद अनाज की खरीद में कोई समस्या न आए।

कृषि वैज्ञानिकों ने भी मुश्किल की इस घड़ी में हर कदम पर किसानों को सही सलाह देकर उन्हें राहत प्रदान की। आईसीएआर से जुड़े कृषि संस्थानों, राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों ने ग्रामीण असंतोष को कम करने के लिए एहतियाती एवं सक्रिय दोनों तरह के कदम उठाए। उन्होंने फसलों की कटाई एवं उनके रखरखाव, भंडारण, परिवहन और अनाजों, फलों, सब्जियों, अंडे, मांस, मछली और अन्य कृषि उत्पादों के विपणन के बारे में किसानों को विशेषज्ञ सलाहें मुख्यत: डिजिटल माध्यम से भेजीं। इन प्रयासों को अब भी जारी रखते हुए ये कृषि संस्थान किसानों को खरीफ फसलों की बुआई के बारे में उपयोगी सुझाव दे रहे हैं। यह सुझाव किसानों को उनकी स्थानीय भाषाओं में फेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्विटर, इंस्टाग्राम और छोटे टेलीफोनिक संदेशों के जरिये दिए जाते हैं।

आईसीएआर ने कोरोना संकट से सीख लेते हुए ऐसी क्षमता विकसित करने की दिशा में काम शुरू कर दिया है कि फसलों एवं मवेशियों पर इसी तरह का कोई गंभीर खतरा पैदा होने पर भी उससे निपटा जा सके। वह पौधों में लगने वाली बीमारियों के अध्ययन की योजना बना रहा है ताकि वायरस की चपेट में आने और उनके प्रसार के तरीकों के बारे में पहले से जानकारी जुटाई जा सके। इससे पौधों एवं जानवरों में भविष्य में होने वाली किसी आपातस्थिति से निपटने के तरीकों एवं साधनों के बारे में एक समझ विकसित हो सकेगी। जीन बैंकों में रखे जेनेटिक संसाधनों की विशाल पूंजी की पड़ताल कर वायरस से लडऩे की क्षमता रखने वाले स्रोतों की पहचान की जाएगी। इंसानों की स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था से जुड़े वायरस-विशेषज्ञों एवं रोग-विज्ञानियों को शायद इस तैयारी से कुछ सबक सीखना चाहिए।

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