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सरकार के राहत पैकेज से छोटे कारोबारियों को नहीं राहत

रॉयटर्स /  07 10, 2020

कोरोनावायरस संक्रमण की वजह से कुछ महीने के लॉकडाउन के बाद जून महीने में देश में कारोबार फिर से खोलने की इजाजत जरूर दी गई लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के हजारों छोटे उद्यमियों के लिए चुनौतियां पहले जैसी ही बनी हुई हैं। कपड़े से लेकर, खेल के सामान और फर्नीचर के कारोबार बंद हैं या बिल्कुल नाम मात्र चलाए जा रहे हैं। उन सड़कों पर इधर-उधर गायें घूमती नजर आ रही हैं जो आमतौर पर कामगारों और गाडिय़ों से अटी पड़ी होती थीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छोटे कारोबारों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जो 40 अरब डॉलर की सरकारी गारंटी वाला कर्ज देने की पेशकश की वह भी कम पड़ रहा है। देश भर के करीब तीन दर्जन उद्यमियों का कहना है कि यह कर्ज भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनने वाली कई कंपनियों को बचाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है।

कुछ का कहना है कि महामारी से कारोबार पर काफी असर पड़ा है, ऐसे में नया कर्ज लेने का कोई मतलब उन्हें समझ में नहीं आ रहा है। उनके मुताबिक इसके बजाय सरकार वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में कटौती करके या कर्ज पर ब्याज माफ करके उनकी मदद कर सकती थी। वहीं कुछ अन्य लोगों का कहना है कि मोदी ने क्रेडिट लाइन खोलने का वादा किया लेकिन इसके बावजूद बैंकरों को कर्ज देने के लिए आश्वस्त कराना मुश्किल था क्योंकि उनके कारोबार में जोखिम की स्थिति बनी रही।

अशोक की करीब 1 करोड़ रुपये सालाना कारोबार वाली कंपनी मेरठ में है जो होटलों और स्कूलों के लिए स्टील के फर्नीचर बनाती है। उनका कहना है कि उन्हें अपने 10 में से आठ कामगारों को काम से निकालना पड़ा और अब वह अपना काम ही बंद करने के बारे में सोच रहे हैं। अशोक अपना पूरा नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, 'यह मेरे लिए बेहतर होगा कि मैं काम ही बंद कर दूं। आखिर कर्ज लेने के लिए और जोखिम क्यों लिया जाए।' उन्होंने कहा कि उनके बैंकर ने उन्हें बताया कि उनकी कर्ज लेने की साख कम है क्योंकि उनके कारोबार में काफी जोखिम की स्थिति है।

वित्त मंत्रालय ने लॉकडाउन में परेशानी झेल रहे छोटे और मझोले कारोबारियों की मदद के लिए ऋण सहायता योजना की पेशकश की थी। हालांकि कारोबारियों की समस्या से जुड़े सवालों पर टिप्पणी करने के आग्रह पर मंत्रालय ने कोई जवाब नहीं दिया।

छोटे व्यवसाय देश की 2.9 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था में करीब एक-चौथाई का योगदान देते हैं और इनमें करीब 50 करोड़ लोगों को रोजगार मिला है जो महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित है। कंसोर्टियम ऑफ इंडियन एसोसिएशंस ने प्रधानमंत्री मोदी के कार्यालय को लिखे पत्र में कहा कि सरकार की मदद के बगैर देश भर में 65 करोड़ छोटे कारोबारों में से लगभग 35 फीसदी जल्द ही बंद हो सकते हैं।

ऋण देने का दबाव

बैंकरों का कहना है कि उद्यमियों को ऋण देने के लिए सरकार का दबाव है लेकिन कारोबारी इसके लिए आगे नहीं आ रहे हैं और ऐसे में कर्ज की मांग काफी कम है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक बैंकरों ने करीब 561 अरब रुपये का भुगतान किया है स्वीकृत ऋण का महज 19 फीसदी हिस्सा है जबकि मई के तीसरे हफ्ते से अब तक 1,145 अरब रुपये के कर्ज को मंजूरी दी गई है। कारोबारियों का कहना है कि बैंक या तो ज्यादा कागजी कार्रवाई के लिए कह रहे हैं या फिर जो लोग ज्यादा जरूरतमंद दिख रहे हैं उन्हें अयोग्य समझा जा रहा है।

मोदी के गृह राज्य गुजरात में एक उद्यमी ने बताया, 'मुझे कर्ज लेने के लिए जमानत के तौर पर कुछ देने और एक बीमा लेने के लिए भी कहा गया जबकि इसे जमानत मुक्त कर्ज माना जाता है।'

लेकिन दो बैंकरों ने कहा कि पूरी तरह समर्थित सॉवरिन गारंटी स्कीम में भी सरकार से पैसा लेना आसान नहीं है। एक सरकारी बैंक के पूर्व कॉरपोरेट प्रमुख ने बताया, 'मेरा अनुभव अच्छा नहीं रहा।' वह कहते हैं, 'आप इन अधिकांश कारोबारों को उधार सिर्फ इसलिए देते हैं क्योंकि इसके लिए सरकार ने निर्देश दिया है लेकिन जब पैसे वापस लेने की बात होती है तब किसी को भी सोच समझ कर संसाधन खर्च करना होता है।'

कारोबारों की हालत खस्ता है क्योंकि उनके आपूर्तिकर्ताओं ने भुगतान नहीं किया है और ऑर्डर शून्य के स्तर पर पहुंच गए हैं जबकि तयशुदा लागत मसलन बिजली, मजदूरी और  पहले के बैंक ऋणों की किस्तों में भी उनकी पूंजी खत्म हो जाती है।

मेरठ में परिधान निर्माता संजीव रस्तोगी अपनी फैक्टरी उत्पादन क्षमता के 25 फीसदी हिस्से के साथ ही चला रहे हैं, उनका कहना है, 'हमें सरकार से एक रुपये की भी राहत नहीं मिली है।'

रस्तोगी को पिछले दो महीनों में साढ़े तीन लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है और उनका मानना है कि उन्हें अगले तीन महीने तक उन्हें अपना कारोबार बंद करना पड़ सकता है।

इंडियन इंडस्ट्री एसोसिएशन के मेरठ चैप्टर के अध्यक्ष अनुराग अग्रवाल ने बताया कि मेरठ में 10 हजार से अधिक कपड़ा इकाइयों में से करीब 25 फीसदी छोटी फैक्टरियां अगले कुछ महीनों में बंद हो सकती हैं और वे बैंक कर्ज भी नहीं चुका पाएंगी। रस्तोगी कारोबार में बने रहने की आखिरी कोशिश कर रहे हैं। वह कहते हैं, 'अगर कुछ पटरी पर वापस नहीं आया तो मैं किसी भी कीमत पर फैक्टरी बेच दूंगा और अपने रिटायरमेंट के लिए कुछ पैसे बचाऊंगा।'

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