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भारतीय सेना से हासिल सामुदायिकता के सबक

श्याम पोनप्पा /  July 13, 2020

अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियों और प्रक्रियाओं पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है। भले ही उन्हें किनारे कर दिया जाए। एक पहलू जिसे या तो हल्के में लिया जाता है या फिर जिसकी अनदेखी कर दी जाती है वह है सामाजिक समरसता। सच तो यह है कि अच्छी नीतियों को सामाजिक सहमति पर आधारित सुसंगत क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है।

इसके बावजूद जब बात सामाजिक संगठनों की आती है तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम थोड़ा ढीले हैं। इसके विपरीत हमारे सशस्त्र बल बहुत प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर रहे हैं। एक ओर जहां हर व्यक्ति उनके साहस की सराहना करता है वहीं ज्यादा अच्छा यही होगा कि हम सशस्त्र बलों के संगठनात्मक और काम करने के तरीकों को अपनाएं। क्या उनके सिद्धांतों और व्यवहार के सिद्धांतों को सामाजिक संगठनों और नागरिक प्रशासन में आजमाया जा सकता है? भारतीय सेना अपनी क्षेत्रीय, जातीय और सांस्कृतिक विविधता के साथ भारतीय समाज का ही प्रतिबिंब नजर आती है। इसके बावजूद यह नागरिक समाज से इस लिहाज से अलग है कि यह अत्यधिक संगठित, सुसंगत, अनुशासित और सोद्देश्य काम करती है। सतही तौर पर तो यही नजर आता है कि सैन्य इकाइयों में एकरूपता है लेकिन अगर गहराई से पड़ताल की जाए तो अन्य जटिल कारक नजर आते हैं।

एकरूपता की शुरुआत पुरानी रेजिमेंट्स मसलन डोगरा, गढ़वाल, गोरखा, जाट, कुमाऊं और सिख रेजिमेंट में भर्ती के साथ शुरू हुई। इन रेजिमेंट में इन्हीं जातीय धार्मिक समूहों के लोग होते हैं, हालांकि इनके अधिकारी देश के किसी भी हिस्से से हो सकते हैं। यह क्षेत्रीय सुसंगतता क्षेत्रीय रेजिमेंट मसलन असम, बिहार अथवा मद्रास रेजिमेंट तक विस्तारित है जिनमें इन इलाकों के लोग भर्ती होते हैं। कुछ तयशुदा वर्ग की यूनिट भी हैं जिनमें दो या तीन सब यूनिट वाली बटालियन या रेजिमेंट होती हैं। मिलेजुले जवानों की बात करें तो पंजाब रेजिमेंट में पंजाबी और डोगरा दोनों पाए जाते हैं। वहीं अखिल भारतीय श्रेणी की यूनिट में देश भर के जवान होते हैं। इस श्रेणी में आर्टिलरी, इंजीनियर, सिग्नल, आर्मी सर्विस कोर, मेडिकल कोर, ऑर्डनेंस कोर आदि आते हैं। व्यावहारिक तौर पर देखें तो मिलेजुले जवानों वाली यूनिट भी अपनी विविधता के साथ पर्याप्त सक्षम और मजबूत साबित हुई हैं।

अधिकारी देश के विभिन्न हिस्सों से आते हैं और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने जवानों की भाषा और संस्कृति से जल्दी ही तालमेल बिठा लेंगे और उनके साथ व्यक्तिगत स्तर पर रिश्ता बनाएंगे। इसमें सभी धर्मों की साझी प्रार्थना शामिल है जिसमें बटालियन के धार्मिक गुरु शामिल होते हैं।

सवाल यह है कि भारतीय सेना के संगठनात्मक सिद्धांत क्या हैं और नागरिक समाज में उनका किस हद तक अनुकरण हो सकता है? कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर अमित आहूजा ने सन 2009 से 2011 के बीच भारतीय सेना में धर्म को लेकर एक अध्ययन किया जो इस विषय में कुछ जानकारी प्रदान करता है। भारतीय सेना विविध धर्मानुयायियों वाली संस्था है। इसमें व्यापक तौर पर विभिन्न पंथों को मानने वाले शामिल होते हैं। इसमें आस्था और सांस्कृतिक संबद्धता वाले धार्मिक व्यवहार शामिल होते हैं। इस दौरान संस्थागत प्राधिकार, धार्मिक प्राधिकार से ऊपर रहता है। समाज को इस दृष्टि से देखें तो उसमें भी तमाम धर्म हैं लेकिन संस्थागत धर्मनिरपेक्षता उसमें भी उच्चतम है।

सेना के दो सिद्धांत ध्यान देने वाले हैं। पहला, यह एक यूनिट के स्तर पर काम करते हुए रेजिमेंट, सेना और देश के प्रति वफादारी की भावना के साथ सामुदायिकता की भावना भरती है। दूसरी बात, यह धर्म के प्रभावों को सीमित रखते हुए भी उसका लाभ लेने के लिए धर्म को पर्याप्त रियायत देती है और इसका इस्तेमाल जवानों को प्रेरित करने के लिए करती है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए रेजिमेंट की पहचान और राष्ट्रीय पहचान के इर्दगिर्द श्रेष्ठता की भावना विकसित की जाती है।

ऐसे में दो सिद्धांत हैं। पहला, रेजिमेंट और राष्ट्रीय पहचान को लेकर वफादारी का भाव भरना और दूसरा ऐसी धार्मिक मान्यताओं और व्यवहार को अपनाना जो हर धर्म के लिए मान्य हो। एक दूसरे के धर्म के प्रति आस्था, जातीयता के इर्दगिर्द सांस्थानिक भावना आदि उत्पन्न करने का यह संस्थागत तरीका है।

इसमें समग्र पहचान और वफादारी राष्ट्रीय और रेजिमेंट यानी समुदाय के प्रति होती है। यह भावना काम करती है कि हमारा और हमारी रेजिमेंट का मान दांव पर है।

हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि अपने साथियों और देश के प्रति सामुदायिकता और प्रतिबद्धता की यह भावना नागरिक समाज में कैसे भरी जाए। शुरुआती स्कूली शिक्षा और प्रशिक्षण से शुरू करके इसे काफी आगे तक ले जाया जा सकता है। नैशनल कैडेट कोर या स्काउट्स ऐंड गाइड्स जैसी गतिविधियां शैक्षणिक संस्थानों में अलग-अलग रूप में अपनाई जाती हैं लेकिन अक्सर इनमें सुसंगतता नहीं होती।

इन्हें व्यापक प्रोत्साहन देने तथा इंस्टीट्यूट ऑफ नैशनल इंटीग्रेशन जैसे विचारों के साथ जोडऩे और डिजिटल प्लेटफॉर्मों की मदद से शुरुआती और व्यापक  प्रचार करने की आवश्यकता है। युवा वयस्कों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा पर भी विचार किया जा सकता है।

वफादारी के बाद आता है अंतरधार्मिक सम्मान, और सशस्त्र बल इसके लिए पूरी तरह प्रशिक्षित हैं। वहां कई धार्मिक अवकाश और क्षेत्रीय त्योहार मनाए जाते हैं जिनमें अधिकारी भी भाग लेते हैं। यूनिट में सभी प्रमुख धर्मों के शिक्षकों की भर्ती की जाती है और इंस्टीट्यूट ऑफ नैशनल इंटीग्रेशन द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है। इस संस्थान की परिकल्पना जनरल ओपी मेहरान ने सन 1980 में पेश की थी और यह सन 1985 में अस्तित्व में आया। इसका ध्यान धार्मिक सौहार्द और यूनिट में सहयोग की भावना विकसित करने पर केंद्रित है। चुनिंदा सैन्य कर्मियों को व्यवहार और सामाजिक विज्ञान का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

क्या लोकतांत्रिक समाज में ऐसे सिद्धांतों का पालन हो सकता है? इसके लिए यह आवश्यक है कि पंथ आधारित व्यवहार को तिलांजलि दी जाए। इसके लिए नेतृत्व और सामूहिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी। यदि यह काम केवल मजबूत नेतृत्व से हो पाता तो निरंतर प्रशिक्षण और प्रदर्शन से अहम लाभ मिलते।

आर्थिक और सामाजिक बेहतरी के लिए हमें भारतीय सेना के मूल्यों का अनुकरण करना होगा। आने वाले समय में देश को नई गति देने के लिए हमें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का प्रचार अभियान का वक्तव्य ध्यान में रखना होगा जिसमें अर्थव्यवस्था को सबसे महत्त्वपूर्ण बताया गया था।

आर्थिक दिक्कतों को हल करने की दिशा में पहला कदम है जमीनी हकीकतों को समझना। उसके बाद ही आगे के कदम उठाए जा सकते हैं। इस मामले में भारतीय सेना कुछ मदद कर सकती है।

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