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देश की मनोदशा बदलने का आ गया वक्त

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  07 08, 2020

अर्थव्यवस्था की हालत के लिए लोग मोदी सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। काफी हद तक यह सही भी है। आखिर उसे सत्ता में रहते हुए छह साल हो चुके हैं। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक शैली में लडख़ड़ाती है। यह हीरो से ज़ीरो बनने का एक छोटा कदम है। पहले भी एक बार 1960 के दशक में ऐसा हो चुका है जब भारतीय अर्थव्यवस्था दशक भर लंबे कोमा में चली गई थी। ठीक वैसे ही जैसा अब हुआ है।

नवंबर 1962 में भारत को चीन ने हिमालय की पहाडिय़ों में हुई लड़ाई में शिकस्त दे दी थी। फिर अक्टूबर 1963 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दौरा पड़ा और मई 1964 में उनका देहांत हो गया। उसके बाद 1969 तक कांग्रेस और देश दोनों के क्षेत्रीय दिग्गजों का एक छोटा समूह चलाता रहा।

नेहरू के उत्तराधिकारी के तौर पर इन नेताओं ने पहले लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन उनका भी अचानक जनवरी 1966 में निधन हो गया। फिर इस समूह ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर बिठाया और फिर सारी जिंदगी इसका अफसोस करते रहे।

इसके पहले हमेशा की तरह बेवकूफ पाकिस्तान ने जून 1965 में भारत पर हमला कर दिया था। सितंबर में उसने भारत पर एक और हमला किया। उसे दोनों ही बार मुंह की खानी पड़ी। लेकिन इन दोनों युद्धों में भारत को काफी बड़ी लागत लगानी पड़ी।

मानो इतना ही काफी नहीं था। 1965 और 1966 दोनों साल मॉनसून बुरी तरह नाकाम रहा और देश में अनाज की किल्लत हो गई। अमेरिका ने भारत को एक तरह से हाथ में कटोरा लेकर अनाज की भीख मांगने के लिए मजबूर कर दिया। उसके बाद से ही भारत में अमेरिकावाद के खिलाफ रोष पनपने लगा। 1966 की गर्मियां खत्म होते-होते सरकार का खजाना लगभग खाली हो चुका था। ऐसी स्थिति में विश्व बैंक ने भी भारत को रुपये की कीमत में 36.5 फीसदी की भारी गिरावट के लिए बाध्य कर जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।

ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि अगले पांच वर्षों तक निवेश पर एक तरह की रोक लग गई। इस गंवाए हुए दशक को 'योजनागत अवकाश' कहा गया। वित्त वर्ष 1960-61 में आर्थिक वृद्धि 5.5 फीसदी के काफी हद तक मजबूत स्तर पर थी लेकिन उसके बाद के साल में यह बहुत नीचे आ गई। अर्थव्यवस्था वर्ष 1965-66 में 3 फीसदी की दर पर गिर गई और अगले साल तो इसकी वृद्धि दर शून्य ही हो गई थी। फिर 1970 तक यह 2 फीसदी से नीचे ही रही।

लेकिन इंदिरा गांधी तो एक योद्धा थीं। उन्हें असाधारण साहस का परिचय देते हुए जुलाई 1969 में दो कदम एक साथ उठाए और ये एकदम अलग मिजाज वाले थे।

इसमें एक फैसला तो राजनीतिक था जो कांग्रेस पार्टी पर नियंत्रण कायम करने के लिए था। उन्होंने पार्टी को ही विभाजित कर दिया। दूसरा कदम आर्थिक था और बैंकों का नियंत्रण हासिल करने के लिए उन्होंने 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया।


मोदी के विकल्प

इंदिरा के उलट मोदी को अपनी पार्टी के लिए फिलहाल तो फिक्र नहीं करनी है। लेकिन उन्हें चीन के साथ जंग को लेकर थोड़ा फिक्रमंद होने की जरूरत है। और अर्थव्यवस्था की हालत के बारे में तो उन्हें काफी चिंता करने की जरूरत है। यह उनके राजनीतिक भविष्य को तय कर देगा।

इंदिरा ने 1970 के दशक में आर्थिक वृद्धि को तेज करने के लिए लगभग हर चीज का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। यहां तक कि 1973 में तीन महीनों के लिए अनाज व्यापार का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था। इस तरह इंदिरा ने भारत को एक तरह के अधिनायकतंत्र में तब्दील कर दिया था।

उनका मानना था कि भारत के पास डॉलर नहीं होने से हम आयात नहीं कर पाएंगे। निर्यात कर डॉलर जुटाने की सोच तो जगदीश भगवती और टी एन श्रीनिवासन जैसे प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों की स्थापनाओं के बाद पैदा हुई।

अब मोदी को इंदिरा गांधी के ठीक उलट काम करने होंगे। मोदी को उन सभी चीजों को राष्ट्रीयकरण से मुक्ति देनी होगी जो अभी तक राष्ट्रीयकृत बने हुए हैं। इसके साथ ही उन्हें देश को यह भी समझाना होगा कि आत्मनिर्भर का मतलब अधिनायकशाही नहीं होती है। इसका श्रेय 1992 के बाद लागू कांग्रेस की नीतियों को जाता है जिसकी वजह से आज हमारे पास पर्याप्त डॉलर हैं।

मोदी ने इस विराष्ट्रीयकरण कार्यक्रम की शुरुआत का ऐलान भी कर दिया है। उन्हें ऐसी चीजों के आयात शुल्क में भारी वृद्धि की घोषणा करनी चाहिए जिन्हें स्थानीय स्तर पर पैदा करने के लिए बहुत पूंजी की जरूरत नहीं है। विराष्ट्रीयकरण का उद्योग जगत के लिए कोई खास मायने नहीं होगा क्योंकि विनिर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र वैसे भी अपना वजूद लगभग खो चुका है। हालांकि इसका बैंकों एवं वित्तीय क्षेत्र पर गहरा असर पड़ेगा। ऐसा लगता है कि बैंकों के निजीकरण के एक कार्यक्रम को फिलहाल अंतिम रूप दिया जा रहा है।

सरकारों को केवल मुद्रा की आपूर्ति पर एकाधिकार रखना चाहिए, न कि इसकी मांग पर। इसके बराबर या इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि इंदिरा गांधी के आजमाए हुए फॉर्मूले को इस तरह पलटने से पूरे देश की मनोदशा कुछ उसी तरह बदल जाएगी जैसे 1969 में राष्ट्रीयकरण करते समय बदली थी। यह 1991 से ही भारत को सता रहे खोखले समाजवाद के भूत को आखिर चिरनिद्रा में सुलाने का भी काम करेगा। इस तरह मोदी के पास एक बड़ा मौका है। वह इस मौके को 1969 में इंदिरा की तरह दोनों हाथों से लपकते हैं या फिर 2014 की तरह हाथ से छिटक जाने देते हैं, उससे ही उनकी आर्थिक विरासत तय होगी। दूसरे भारतीय प्रधानमंत्रियों के उलट मोदी को एक दूसरा मौका दिया गया है। अब यह उन पर निर्भर करता है। वैसे कहा जाता है कि किस्मत भी बहादुरों का ही साथ देती है।

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