बिजनेस स्टैंडर्ड - कोरोना काल में राशन बेच रहे डेवलपर
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कोरोना काल में राशन बेच रहे डेवलपर

सुशील मिश्र / मुंबई July 12, 2020

लॉकडाउन में नौकरी-धंधा गंवा चुके हजारों लोग और छोटे कारोबारी देश के कई हिस्सों में छोटा-मोटा काम करने को मजबूर हैं, लेकिन मुंबई और पड़ोसी शहरों में तो रियल्टी डेवलपर भी फल-सब्जी बेच रहे हैं। हालांकि नौकरीपेशा लोग तो परिवार पालने और कर्ज की किस्तें चुकाने के लिए तराजू थाम रहे हैं मगर डेवलपर या पूंजीपति कम निवेश में मोटा मुनाफा देखकर ही इसमें आए हैं।

इस महामारी के दौरान तमाम धंधे चौपट हो गए मगर सब्जी, राशन और दवाओं का कारोबार खूब चमक रहा है। इसे देखकर पूंजीपति सब्जी और ग्रॉसरी के कारोबार को कब्जा रहे हैं। सोनम बिल्डर्स को ही लीजिए। लॉकडाउन शुरू होते ही सब्जियों की किल्लत हो गई और आम लोगों को महंगे दाम में घटिया सामान खरीदना पड़ा। यह देखकर यहां की बड़ी रियल्टी कंपनियों में शुमार सोनम बिल्डर्स के प्रबंध निदेशक भरत जैन और उनकी विधायक पत्नी गीता जैन इस कारोबार में उतर गए। गीता बताती हैं कि किल्लत देखकर उनकी कंपनी ने नाशिक से किसानों का माल यहां लाकर बेचना शुरू कर दिया।

जैन इसे कारोबार के बजाय समाजसेवा कहती हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में छह किलो सब्जियों के पैकेट तैयार किए गए और हरेक पैकेट 200 रुपये में बेचा गया, जबकि उस समय बाजार में इतनी सब्जी 500-600 रुपये में आ रही थी। सब्जी और फल के पैकेट हाउसिंग सोसाइटियों में भेजे गए, जो हाथोहाथ बिक गए। उन्होंने यह काम महज 1 ट्रक सब्जी से शुरू किया, जिसमें केवल 25,000 रुपये लगे और 100 लोगों को रोजगार हासिल हो गया।

जैन इसे समाजसेवा बताती हैं मगर राज रियल्टी ग्रुप के कर्मचारी ऐसा कोई दावा नहीं करते। कारोबार ठप पडऩे पर इस कंपनी के कर्मचारियों ने श्रुति ग्रॉसरी के नाम से बड़े पैमाने पर फल-सब्जी, ग्रॉसरी का काम शुरू कर दिया। कारोबार की कमान संभाल रहे विवेक उपाध्याय कहते हैं कि इसका रियल्टी से कोई लेना-देना नहीं है। राज रियल्टी के प्रबंधन ने धंधे में हमारा मार्गदर्शन और सहयोग जरूर किया मगर इसे कर्मचारी ही संभाल रहे हैं। विवेक ने कहा कि लॉकडाउन में लोगों को केवल सब्जी लेने के लिए घर से निकलना पड़ रहा था। इधर कंपनी के कर्मचारी भी बिना काम के घर बैठे थे। इसीलिए मौके का कारोबार खड़ा करने पर रजामंदी बनी और महज 45,000 रुपये में काम शुरू कर दिया गया।

राज रियल्टी के कर्मचारी व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया के जरिये काम कर रहे हैं। उनके तीन नंबरों पर सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक ऑर्डर आते रहते हैं और कुछ घंटों में ही सामान लोगों के घर पहुंचा दिया जाता है। डिलिवरी बाइक, ऑटो और टेंपो की मदद से की जाती है। ऐसा भी नहीं है कि सभी कॉर्पोरेट नुमाइंदों को यह कारोबार रास आया। शिक्षा, स्वास्थ्य, होटल, पब, निर्माण एवं रियल एस्टेट क्षेत्र की प्रमुख कंपनी सेवन इलेवन ग्रुप ने भी सेवन इलेवन बास्केट के नाम से फल-सब्जी बेचना शुरू किया था। मगर महीने भर के अंदर ही काम बंद करना पड़ा। कंपनी के कर्मचारियों ने बताया कि कारोबारी अनुभव नहीं होने के कारण शुरू में ही लाखों रुपये का घाटा हो गया। अब प्रबंधन गुर सीखने के बाद नए सिरे से काम शुरू करने जा रहा है।

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