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आईसीएमआर प्लाज्मा थेरेपी के नतीजे दो हफ्ते में

सोहिनी दास और विनय उमरजी /  July 10, 2020

कोविड-19 के इलाज के लिए विभिन्न तरह के इलाज की खोज जारी रहने के बीच ही क्लीनिकल परीक्षण साइट पर मौजूद स्रोतों के मुताबिक भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के कॉन्वैलेसेंट प्लाज्मा थेरेपी (सीपीटी) परीक्षणों के नतीजे दो हफ्ते में आने की उम्मीद है। अब तक प्लाज्मा थेरेपी के नतीजे मिले-जुले ही रहे हैं और इसकी बदौलत कुछ मरीज ठीक हो चुके हैं जबकि कुछ मरीजों की हालत काफी बिगड़ी भी है।

देश के 50 साइटों पर इसका परीक्षण चल रहा है और करीब 350 मरीजों से आंकड़े लिए जा चुके हैं। गुजरात स्थित एक साइट के एक सूत्र ने कहा कि परीक्षण के लिए नमूने का आकार 425 मरीजों का है और इसके नतीजे की घोषणा जल्द ही होने की संभावना है। इलाज का कोई सटीक विकल्प न होने के आधार पर सीपीटी का इस्तेमाल भारत में पहले से ही डॉक्टरों द्वारा किया जा रहा है और यह कोविड-19 के आईसीएमआर के क्लीनिकल प्रबंधन प्रोटोकॉल का एक हिस्सा भी है। इस प्रायोगिक इलाज में कोविड-19 से ठीक हुए मरीज का रक्त प्लाज्मा (जिसमें वायरस से लडऩे के लिए पर्याप्त ऐंटीबॉडी होती है) कोविड-19 से संक्रमित दूसरे मरीजों में स्थानांतरित किया जाता है। इससे प्लाज्मा पाने वाले व्यक्ति में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है ताकि वह सार्स-सीओवी-2 संक्रमण के लिए प्रतिक्रिया दे सके। सूत्रों ने दावा किया कि अहमदाबाद (एनएचएल मेडिकल कॉलेज और बीजे मेडिकल कॉलेज) में दो साइट जो सीपीटी पर आईसीएमआर परीक्षण कर रहे हैं उसमें सकारात्मक नतीजे देखने को मिले हैं। सूत्रों के अनुसार एक या दो सप्ताह में समाप्त होने वाले परीक्षणों में अच्छी तादाद में मरीजों में सुधार दिखा है। अहमदाबाद में एक केंद्र पर एक सूत्र ने बताया, 'सटीक परिणाम साझा नहीं किए जा सकते हैं क्योंकि आईसीएमआर परीक्षणों के समाप्त होने के बाद इसकी घोषणा करेगा। हालांकि शुरुआती स्तर पर रिकवरी वाले मरीजों की अच्छी तादाद दिख रही है हालांकि मरीजों की स्थिति बिगडऩे के मामले भी सामने आए हैं। देश में लगभग 50 केंद्रों में 425 के लक्ष्य के मुकाबले प्लाज्मा परीक्षणों के लिए पहले से ही 350 मरीजों को नामांकित किया गया है और परीक्षण एक हफ्ता और या आईसीएमआर द्वारा परीक्षण नतीजों की घोषणा से पहले तक चलने की संभावना है।' एनएचएल मेडिकल कॉलेज में लगभग 25 रोगियों को नामांकित किया गया है जिनमें से आधे को देखभाल के नियंत्रित मानकों पर रखा है ताकि उनकी तुलना प्लाज्मा थेरेपी से गुजर रहे अन्य आधे लोगों से की जा सके। अब तक 30 से अधिक प्लाज्मा दाताओं का नामांकन किया जा चुका है।

इस बीच इस पर कुछ भ्रम है कि सीपीटी किसे दिया जाना चाहिए। देश भर के डॉक्टरों ने मरीजों (मामूली बीमार) में पहले ही सीपीटी का इस्तेमाल करने की सलाह दी है और उनकी गंभीर स्थिति होने तक इंतजार नहीं करने को कहा है।

जहां तक कोविड मरीजों में इलाज के लिए प्लाज्मा के ऑफ लेबल इस्तेमाल का ताल्लुक है तो गुजरात के केंद्र अब हल्के से मध्यम परिस्थिति वाले मरीजों पर ध्यान दे रहे हैं। ये केंद्र अब बायो मार्कर का भी इंतजार कर रहे हैं जो मरीजों में ऐंटी बॉडी टेस्ट में मदद कर सकते हैं और इससे यह फैसला लेने में मदद मिल सकती है कि प्लाज्मा थेरेपी की जाए या नहीं। मणिपाल हॉस्पिटल्स के इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख सत्यनारायण मैसूर ने कहा, 'कम गंभीर मरीजों को सीपीटी नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि वे आसानी से ठीक हो जाते हैं। सीपीटी का इस्तेमाल मध्यम से गंभीर मरीजों के लिए किया जा सकता है जहां ऑक्सीजन का स्तर कम हो रहा है और नब्ज की दर बढ़ रही है।' उन्होंने महसूस किया कि यह उन मरीजों को दिया जाना चाहिए जिनमें टॉजिलिजुमैब या रेमडिसिवर जैसी दवाओं का इस्तेमाल करने के बाद ज्यादा सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं देखने को मिली है।

मैसूर का कहना है कि प्लाज्मा एक रेडिमेड किट की तरह है जिसमें एंटीबॉडी मौजूद है जो वायरस की ओर निर्देशित होता है। वह कहते हैं, 'हम चार घंटे की अवधि के दौरान किसी व्यक्ति में वायरल लोड को कम करने की कोशिश करते हैं ताकि और वायरस तैयार न हो पाएं। इसलिए वायरस पर प्रतिक्रिया देने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली स्वचालित रूप से यह समझ लेती है कि इसने वायरस को मात दी है।' सबसे बड़ी चुनौती एक प्लाज्मा देने वालों का मिलना है। यहां तक कि क्लीनिकल परीक्षण स्थलों को भी रक्त प्लाज्मा जुटाते समय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

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